Wednesday, November 21, 2018 07:49 AM

भारतीय राजनीति के अंधेरे-उजाले

पीके खुराना

लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं

पिछले वर्ष के वित्त विधेयक में सरकार ने यह प्रावधान किया था कि विदेशी कारपोरेट कंपनियां राजनीतिक दलों को गुप्त रूप से भी फंड दे सकती हैं, उसकी कोई उच्चतम सीमा भी नहीं होगी और उनसे या संबंधित राजनीतिक दलों से इस बारे में पूछताछ भी नहीं की जा सकेगी। लेकिन जब सरकार की नजर में यह तथ्य आया कि भाजपा को 1976 से ही विदेशी फंडिंग मिलती रही है, तो इस साल के बजट में एक लाइन जोडक़र इस छूट को 5 अगस्त, 1976 की तारीख से लागू कर दिया, ताकि वह ‘फेरा’ (फारेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट) से बच सके...

राजनीति में आगे बढऩे के लिए आपको लोगों की धारणाओं को इस प्रकार से बदलना होता है कि वे आपको पसंद करने लगें, दूसरों से बेहतर समझने लगें, आपके प्रशंसक बन जाएं और प्रशंसा की वह भावना इतनी मजबूत हो कि चुनाव के समय मतदाता आपको वोट दें। यही कारण है कि सरकारें अपनी उपलब्धियों के आंकड़े जारी करती रहती हैं।  समस्या यह है कि यह कोई जरूरी नहीं है कि वह आंकड़े सही ही हों। आंकड़ों के स्रोत भी अलग-अलग होते हैं, वे कितने विश्वसनीय हैं, यह हमेशा से बहस का विषय रहा है, तो भी आंकड़ों का खेल चलता ही रहता है, क्योंकि आम जनता को भ्रम में रखने का यह बड़ा सरल उपाय है। आंकड़ों की कलाबाजियों में एक और तथ्य यह है कि आंकड़ों के मानक को बदलकर, उनकी पैमाइश के तरीकों को बदलकर, या कभी-कभी तो आंकड़ों के आधार के वर्ष को बदलकर भी आंकड़ों में भारी फेरबदल संभव है और सरकारें यह सब कुछ करती हैं, चुपचाप करती हैं। राजनीति के इन्हीं अंधेरों-उजालों के बीच विभिन्न राजनीतिक दल अपनी-अपनी रोटियां सेंकने का प्रबंध करते हैं। वरिष्ठ पत्रकार टीएन नाइनन ने जीडीपी की दरों को नापने की प्रक्रिया के बारे में जो खुलासा किया है, वह भी हम सबकी आंखें खोलने वाला है। वह कहते हैं कि जीडीपी के आंकड़े अंतत: किसी के विचार हैं, पूर्णतया तथ्य नहीं। यह प्रक्रिया हद से अधिक जटिल है और निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए हर प्रकार के, यहां तक कि कभी-कभी तो मनमाने अनुमान भी लगा लिए जाते हैं। खासकर भारत जैसी अर्थव्यवस्था में, जहां असंगठित क्षेत्र कहीं बड़ा है, जो भी जीडीपी दर बताई जाए, वह एक अनुमान ही रहेगी। इसलिए 7.5 प्रतिशत असल में 7 प्रतिशत भी हो सकती है और इसका उल्टा भी संभव है। इन दशमलव अंकों को लेकर राजनीतिक गाली-गलौज की हद तक उतर जाना मूर्खता के अलावा कुछ नहीं है। लब्बोलुआब यह कि आंकड़े सिर्फ आंकड़े हैं, वास्तविक जीवन से और जीवन की सच्चाइयों से इनका कुछ भी लेना-देना नहीं है।

दरअसल, यह आभासी वास्तविकता यानी वर्चुअल रियल्टी जैसा है, जो सिर्फ शून्य में कहीं है, जीवन में नहीं है। समस्या यह है कि इसके लिए किसी एक सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। सभी सरकारें ऐसा ही करती हैं और विपक्ष में होने पर नेतागण इस तथ्य को सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी करते रहे हैं। राजनीतिक आंकड़ेबाजी के बारे में एक और बात यह कही जाती है कि जब कोई नेता विपक्ष में होता है, तो वह महंगाई की बात करता है और हर खाद्यान्न के खुदरा मूल्य का जिक्र करता है, लेकिन वही नेता जब सत्ता में होता है तो वह खुदरा मूल्य के बजाय, यहां तक कि थोक मूल्य के भी बजाय थोक मूल्य सूचकांक की बात करता है। तब वह रुपयों में मूल्य का जिक्र नहीं करता, प्रतिशत में बात करता है। जनता को भरमाने का यह बढिय़ा औजार है, लेकिन नेतागण यह भूल जाते हैं कि आम आदमी का वास्ता चीजों के खुदरा मूल्य से होता है। उसे इससे मतलब है कि आटा, दाल, चावल, भाजी उसे किस दाम पर मिले, वहां प्रतिशत की कोई गुंजाइश नहीं है। उसके लिए यह महत्त्वपूर्ण है कि कोई दाल जो कल तक 60 रुपए किलो मिल रही थी, वह आज उसे 70 रुपए किलो मिल रही है।

आम आदमी 60 और 70 की तुलना करता है, वह प्रतिशत में सोचता ही नहीं। यही कारण है कि प्रतिशत की जुमलेबाजियां उसे छू नहीं पातीं। आंकड़ों को बदलना, उनके आधार को बदलना, पैमाइश की प्रक्रिया को बदलना आदि तो सामान्य बातें हैं ही, उससे भी बड़ी बात है कानून की पतली गलियों को खोजकर अपने चहेतों को फायदा पहुंचाना, अपने भ्रष्टाचार पर परदा डालना या अपने पद और शक्तियों का दुरुपयोग करना। मैं फिर यही कहना चाहूंगा कि यह सब किसी एक सरकार या किसी एक राजनीतिक दल का ही तमाशा नहीं है, बल्कि तमाम राजनीतिक दल, नेतागण और सरकारें ऐसा करती आई हैं। मोदी सरकार भी पिछली सरकारों का अपवाद नहीं है, बल्कि यह कहा जाना चाहिए कि राजनीतिक आंकड़ेबाजी के अंधेरों-उजालों में मोदी बाकी सबसे कहीं आगे हैं। वह गड़बडिय़ां भी करते हैं, तो उन्हें इस तरह से पेश करते हैं कि उन्नति का या विकास का श्रेय ले सकें। उनकी इसी खूबी का कमाल है कि मतदाताओं का बड़ा भाग उन्हें मसीहा के रूप में पूजता है, जो भारतवर्ष का उद्धार करने के लिए अवतरित हुआ है। मुद्दे की बात यह है कि खेल आंकड़ों का हो या भ्रष्ट आचरण को ढकने का, मोदी भी किसी से कम नहीं हैं। इसी वर्ष वित्त मंत्री अरुण जेतली ने जो वित्त विधेयक पेश किया, उसमें एक छोटी सी चालाकी से उन्होंने भाजपा और कांग्रेस को भ्रष्ट आचरण के एक आरोप से चुपचाप बरी करवा लिया। पिछले वर्ष के वित्त विधेयक में सरकार ने यह प्रावधान किया था कि विदेशी कारपोरेट कंपनियां राजनीतिक दलों को गुप्त रूप से भी फंड दे सकती हैं, उसकी कोई उच्चतम सीमा भी नहीं होगी और उनसे या संबंधित राजनीतिक दलों से इस बारे में पूछताछ भी नहीं की जा सकेगी। लेकिन जब सरकार की नजर में यह तथ्य आया कि भाजपा को 1976 से ही विदेशी फंडिंग मिलती रही है, तो इस साल के बजट में एक छोटी सी लाइन जोडक़र इस छूट को 5 अगस्त, 1976 की तारीख से लागू कर दिया गया, ताकि वह ‘फेरा’ के नाम से प्रसिद्ध फारेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट से बच सकें।

लोकसभा में शोर-शराबे के चलते इस वर्ष का वित्त विधेयक बिना किसी बहस के पास कर दिया गया और राजनीतिक दलों को अवैध विदेशी फंडिंग का मामला एक झटके में वैध हो गया। पिछले ही साल दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को राजनीतिक दलों द्वारा फेरा के उल्लंघन के मामलों की जांच का आदेश दिया था। इससे भी बड़ी बात यह है कि सन् 2016 और 2017 के वित्त विधेयक में फेरा के प्रावधानों को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर हुई थी, उसी संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को नोटिस भेजा था। उस जनहित याचिका के परिणाम से बचने के लिए सरकार ने इस साल फिर यह संशोधन पास करवा लिया है। अदानी और अंबानी को दी जाने वाली सुविधाओं के अलावा राफेल का मामला गर्मागर्म बहस का विषय बना ही हुआ है। सच्चाई यह है कि सरकारी आंकड़ों और दावों पर विश्वास करने से पहले उन्हें अन्य स्रोतों से जांच कर ही सच को समझा जा सकता है।

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