बैसाखी का संबंध रबी की फसल से है

बैसाखी का त्योहार पहली बैसाख-13 अप्रैल को लगभग सारे देश में मनाया जाता है। इस त्योहार का संबंध रबी की फसल के आने से प्रतीत होता है। इस दिन तीर्थ स्थानों पर या वैसे भी स्नान करना पुण्य का कार्य माना जाता है। इस दिन बिलासपुर में मारकंड, मंडी में रिवालसर और पराशर झीलों, तत्तापानी, शिमला व सिरमौर के क्षेत्रों में गिरीगंगा, रेणुका झील आदि, कांगड़ा में बाणगंगा  तथा अन्य जल तीर्थों पर स्नान किया जाता है...

गतांक से आगे ...

बैसाखी :

 बिस्सू या बिस्सा (शिमला), बीस (किन्नौर), बओसा (बिलासपुर-कांगड़ा) लिसू (पांगी) नामों से ज्ञात वह बैसाखी का त्योहार पहली बैसाख-13 अप्रैल को लगभग सारे देश में मनाया जाता है। इस त्योहार का संबंध रबी की फसल के आने से प्रतीत होता है। इस दिन तीर्थ स्थानों पर या वैसे भी स्नान करना पुण्य का कार्य माना जाता है। इस दिन बिलासपुर में मारकंड, मंडी में रिवालसर और पराशर झीलों, तत्तापानी, शिमला व सिरमौर के क्षेत्रों में गिरीगंगा, रेणुका झील आदि, कांगड़ा में बाणगंगा  तथा अन्य जल तीर्थों पर स्नान किया जाता है। नए कपड़े पहने जाते हैं और मीठे पकवान बनाए जाते हैं। इस दिन इन तीर्थ स्थानों पर मेलों का आयोजन होता है। तीर्थ स्थानों के अतिरिक्त गांवों में वैसे भी मेलों का आयोजन किया जाता है। इस दिन जगह-जगह प्याऊ लगाए जाते और मीठा शर्बत लोगों को पिलाया जाता है। कई लोग यज्ञों का आयोजन भी करते हैं।

नाहौले :

ज्येष्ठ मास की संक्रांति (13-14 मई) को निम्न शिवालिक भाग के क्षेत्रों में नाहौले नामक त्योहार मनाया जाता है, जिसमें मीठे पकवान बनाकर खिलाए जाते हैं। ये चंबा के गद्दी लोगों के नवाला से अलग है।

हरियाली तृतीय (कांगड़ा, सिरमौर), हरयाली (शिमला), दखरैणा (जुब्बल-किन्नौर), शेगत्सुम (लाहुल), चिड़न (बिलासपुर मंडी) आदि :

 यह त्योहार श्रावण मास की संक्रांति (13-14 जुलाई) को मनाया जाता है, जिसका संबंध आने वाली वर्षा ऋतु से होता है। जहां इस दिन लोग मीठे पकवान बनाते हैं, पशुओं से जूं, चचड़ (पिस्सू) और पिथड़ आदि निकालकर गोबर में डालकर चौराहे पर जलाए जाते हैं। ऐसा करने से बरसात में पशुओं को इन कीड़ों से राहत मिलती है -ऐसा लोगों का विश्वास है। लाहुल में इस त्योहार को शेगत्सुम कहते हैं इस दिन सवेरे ही लोग ‘टोह’ (सत्तु का गोला बनाकर ऊपर मक्खन रखे हुए) और पीले फूल तथा धूप जलाकर घर की छत्तों पर ले जाते हैं और उन्हें हवा में फेंककर ‘गेफा’ यानी गुरु को भेंट चढ़ाते हैं।

रक्षाबंधन, रखड़ी या रखडुन्या (बिलासपुर आदि), रक्षपुन्या (शिमला), सलूनू (मंडी-सिरमौर) :

 यह त्योहार भादों मास में पड़ने वाली पूर्णमासी को मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों को टीका लगाकर राखी बांधती हैं और उसके बदले उन्हें पैसे या कपड़े आदि देते हैं। पुरोहित भी इस दिन घर-घर जाकर अपने यजमानों को राखी बांधते हैं जो रक्षा का प्रतीक मानी जाती हैं।