Tuesday, June 02, 2020 09:40 AM

बुद्धू होने की आत्मनिर्भरता

निर्मल असो

स्वतंत्र लेखक

वह खुद को लोकल ब्रांड मानने लगा है। दरअसल प्रधानमंत्री के भाषण में जब से उसने यह बात सुनी है कि अब लोकल ही वोकल होगा, वह इसका शाब्दिक अर्थ समझ गया है। उसे यकीन है कि वह अब फूल-पत्ते या घास चबा कर भी आत्मनिर्भर हो सकता है, बल्कि उसके विश्वास की जिरह भी उन उदाहरणों से सशक्त हुई जहां हजारों बेरोजगार मजदूर अब अपने-अपने घरों की ओर भाग कर स्वदेशी होने लगे हैं। वाकई आत्मनिर्भरता में यह लक्षण स्वाभाविक है या आत्मनिर्भर हो ही वही सकता है जो स्थानीय तौर पर खुद की ब्रांडिंग करे। वह इसलिए लोकल ब्रांड बन गया, क्योंकि हर हरकत में वोकल था। उसका साथ देने वाले भी स्थानीय हैं, इसलिए वे दूर की बात न करते हैं और न ही सोचते हैं। उनका नजरिया विशुद्ध रूप से स्थानीय है, इसलिए वे मिट्टी की बात करते हैं। उनका वश चले तो सोने को मिट्टी कर दें और हुआ भी यही, वरना कभी भारत सोने की चिडि़या ही तो था। हमें यह तो पता नहीं कि पहले कौन थे या हम आत्मनिर्भर क्यों नहीं हुए, लेकिन अब लगता है कि कोरोना से जब निपट चुके होंगे, सारे सियापे ही खत्म हो जाएंगे। अंततः हर बार बुद्धू को लौटकर घर ही तो आना पड़ता है। दरअसल हर बुद्धू स्थानीय है, जबकि बुद्धिमान इसके विपरीत वैश्विक है। कभी देखा किसी बुद्धिमान ने अपनी सोच से ऐसे काम किए हों जो केवल स्थानीय तौर पर ही तय हों। दरअसल बुद्धिमान को अपने ही तर्कों का अभिशाप है, इसलिए वह न तो ढंग का नेता चुन सकता है और न ही किसी अपने सरीखे अकलमंद को राजनेता बना सकता है। इसलिए स्थानीय बने रहने के लिए बुद्धिमान नहीं, चंद बुद्धू चाहिएं और यह योग्यता हमारे नेताओं में कूट-कूट कर भरी है कि वे अपने लिए ऐसे स्थानीय ब्रांड चुन लेते हैं। आत्मनिर्भरता का बोध भी कोई बुद्धू ही कर सकता या जब हम बुद्धू बन जाते हैं, कोई न कोई मेहरबान हो जाता है। अब आजादी के इतने सालों बाद भी आत्मनिर्भरता जैसे शब्द को भारत में समझना कठिन है। यह बहस का विषय है कि पिछले कुछ सालों में मुकेश अंबानी अपनी भरसक कोशिश के बावजूद आत्मनिर्भर नहीं हो रहे हैं, जबकि एक वही हैं जो मेहनत कर रहे हैं। क्या वह लोकल ब्रांड बनने के लिए खाक छान रहे हैं या जनता उनके स्थानीय होने का कर्ज उतार रही है, कम से कम जियो के बहाने हमें अपना एक ब्रांड तो मिला। हमारा मानना है कि अंबानी तो आगे बढ़ते रहेंगे, लेकिन आत्मनिर्भर बनाने के लिए देश हमेशा गरीब का साथ देगा। गरीब भी अब ढीठ है। उसे सालों साल कांग्रेस ने आत्मनिर्भर बनाने में कोर कसर नहीं छोड़ी, लेकिन वह नहीं सुधरा। अब भाजपा सरकार में भले ही मुकेश अंबानी आत्मनिर्भर न हों, लेकिन गरीब के लिए सारा देश एकजुट है। कोरोना संकट और लॉकडाउन हटने के बाद पहला काम अगर किसी को आत्मनिर्भर बनाएगा, तो यकीनी तौर गरीब का नंबर पहले आएगा। उसे अब दिशा परिवर्तन करते हुए बाकायदा खुद को लोकल ब्रांड बनाना है, ताकि कभी पंचायत, कभी नगर परिषद, कभी विधानसभा तो कभी संसदीय चुनावों में उसका सिक्का चले। गरीबी से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने के लिए हम सभी नागरिकों को स्थानीय ब्रांड की तरह बीपीएल बने रहना है और इस तरह देश की हर योजना हमें आत्मनिर्भर बनाएगी। इस देश में खुद को रेखांकित करना है तो सदा गरीबी को सुहागिन की तरह अपनाएं, ताकि जब भी जिक्र हो तो फूल बरसें और इस तरह हमारे परिवेश की स्थानीय परंपराएं सदा की तरह शाश्वत रहें।