Monday, June 01, 2020 02:17 AM

बेहद जरूरी

करीब सवा दो करोड़ की राशि की व्यवस्था करके हिमाचल के चार लोकसभा सांसदों ने कोरोना से निपटने का रास्ता अख्तियार किया है। यह धन उनके संसदीय क्षेत्रों में चिकित्सा संबंधी खरीददारी में काम आएगा। हो सकता है इसी आधार को पुख्ता करते तमाम जन-प्रतिनिधि, समाजसेवी तथा व्यापारी भी आगे आएं,  लेकिन इंतजार हिमाचल व केंद्र सरकारों के वित्तीय फैसलों का हो रहा है। घर के भीतर फंसी दिहाड़ी और दिहाड़ीदार की आवश्यक जरूरतों को मदद की अभिलाषा है। हिमाचल के कुछ औद्योगिक केंद्रों खास तौर पर बीबीएन के हालात में गौर करने की जरूरत है, तो पूरे प्रदेश में फंसे प्रवासी मजदूरों के हाल जानने की प्रक्रिया शुरू करनी होगी। यह हिमाचल के भीतर एक ऐसा आवश्यक हिस्सा है, जिसके कारण औद्योगिक, बागबानी, कृषि व सेवाक्षेत्र धड़कता है। भले ही पंजीकृत व मनरेगा के तहत मजदूरों की संख्या करीब दो लाख है, लेकिन अकेले बीबीएन में ही औद्योगिक श्रेणी में कामगारों का आंकड़ा चार लाख से कम नहीं। हर छोटे-बड़े शहर में सैकड़ों प्रवासी मजदूर हिमाचल के विकास को गिनते हैं, तो कोरोना के भयावह परिदृश्य में इस तपके को संबोधित करना होगा। हिमाचल की जनसंख्या भले ही सत्तर लाख के करीब है, लेकिन इसमें कम से कम दस प्रतिशत अतिरिक्त संख्या प्रवासी मजदूरों के हवाले से जोड़ी जा सकती है। इसी तरह रेहड़ी, खोमचे, फेरी लगाने वालों के साथ-साथ आउटसोर्स सेवाओं और खास तौर पर परिवहन क्षेत्र में बाहरी लोगों की काफी तादाद है। एक मोटे अंदाजे में यह कहा जा सकता है कि हिमाचल की जनसंख्या के ऊपर पंद्रह से बीस प्रतिशत अतिरिक्त आबादी उसी व्यवस्था पर निर्भर है, जो प्रदेश के तौर तरीकों में केवल स्थानीय जनता को ही गिनती है। यह आंकड़ा दस से पंद्रह लाख हो सकता है। ऐसे में आपातकालीन परिस्थितियों में यह योजना भी होनी चाहिए कि चिकित्सकीय खतरों में इस तरह के लोगों की शुमारी को कैसे राहत दी जाए। इस समय प्रवासी व औद्योगिक मजदूरों के लिए राहत देने के साथ-साथ कृषि व बागबानी में शरीक लोगों की जरूरतें भी समझी जाएं। प्रदेश के एक बड़े हिस्से में चारे या तूड़ी के प्रबंधों को खंगालना होगा। यह इसलिए कि तूड़ी के रूप में क्विंटलों सामग्री हर दिन पंजाब या अन्य राज्यों से आती है, तो प्रदेश की ऐसी आपूर्ति को भी निर्वघ्न जारी रखना होगा। प्रदेश भर में अप्रवासी मजदूरों की बस्तियां या शहरी व्यवस्था में बाहर से ही लाए गए सफाई कर्मियों के लिए वित्तीय पैकेज की जरूरत है। हिमाचल में सामाजिक संस्थाओं के जरिए बीबीएन व अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में जनता किचन शुरू किए जा सकते हैं। बहरहाल सांसदों का प्रथम प्रयास सराहनीय व अनुकरणीय है और इसका प्रसार सामाजिक-सामुदायिक स्तर तक होना चाहिए। बेशक हिमाचली समाज ने कर्फ्यू की सीमाओं में अपने आदर्श व संयम कायम करते हुए सारी चुनौती स्वीकार की है, लेकिन जिन हलकों में सरकार का वित्तीय दखल चाहिए वहां त्वरित मदद चाहिए। प्रदेश में स्वरोजगार या युवाओं  द्वारा किए जा रहे व्यापार में निरंतर घाटे को इस दौर की समीक्षा व सहयोग की जरूरत है। निजी क्षेत्र में रोजगार के विविध पहलुओं के बीच ट्रैवल, ट्रांसपोर्ट और होटल व्यवसाय की परिधि में निरंतर घाटे  का संकेत है। मनाली, मकलोडगंज या किसी अन्य पर्यटक व धार्मिक स्थल की आर्थिकी का शून्य, कितने लोगों  को बेरोजगार कर चुका है, इसका कम से कम गणित तो हो जाए। साहसिक खेलों में दर्जनों युवा कब तक बेकार बैठकर बैंक की किस्तें अदा करते रहेंगे। टैक्सी मालिकों या वर्कशाप संचालकों के साथ जो रोजगार दिहाड़ी लगाता था, उसकी क्षतिपूर्ति कैसे होगी। अतः सरकार को अपनी चिकित्सकीय व प्रशासनिक प्राथमिकताओं के साथ यह भी तय करना है कि बढ़ते कर्फ्यू की आफत में, जो वर्ग रोजगार गंवा रहा है या जिनकी दिहाड़ी बंद है,  उन्हें राहत कैसे दी जाए। यह समय सार्वजनिक क्षेत्र को ढोने के साथ-साथ निजी क्षेत्र को अपनाने का भी है, अतः सरकार को अपनी वित्तीय कसौटियां बदलते हुए इस समय की बेहद जरूरी मांग को पूरा करना होगा। सांसदों ने चिकित्सा क्षेत्र की मांग को अपनाते हुए योगदान किया है, तो इसे अंजाम तक पहुंचाने के लिए हिमाचल को  अपने चिकित्सकीय ढांचे में निरंतर सुधार करना होगा। यह समय निजी अस्पतालों को सार्वजनिक मंच पर खड़े करने का भी है, अतः व्यवस्थाओं के नए मानक पैदा करने हैं, तो प्रदेश स्तरीय ढांचे में निजी क्षेत्र को भी जोड़ना होगा। हिमाचल में कुछ ऐसी सेवाएं शुरू हो सकती हैं, जहां समाज व समुदाय अपने आसपास की कुछ जिम्मेदारियां ओढ़ सकता है।