Saturday, January 25, 2020 11:24 PM

भविष्य को समझने की वकालत

गांव को व्यवस्थित तथा आवासीय व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए हरियाणा सरकार की पहल से हिमाचल भी कुछ सीख सकता है। उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला ग्रामीण कालोनियोें का निर्माण करने की दिशा में जो अभिनव प्रयोग करने जा रहे हैं, उससे दो फायदे होंगे। एक तो लोग शहरी सुविधाओं खास तौर पर आवासीय व्यवस्था को अपने नजदीक पाएंगे। दूसरी शहरीकरण की चपेट से गांव बच जाएंगे। यह कदम भविष्य की जरूरतों को समझने की वकालत सरीखा है और हरियाणा इस तरह दूसरी बार शहर और गांव के बीच न्याय के सेतु खड़ी कर रही है। हरियाणा ने वर्षों पहले ही शहरीकरण को समझा और ऐसी बुनियाद रख दी कि आज प्रदेश की तस्वीर, एक निश्चित खाके के तहत मजबूत दिखाई देती है। इधर हिमाचल ने वर्षों शहरीकरण को नजरअंदाज करते हुए केंद्र की ग्रामीण विकास योजनाओं का भरपूर आनंद लिया। बदले में यह तथ्य विस्मृत किया कि शहर आवारगी पर उतर रहे हैं या इसी उधेड़बुन में शहर से गांव तक अफरा तफरी फैल गई। लोग सड़कों के किनारों पर आवासीय या व्यापारिक प्राथमिकताएं स्थापित करने लगे, नतीजतन न शहर बसा और न ही गांव बचा। हालत यह है कि अब 27 गांवों को मिलाकर पालमपुर को समझा जा रहा है। मंडी से निकल शहर कब नेरचौक पहुंच गया या आगे बढ़कर इसने सुंदरनगर से मिलन कर लिया, इसकी जानकारी योजनाकारों को नहीं। आश्चर्य यह कि कमोबेश हर सरकार इस ताक में रही कि किस तरह ग्राम एवं नगर योजना कानून के दायरे में गांवों को सियासी कारणों से बाहर कर दिया जाए। यह कोशिश पुनः शीतकालीन सत्र में होगी। साडा यानी विशेष विकास योजना क्षेत्रों की आज तक न परिभाषा बनी और न ही प्रारूप। इसलिए राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल जब कसौली, मनाली, मकलोडगंज या शिमला के कान पकड़ती है, तो पता चलता है कि इस विकास के हम या हमारे नीति-नियम किस हद तक कातिल रहे हैं। बहरहाल हरियाणा के पानीपत व हिसार जिलों के बड़े गांवों में कालोनियां विकसित करके सरकार पूरे प्रदेश को नियोजित ही नहीं, बल्कि भविष्य के अनुरूप ढांचागत सुविधाएं प्रदान करने जा रही है। इससे पूर्व गांव व शहरी विकास के लिए दो विकास प्राधिकरणों का गठन करके हरियाणा में लक्ष्य निर्धारित किए गए थे, जिन्हें फिर से सक्रिय किया जा रहा है। इस तरह गांव की जमीन का मूल्यांकन तथा विकास के आधार के रूप में पारदर्शी इस्तेमाल होगा। हिमाचल में कभी हिमुडा के मार्फत कुछ शहरी कालोनियां बनी थीं, लेकिन राजनीतिक खींचतान में इसकी योग्यता ही डूब गई। वर्षों पहले एक सर्वेक्षण के तहत आवासीय मांग का अंदाजा लगाने की कोशिश में यह स्पष्ट हुआ कि करीब 75 हजार लोग हिमुडा की आगामी परियोजनाओं का हिस्सा बनेंगे, लेकिन आज भी ये खाक  छान रहे हैं। उपग्रह नगरों से विशेष बस्तियां बनाने के नक्शे ही अगर मुकम्मल नहीं, तो पूरे प्रदेश का नियोजन कैसे होगा। शहरों के वर्तमान ढांचे की सबसे अधिक दुर्दशा सोलन मेें है, जहां हजारों अपार्टमेंट बनने के बावजूद व्यवस्था दिखाई नहीं देती। विस्थापन ने बिलासपुर को आधुनिक बनने की आशा दी, लेकिन यह सफर आज भी अधूरा है। स्व. वाईएस परमार ने परवाणू में विकसित होते शहर को औद्योगिक व आर्थिक ढांचे के साथ जोड़ा, वरना आजादी के बाद और औद्योगिक पैकेज के साथ भी बीबीएन की तस्वीर आज भी खोटे सिक्के की तरह है। इस बीच बहुत सारे गांव व कस्बे अपनी व्यापारिक क्षमता से फूलते गए, लेकिन इस प्रक्रिया को आज तक समझा ही नहीं गया। घुमारवीं को गांव मानें, कस्बा कहें या भविष्य का शहर, लेकिन वहां के भविष्य को किसी विकास योजना का आसरा नहीं मिला। कांगड़ा का गगल कस्बा अपनी व्यापारिक उड़ान में मशहूर और व्यस्त होता गया, लेकिन भविष्य को रेखांकित नहीं कर पाया। हवाई अड्डे की निगाहों में चढ़े गगल या भुंतर को पर्यटन का प्रवेश द्वार कैसे बनाएं, यह समझा ही नहीं गया। हिमाचल के गांवों में अगर बस स्टाप की जगह भी मुकर्रर हो जाए, तो एक तरह का विकास हो जाएगा। ग्रामीण या शहरी चौराहों को व्यवस्थित कर दिया जाए, तो विकास हो जाएगा। गांव की खड्डों, कूहलों या प्राकृतिक जल स्रोतों को बचा लें, तो विकास हो जाएगा। कम से कम हर गांव में बच्चों को खेलने का मैदान, वाहनों को खड़ा करने की जगह, श्मशानघाट और ग्रामीण विभागों को संयुक्त भवन की उपलब्धता करा दी जाए, तो विकास हो जाएगा। कम से कम यह सुनिश्चित किया जाए कि गांव की जमीन का गलत इस्तेमाल न हो और इसके सदुपयोग के लिए लैंड पूलिंग करके विस्तृत भूमि बैंक बनाया जाए, तो भविष्य की आशा व गरिमा बची रहेगी, वरना निर्माण के ढेर के नीचे सुकून ही नहीं बचेगा।