Sunday, January 26, 2020 12:32 AM

बिना कहे कहने की बात

अगर वाकआउट ही करने हैं, तो तपोवन विधानसभा परिसर लगातार अप्रासंगिक हो रहा है। विषय से कहीं आगे वाकआउट का अभिप्राय है, तो निचले हिमाचल की बिसात पर खड़ा यह संस्थान अपनी आवभगत में लाचार साबित हो रहा है। बड़ी मुश्किल से छह दिन मिले, कुछ आरजू में चले गए तो कुछ बिना कहे चल दिए। यह विडंबना है या उस मौलिक आइडिया का विरोध, जिसने शिमला की आबोहवा से छीनकर विधानसभा का शीतकालीन सत्र धर्मशाला में चला दिया। बेशक पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह अपनी बीमारी के चलते तपोवन नहीं पहुंचे, लेकिन उन्होंने जो चिन्हित किया वह हिमाचल के सामने कई दर्पण खड़े करता रहेगा। वास्तव में शीतकालीन सत्र की वजह से विधानसभा का आईना निचले हिमाचल के करीब आता है, लेकिन जो प्रतिबिंबित होगा उसी को तो दुनिया देखेगी। जनता विधानसभा परिसर में पहुंचकर या तो फरियादी हो जाती है या बहस के मरुस्थल पर खड़ी होकर वाकआउट की रेत देखती है। प्रदेश की भौगोलिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक व राजनीतिक इच्छाओं का संतुलन कमोबेश हर मुख्यमंत्री को तराशना पड़ा, इसलिए वीरभद्र सिंह का जिक्र यहां बार-बार होगा। यह एक तरह की सियासत हो सकती है या सियासत का अनिवार्यता की बीजारोपण भी हो सकता है कि पूरा हिमाचल तपोवन की परिक्रमा में चंद रोज भूल जाता है कि वास्तविक सत्ता का केंद्र शिमला है। इसलिए पिछली सरकार अगर दूसरी राजधानी  को तपोवन से देख रही थी, तो संतुलन की दरकार अभी सलामत है। इस विषय की जरूरत को गैर जरूरी तवज्जो न मिले, लेकिन खारिज करने का जिगर तो चाहिए। बिना विधानसभा में आए या विपक्ष के वाकआउट में शरीक न होकर भी कहीं वीरभद्र सिंह की नारेबाजी को तपोवन परिसर सुनता रहेगा और यह समीक्षा निरंतर होगी कि कांगड़ा से इतर मुख्यमंत्री बने, तो कितना फासला पाटा गया। वीरभद्र सिंह बाखूबी समझ गए थे कि सत्ता के कुछ चिराग कांगड़ा में जलाने पड़ेंगे। इसलिए मुख्यमंत्री के शीतकालीन प्रवास के दौरान नजरें एनायत होती गईं और एक-एक करके चिराग जलते गए। चिराग पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने भी जलाए और अब वर्तमान मुख्यमंत्री जयराम भी जलाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन संतुलन की परीक्षा में विधानसभा के मजमून ठंडे हैं। शीतकालीन सत्र के चौबारे पर ख्वाहिशें बैठती रही हैं और यही तासीर है कि जिक्र बनकर तपोवन अब सत्ता की समीक्षा में एक अहम भूमिका निभा रहा है। तपोवन परिसर में मेहमान बनकर आने की प्रथा ने शिमला को कुछ दिन का प्रस्थान करना तो सिखा दिया, लेकिन कुछ पुल या कुछ पल अभी जोड़ने बाकी हैं। इसे पूर्णतः विंटर मूव न कहें-न मानें, लेकिन यह कहावत पुरानी हो चली है कि सरकार को यहां आकर कुछ बर्फ तो हटानी ही पड़ेगी। इसलिए शिमला के सामने धर्मशाला की तस्वीर उभरी, तो वर्तमान सरकार दो बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यहां ले आई। जिस इन्वेस्टर मीट को लेकर विपक्ष अपने विरोध की बाकी आंधियां भूल गया, उस कोशिश को मामूली आंकना सही नहीं। अंततः प्रधानमंत्री ने स्वयं मुख्यमंत्री को आशीर्वाद दिया है, तो यह परिचय एक छोटे से प्रदेश की बीहड़ हो चुकी आशाओं को फिर से जमीन पर खड़ा करता है। इससे पूर्व हम उस दौर को नहीं भूल सकते जब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने हिमाचल के औद्योगिक पक्ष को संवारने के लिए विशेष पैकेज दिया। बहस तो यह होनी चाहिए कि उस पैकेज की निगाहों से आज बीबीएन कचरा क्यों लगता है और क्यों प्रभावशाली मंत्री रहते हुए आनंद शर्मा के दौर में औद्योगिक पैकेज गुम हो गया। वास्तव में हिमाचल को किस तरह के निवेश की जरूरत है, इस पर सत्ता व विपक्ष के बीच जनआकांक्षाओं का सम्मान होना चाहिए। अगर ढंग से हिमाचल के विभिन्न क्षेत्रों में आधुनिक बस अड्डे निर्मित करने हों, तो दर्जनों निर्माण की जरूरतों के बीच निवेशक को आमंत्रित करना पड़ेगा। हिमाचल को पक्ष-विपक्ष के बीच आबंटित करके न नए निवेश को रास्ता मिलेगा और न ही पूर्व की परियोजनाओं की मिट्टी बचेगी। विपक्ष को अगर पूछना ही है, तो पूर्व के निर्माण के अधूरे संकल्पों और स्मार्ट सिटी जैसी परियोजनाओं के बिखरने पर पूछे। चर्चा हिमाचल के अधिकारों और पौंग-भाखड़ा बांध के किनारों पर हो, तो मालूम होगा कि विस्थापित हुए हिमाचली अपनी जमीन के लिए किस कद्र तरसते हैं।