Thursday, October 01, 2020 12:16 AM

बेरोजगारी के साथ महंगाई भी

एक पखवाड़े के बाद संसद में राष्ट्रीय बजट के प्रस्ताव पेश किए जाएंगे। देश की जनता को उससे कुछ उम्मीदें हो सकती हैं, लेकिन तुरंत राहत बजट से भी नहीं मिलेगी। वित्त मंत्रालय से भी संकेत मिले हैं कि सुस्त अर्थव्यवस्था और बढ़ती महंगाई से फिलहाल राहत संभव नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने देश के चुनींदा उद्योगपतियों से विमर्श किया था, उसके बाद नीति आयोग में भी अर्थशास्त्रियों के साथ उच्चस्तरीय मंथन किया गया। उन संवादों के निष्कर्ष देश नहीं जानता। सत्ता के गलियारों में ही सरकारी सूत्र फरवरी के बाद के हालात को आम आदमी विरोधी मान रहे हैं। बजट उनसे राहत की घोषणा कर सकता है। इसी बीच दो खबरें चौंका देने वाली और अनिश्चित आर्थिक भविष्य को लेकर सामने आईं। सरकार के ही सबसे बड़े भारतीय स्टेट बैंक की रपट है कि 2019-20 के दौरान करीब 16 लाख नौकरियों  के अवसर कम होंगे और सरकारी क्षेत्र में भी करीब 39,000 नौकरियां कम होंगी। बेरोजगारी की आसन्न स्थितियों के बीच दिसंबर की खुदरा महंगाई दर 7.35 फीसदी और थोक महंगाई दर 2.59 फीसदी आंकी गई है, जो नवंबर माह में क्रमशः 5.54 फीसदी और 0.58 फीसदी थी। खाद्य महंगाई दर भी 10.01 फीसदी से 14.12 फीसदी तक बढ़ी है। ये आंकड़े सरकार के हैं और  2014 के बाद सबसे ज्यादा महंगाई दर को  दर्शाते हैं। बेशक इसके पीछे कई कारक हो सकते हैं, लिहाजा सरकार के प्रवक्ता दिलासा दे रहे हैं  कि बेमौसम बरसात और ओलावृष्टि आदि के बुनियादी कारणों से उपजी महंगाई से 14 फरवरी के बाद राहत के आसार दिखने लगेंगे। हम सरकार के इस पक्ष को भी तात्कालिक तौर पर मान लेते हैं, लेकिन सवाल है कि प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री देश को संबोधित कर स्पष्ट क्यों नहीं करते कि आखिर अर्थव्यवस्था मंदी की ओर क्यों बढ़ रही है? इससे उबरने के उपाय क्या हैं और सरकार कारगर तौर पर किन नीतियों पर विचार कर रही है? आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि खुदरा महंगाई दर 10 फीसदी तक पहुंच गई, तो हालात मुश्किल हो जाएंगे! ऐसा ही आकलन रिजर्व बैंक की एक रपट में किया गया है। आर्थिक सुस्ती, बेरोजगारी और उस पर बढ़ती महंगाई भी...आखिर देश को किस गर्त में समाने का इरादा है? कमोबेश सरकार की चुप्पी से आर्थिक हालात संवरने वाले नहीं हैं। सब्जियां करीब 70 फीसदी, आलू करीब 45 फीसदी और प्याज करीब 455 फीसदी तक महंगे हुए हैं। सर्दियों के इस मौसम में भी मटर, साग, गाजर आदि भी अप्रत्याशित तौर पर महंगे बिक रहे हैं। उपभोक्ता संरक्षण, रखरखाव और भंडारण कभी भी प्राथमिक चिंताओं में शामिल नहीं किए गए। उपभोक्ता और मांग ही गायब रहेंगे, तो बाजारों में सक्रियता कैसे दिखाई देगी? गंभीर चिंता का विषय यह है कि यदि निजी और सरकारी क्षेत्रों में इतने व्यापक स्तर पर नौकरियां खत्म होंगी, तो युवा और अपेक्षित नौकरीपेशा जमात कहां जाएगी? यदि काम ही खत्म होने लगे हैं, तो फिर देश खाक विकास कर रहा है! यदि सरकार और बाजार में पैसा ही नहीं है, तो यह दिवालिया होने के हालात हैं! ऐसे में 5 ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था के खोखले सपने क्यों देखे और दिखाए जाएं? नहीं तो प्रधानमंत्री सार्वजनिक तौर पर देश को खुलासा करें कि अर्थव्यवस्था की स्थिति सुधारने को सरकार किस दिशा में काम कर रही है और मौजूदा हालात कब तक रहेंगे? दुर्भाग्य यह है कि देश के आजाद होने के सात दशकों बाद भी ग्रामीण आर्थिक स्थिति पर तो गंभीर चर्चा होती ही नहीं। औसत गांव वाला मात्र 19 रुपए की रोजाना अपने खाने पर खर्च कर पाता है। महीने भर में 600 रुपए भी नहीं। लानत है ऐसी अर्थव्यवस्था पर। यह स्थिति इसलिए है कि ग्रामीण आम आदमी के पास खाने पर खर्च करने को अतिरिक्त आमदनी ही नहीं है। यह स्थिति 6000 रुपए सालाना खैरात में बांटने से नहीं सुधरेगी। बहरहाल इस संदर्भ में तुरंत ही मोदी सरकार को कारगर कदम उठाने पड़ेंगे, क्योंकि अब बारी आप की है।