बैंकॉक में हिमाचली पंच का दम

प्रताप सिंह पटियाल

लेखक, बिलासपुर से हैं

दशकों से परंपरागत कुश्ती का गढ़ माने जाने वाले बिलासपुर के कई नामी पहलवानों का करियर शिक्षा व रोजगार जैसी सुविधाओं के अभाव में आगे नहीं बढ़ पाया जो कि राज्य की परंपरागत कुश्ती (छिंज) के वर्चस्व के लिए चुनौती बन गया। बहरहाल आशीष ने अंतरराष्ट्रीय पटल पर अपने खेल का डंका बजाकर यह साबित कर दिया कि पहाड़ की माटी के मेहनतकश खिलाडि़यों का खेल हुनर अंतरराष्ट्रीय खेल के मानचित्र पर देश का परचम लहराने की पूरी कुव्वत रखता है...

पहाड़ी प्रदेश हिमाचल के शांत व साधारण वातावरण से अनेक खेल प्रतिभाएं निकल रही हैं, जो क्रिकेट, कबड्डी, हैंडबाल के साथ देश में खेले जाने वाले लगभग हर खेल में अपना योगदान देकर अमिट छाप छोड़ रहे हैं तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व करके देश को गौरवान्वित कर रहे हैं। ऐसे ही बॉक्सिंग में उभरते अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी हैं आशीष चौधरी जिनका ताल्लुक मंडी जिला से है। थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में आयोजित एशियाई चैंपियनशिप में इस 25 वर्षीय खिलाड़ी ने 75 किलोग्राम भार वर्ग में अपनी मुक्केबाजी के दम से चीन, किर्गिस्तान व ईराक जैसे देशों के खिलाडि़यों को धूल चटाकर फाइनल में प्रवेश किया। फाइनल मैच में कजाकिस्तान के बॉक्सर से कड़े मुकाबले में स्वर्ण पदक से जरूर चूक गुए, लेकिन अपने बेहतरीन प्रदर्शन से भारत के लिए सिल्वर मेडल जीतकर देश सहित अपने प्रदेश का भी मान बढ़ाया है।

आशीष पहले हिमाचली खिलाड़ी हैं, जिन्हें एशियन चैंपियनशिप में मेडल जीतने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अपने दमदार प्रदर्शन से इस खिलाड़ी ने खेल प्रेमियों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया, उनकी इस उपलब्धि से राज्य में खुशी का माहौल है। अपने दस साल के कड़े प्रशिक्षण, मेहनत व लगन से आज आशीष ने बॉक्सिंग में जो मुकाम हासिल किया है, इस उपलब्धि के पीछे उनके प्रशिक्षकों की भी उतनी ही कड़ी मेहनत है, जो कि युवा वर्ग के लिए प्रेरणा स्रोत है। बॉक्सिंग में उम्दा प्रदर्शन के लिए इसी वर्ष 25 जनवरी को पूर्ण राज्यत्व दिवस समारोह में आशीष चौधरी को राज्य सरकार ने अन्य खिलाडि़यों के साथ ‘परशु राम अवार्ड’ से भी नवाजा है।

यह संयोग है कि जब आशीष ने 2015 में केरल में आयोजित राष्ट्रीय खेलों में मुक्केबाजी में अपने भारवर्ग का स्वर्ण पदक जीता था, तब इस खिलाड़ी को धर्मशाला कैंट में कार्यरत सेना की ‘पंजाब बटालियन’ ने बुलाकर बाकायदा सम्मानित करके भविष्य के लिए प्रोत्साहित किया था, लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि राज्य सरकारें व खेल संघ राज्य के इन पूर्व ओलंपिक तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय खिलाडि़यों के कड़े परिश्रम तथा खेलों के गहन अनुभव का कोई लाभ नहीं ले सके। साथ ही ये खिलाड़ी प्रदर्शन व प्रतिष्ठा के अनुरूप वांछित सम्मान से भी वंचित रहे जो राज्य की खेलों के लिए हानिकारक ही रहा। गौरतलब रहे भारतीय सेना उभरती खेल प्रतिभाओं के लिए एक बड़ा मंच है, आज भारत के नीरज चोपड़ा, अमित पंधाल व जीतू राय जैसे कई अन्य स्टार अंतरराष्ट्रीय खिलाडि़यों का संबंध सेना से है। सेना ने कई खिलाडि़यों को मंच प्रदान करके उनकी खेल प्रतिभा को निखारा है। दूसरा योगदान रेलवे का है और भारतीय कुश्ती में गुरु हनुमान के अखाड़े के योगदान को कदाचित नहीं भुलाया जा सकता। इन्हीं की तर्ज पर यदि खेल विभाग, खेल संघ तथा राज्य सरकारें  नई खेल पालिसी के साथ दिलचस्पी से काम करें तो खिलाड़ी अपने राज्य में तैयार होकर देश का प्रतिनिधित्व करने में समर्थ बन सकते हैं।  खेल तंत्र को मजबूत करने के लिए खेल विभागों को तत्परता दिखानी होगी तथा राज्य सरकारों को स्कूलों व कालेजों में रिक्त चल रहे शारीरिक शिक्षकों के पदों पर अनुभवी प्रशिक्षकों की तैनाती करनी चाहिए। जो नौनिहालों को प्राइमरी स्तर से ही परख कर उनके कौशल को निखारने में भरसक प्रयास व मदद करें, तभी उत्साहजनक खेल वातावरण बनेगा तथा खिलाडि़यों की नई पौध तैयार होगी। आज हमारे खिलाड़ी जिस शिद्दत से अंतरराष्ट्रीय पटल पर दिन-रात मेहनत व लगन से देश व राज्य को नई पहचान दिलाने में जुटे हैं उस संघर्ष के अनुरूप वैश्विक स्तरीय मुकाबलों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर का उच्च स्तरीय प्रशिक्षण तथा रोजगार जैसी सुविधाओं की दरकार है। इसके लिए दूरदर्शी खेल नीति के साथ खेल ढांचे को मजबूत करके खिलाडि़यों  को पर्याप्त सुविधाएं मुहैया करानी होंगी। दूसरा बॉक्सर तथा पहलवान खिलाडि़यों के भविष्य पर सबसे बड़ी समस्या जो आड़े आती है वह स्कूली शिक्षा है।

दोनों ही खेलों में खिलाडि़यों को कई घंटे के कड़े प्रशिक्षण के बाद उसके अनुरूप डाइट भी चाहिए तथा उसके बाद आराम की जरूरत है, लेकिन तमाम तरह की सुविधाओं के अभाव के बावजूद आर्थिक तंगी से जूझते खिलाडि़यों की तुलना शिक्षा की डिग्रियों तथा अंकों के आधार पर आंकी जाती है। नतीजतन खेल तथा खिलाड़ी आगे नहीं बढ़ते और न ही खेलों की ऊंचाइयों तक पहुंच पाते हैं। जो आगे निकलते भी हैं वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के मुकाबलों पर पिछड़ जाते हैं, फिर उन्हें हम मेडलों के लिए कोसते हैं। इसी कारण दशकों से परंपरागत कुश्ती का गढ़ माने जाने वाले बिलासपुर के कई नामी पहलवानों का करियर शिक्षा व रोजगार जैसी सुविधाओं के अभाव में आगे नहीं बढ़ पाया जो कि राज्य की परंपरागत कुश्ती (छिंज) के वर्चस्व के लिए चुनौती बन गया। बहरहाल आशीष ने अंतरराष्ट्रीय पटल पर अपने खेल का डंका बजाकर यह साबित कर दिया कि पहाड़ की माटी के मेहनतकश खिलाडि़यों का खेल हुनर अंतरराष्ट्रीय खेल के मानचित्र पर देश का परचम लहराने की पूरी कुव्वत रखता है। राज्य सरकार से आग्रह रहेगा कि इस उभरते खिलाड़ी ने जो शौहरत कमाई है, उसके अनुसार इसका व इसके प्रशिक्षकों का भी सम्मान हो, ताकि भविष्य में मुकाबलों में इन्हें प्रोत्साहन मिले तथा उनके सार्थक परिणाम निकलें।

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