Sunday, November 17, 2019 03:22 PM

बेसहारा गोधन अर्थव्यवस्था का हिस्सा

प्रताप सिंह पटियाल

लेखक, बिलासपुर से हैं

देश के किसान कर्ज के बोझ तले दबकर गुरबत व मुफलिसी का जीवनयापन कर रहे हों तथा अर्थतंत्र की नुहार बदलने की क्षमता रखने वाला लाखों गोवंश सड़कों की धूल फांक रहा हो तो मुल्क की अर्थव्यवस्था मातम ही मनाएगी...

सदियों पहले भारत की अर्थव्यवस्था विश्वभर में शीर्ष पर काबिज थी, उस दौर में भारत की उत्तम विश्व प्रसिद्ध सफल कृषि शैली तथा मजबूत अर्थतंत्र को स्थिरता देने के पीछे देश के बहुसंख्यक देशी गोधन का सुजात किरदार छिपा था। अनादि काल से ही देशी गोधन भारतीय समाज की समृद्ध संस्कृति का अभिन्न अंग तथा आस्था का केंद्र रहा है। देश के इतिहास में 1857 का विद्रोह हो या 1872 का ‘कूका आंदोलन’ इनके पीछे का कारण गोवंश ही था। गाय व बैल पूजन भारतीय संस्कृति का परिचायक है। पुरातन से ही देश का अर्थशास्त्र कृषि तथा गोधन के ही इर्द-गिर्द घूमता आया है, लेकिन वर्तमान आधुनिकता की चकाचौंध में अपने सुख के मद्देनजर पुरखों की चली आ रही उन परंपराओं तथा आदर्शों की तिलांजलि दी जा चुकी है। आश्चर्यजनक है कि देश के अर्थतंत्र की नुहार बदलने की क्षमता रखने वाला गोवंश जिसकी कीमत करोड़ों रुपए में है यदि लाखों की संख्या में देश की सड़कों की धूल फांक कर अपना भाग्य तराश रहा है और किसान कर्ज के बोझ तले दबकर गुरबत तथा मुफलिसी का जीवनयापन कर रहे हैं, तो सहज ही महसूस किया जा सकता है कि देश की अर्थव्यवस्था मातम ही मनाएगी। भारतीय पौराणिक धर्म ग्रंथों में देश में दूध व घी की नदियां बहने का जिक्र होता है। कामधेनु, नंदिनी तथा कपिला जैसी गउओं का उल्लेख मिलता है मगर फिर भी देश में दूध के संदर्भ में 70 के दशक की श्वेत क्रांति की दुहाई दी जाती है। वास्तव में देश की सड़कों पर आश्रय तराश रहा गोवंश उसी श्वेत क्रांति (आपरेशन फ्लड) की त्रासदी का खामियाजा भुगत रहा है, जब दूध वृद्धि की होड़ में विदेश नस्ल की गाय आयात करके देश की पुरातन धरोहर शुद्ध देशी गोधन को उपेक्षित कर दिया, जिनके आर्गेनिक दूध की गुणवत्ता हमेशा उत्तम श्रेणी में रही है साथ ही विदेशी प्रजाति के टीकों से देशी गाय के स्वरूप को भी बिगाड़ दिया। आलम यह है कि हिमाचल की विशुद्ध पहाड़ी देशी प्रजाति की गाय अपने वजूद को तराश रही है। 50 वर्ष पूर्व तक देश में पशुधन की चरागाहों के नाम पर कई करोड़ एकड़ जमीन आरक्षित थी, मगर धीरे-धीरे उन पशु चरादों पर सियासी रसूखदारी के अतिक्रमण के साथ उद्योगों तथा बिल्डरों ने विकास का नकाब पहनकर चरागाहों में दबिश देकर उनका दायरा समेट दिया। खेतों में ट्रैक्टरों की दखलअंदाजी ने हिमाचल जैसे बैलयुक्त कृषि क्षेत्र से बैलों की अनिवार्यता समाप्त कर दी। बैलों की परंपरा को खत्म करके हमने खुद खेती को महंगा तथा अनिश्चिंतताओं का व्यवसाय बनाकर पहाड़ी कृषि क्षेत्र की संरचना व गुणवत्ता को भी बिगाड़ दिया। पड़ोसी राज्य से प्रतिदिन करोड़ों रुपए का रेडीमेड दूध व दहीं प्लास्टिक की थैलियों में आयात हो रहा है। स्वास्थ्य मानकों की कसौटी पर उस दूध की गुणवत्ता सही नहीं होने पर भी उसे खरीदा जा रहा है। भागदौड़ भरी व्यस्त दिनचर्या में क्वांलिटी तथा क्वालिटी के पैमाने का बोध समझकर भी उसे नजरअंदाज किया जा रहा है। सस्ते राशन के लिए सरकारी डिपुओं पर निर्भरता बढ़ गई, खेतों में खरपतवार तथा घासनियों में गाजर घास ने अधपत्य जमा लिया। कृत्रिम गर्भाधान भी असरहीन हो रहा है, जो लोग एक गाय पालने में समर्थ हैं उन्होंने भी पशुपालन से दूरी बना ली, जिसके चलते देश की अर्थव्यवस्था के मुख्य भागीदार बेजुबान गोवंश के पास सड़कों पर जाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प बचा ही नहीं।

जबकि हिमाचल में पंचायत राज एक्ट के तहत पशुओं को लावारिस छोड़ना अपराध की श्रेणी में आता है। सड़कों पर गोवंश दुर्घटनाओं का कारणा तथा खुद शिकार होकर दयनीय स्थिति से गुजर रहा है। हिंसक बैलों के हमले में कई लोगों की जान जा रही है। मगर बेसहारा पशुओं के आक्रोश तथा टूटता सब्र जो तासूर दे रहा है उस पर और उनके हकूक पर तफसिल से मंथन नहीं हो रहा। गो-संरक्षण कई वर्षों से एक जीवंत मुद्दा बन चुका है। जरूरी है कि सियासत की सरहदों से बाहर निकलकर उस पर गंभीरता से विचार हो। गोसदन, गोशाला, लुभावनी तकरीरें, धरने-प्रदर्शन या शासन व प्रशासन को ज्ञापन तथा गाय का नाम ‘गौरी’ रखने से इस विकराल समस्या का पूर्ण रूप से समाधान नहीं होगा। इन चीजों के साथ व्यवस्था तथा नजरिए में बदलाव की निहायत जरूरत है। व्यवस्था ऐसी बने कि गोधन दोबारा किसनों की निजी गोशालाओं में ही रहकर उपयोगी बने, वही इनका असली आशियाना है गोवंश को लावारिस छोड़ने की नौबत ही न आए। यदि ग्रामीण मईसत तथा आजीविका को मजबूत करने वाले किसानों के इस पुश्तैनी व्यवसाय को स्वरोजगार की दिशा में विशेष बल दिया जाए तो मंदी का संकट झेल रही ग्रामीण आर्थिकी को नए आयाम मिलेंगे। पुरखों से चले आ रहे पशुपालन व्यवसाय में कृषका लंबा व गहन अनुभव रहा है। किसानों का बड़ा तबका आज भी देशी गोपालन का ही पक्ष घर है। इसलिए किसानों को देशी गोपालन की ओर आकर्षित करके पशुपालन व्यवसाय को बेहतर उद्यम बनाने सार्थक प्रयास होने चाहिएं। चूंकि आज भी देश में 70 प्रतिशत किसान पशुपालन व्यवसाय से जुड़े हैं। अतः लाजिमी है कि पशुपालकों को दरपेश आ रही समस्याओं को समझकर इनके हितों की जोरदार पैरवी हो तथा मुफ्तखोरी की चल रही योजनाओं को बंद करके किसानों को सुविधाओं से लैस किया जाए।

कृषि तथा पशुपालन व्यवसाय पर जोर देकर तथा देशी गोवंश आधारित उद्योगों को प्रोत्साहित करके ही किसानों को वित्तीय संकट से उबारा जा सकता है। स्मरण रहे राज्य में जिस गुणवत्तायुक्त प्राकृतिक कृषि की कवायद चल रही है। उस समावेशी कृषि का मूलाधार देशी गोवंश है जो प्राकृतिक कार्य का दायरा बढ़ाने की क्षमता रखता है। मगर जब तक गोधन सड़कों पर रहेगा कृषि तथा आर्थिकी को चुनौती रहेगी। भारत में विश्व की उत्तम नस्ल का स्वदेशी गोधन मौजूद है। इसलिए इसी के पालन को तवज्जो दी जाए और अनियंत्रित संख्या में विदेशी प्रजाति के पशुओं को सड़कों से रुखसत करने के लिए कारगार नीति का मसौदा तैयार करके पुख्ता प्रबंध किए जाएं, ताकि बंजर व वीरान हो रहे कृषि क्षेत्र को बचाया जा सके। बुरे दौर से गुजर रहा गोधन मजबूर होकर बेसहारा हुआ हैं। इसे आवारा कहना उचित नहीं इसके धार्मिक, आर्थिक तथा वैज्ञानिक महत्त्व को समझकर गोधन के प्रति सम्मान भाव जगाकर इनके पालन का साहस करके ही अपने देशी गोधन संपदा के वजूद को बचाया जा सकता है।