Thursday, October 17, 2019 01:45 AM

भारत की संसद का सच

पीके खुराना

वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार

प्रधानमंत्री की असीम शक्तियों के सामने हर दूसरा व्यक्ति कठपुतली जैसा है। सांसदों के वेतन-भत्ते तथा उनको मिली अन्य सुविधाओं पर अनाप-शनाप धन खर्च होता है, लेकिन यदि 543 सांसदों में से कानून बनाने की भूमिका सिर्फ मंत्रिमंडल की ही है, तो फिर 543 सांसद चुनने और उन पर धन बेकार करने का क्या तुक है? क्या हमें यह नहीं तय करना चाहिए कि करदाताओं के इस धन का सही उपयोग हो और हम सिर्फ  उतने ही सांसद चुनें, जितने मंत्रिमंडल के लिए आवश्यक हैं। यह एक अहम सवाल है और हमें पूरी गंभीरता और जिम्मेदारी से मंथन करना होगा कि देश के भविष्य के लिए क्या उपयुक्त है...

हमारे देश में ब्रिटिश संसदीय प्रणाली से प्रेरित संसदीय शासन प्रणाली लागू है, जो मुख्यतः ब्रिटिश संसदीय प्रणाली से प्रेरित है। संसदीय शासन प्रणाली इंग्लैंड में इसलिए सफल है, क्योंकि वह एक छोटा देश है और वहां का समाज दो मुख्य विचारधाराओं में बंटा हुआ है। भारत जैसे बड़े और विभाजित विचारधाराओं वाले देश में संसदीय प्रणाली के सामने कई चुनौतियां हैं। इस प्रणाली का नियम यह है कि चुनाव में बहुमत प्राप्त करने वाले दल अथवा गठबंधन का नेता केंद्र में प्रधानमंत्री बनता है और चुनाव जीत कर आए सांसदों में से अपनी मंत्रिपरिषद के सदस्य चुनता है। सरकार की इस प्रणाली के तीन अंगों यानी विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में से संसद को सर्वोच्च माना गया है। संसद कानून बनाती है, न्यायपालिका उनकी व्याख्या करती है और कार्यपालिका उन कानूनों के अनुसार शासन चलाती है। लोकसभा को संसद का निचला सदन कहा जाता है, जिसके 543 सदस्य देशभर से चुनकर आते हैं, मतदाता के रूप में जिन्हें हम चुनते हैं। संविधान द्वारा लोकसभा और राज्यसभा के कुल सदस्यों की संख्या 795 निश्चित की गई है।

अपना प्रतिनिधि चुनने के लिए मतदाता को बिना किसी दबाव के अपनी पसंद के प्रत्याशी को वोट देने का अधिकार है और यह हमारे लोकतंत्र की मजबूती का प्रमाण है कि मतदान करने वाले मतदाताओं का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है। यही नहीं, गरीब-गुरबा भी मतदान में उत्साहपूर्वक हिस्सा लेकर मतदान करते हैं। मतदान गुप्त होता है और गुप्त मतदान का यह तरीका इतना कारगर है कि चुनाव परिणामों की भविष्यवाणी करने वाले पंडित भी कई बार सटीक भविष्यवाणी में असफल रहते हैं। गुप्त मतदान का यह तरीका मतदाता की सबसे बड़ी शक्ति है और हमारे देश के नागरिकों ने समय-समय पर इस शक्ति का भरपूर उपयोग किया है। संसद का अधिकार है कि वह देश में शासन चलाने के लिए आवश्यक कानून बनाए। किसी पुराने कानून में संशोधन करे या उसे पूरी तरह से निरस्त कर दे। व्यवस्था यह है कि संसद कानून बनाएगी और प्रधानमंत्री के नेतृत्व में कार्यपालिका उसे लागू करेगी, लेकिन व्यवहार में यहां कई पेंच छिपे हुए हैं। पहला तो यह कि प्रधानमंत्री को संसद का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही कभी भी संसद भंग करने और मध्यावधि चुनाव करवाने का अधिकार है। इससे सरकार संसद पर हावी है और स्थिति उलट गई है, क्योंकि व्यवहार में संसद सरकार के नियंत्रण में आ गई है। संसद की शक्तियों के क्षरण की सीमा यह है कि संसद अपनी मर्जी से कोई कानून पास नहीं कर सकती, क्योंकि प्रधानमंत्री के दल का बहुमत है और संसद में सिर्फ वही बिल पास होते हैं, जो सरकार द्वारा लाए जाते हैं। यह समझना भी आवश्यक है कि सत्ताधारी दल के वे सदस्य, जो मंत्रिमंडल में शामिल नहीं हैं, वे भी संसद में कोई बिल पेश करें, तो उसे निजी बिल माना जाता है और उनके बिल सरकारी बिलों में शामिल नहीं होते। यह एक कड़वा सच है कि सन् 1970 के बाद एक भी निजी बिल कानून नहीं बन पाया है। कानून बनाने में न तो विपक्ष की कोई भूमिका है और न ही सत्ताधारी दल के उन सदस्यों की, जो मंत्रिमंडल में शामिल नहीं। ऐसे में यह धारणा कि संसद कानून बनाती है, असल में गलत है। सच्चाई यह है कि सरकार ही कानून बनाती है और सरकार ही कानून लागू भी करती है। दूसरा महत्त्वपूर्ण पेंच यह है कि दल-बदल विरोधी कानून लागू होने के बाद पार्टी हाइकमान को पार्टी के मालिक का हक मिल गया है और हाइकमान एक व्यक्ति, एक परिवार या एक गुट तक सीमित रहता है। दल के शेष छोटे-बड़े नेता हाइकमान के आदेशों को मानने के लिए विवश हैं। दल क्षेत्रीय हो या राष्ट्रीय, सब जगह एक सी कहानी है। चुनाव में जीत के लिए पार्टी के लेबल का बहुत महत्त्व है, इसलिए राजनीति में सक्रिय कोई भी नेता पार्टी हाइकमान के निर्देशों की अवहेलना नहीं कर पाता। संसद या विधानसभा में किसी भी मुद्दे पर वोटिंग के समय पार्टियां ह्विप जारी करती हैं, जिसका अर्थ यह है कि उस पार्टी का सदस्य संसद या विधानसभा में पार्टी के आदेशों के अनुसार वोट देने के लिए विवश है। इसका मतलब यह है कि देश के नागरिकों को अपना प्रतिनिधि चुनने के लिए अपनी मर्जी से वोट देने का अधिकार है, लेकिन चुने गए प्रतिनिधियों को संसद अथवा विधानसभा में अपनी मर्जी से वोट देने का अधिकार नहीं है, चाहे वे अपनी पार्टी के स्टैंड से सहमत हों या नहीं। संसद अथवा विधानसभाओं में किसी भी मुद्दे पर वोटिंग से पहले ही हमें पता होता है कि उसके पक्ष अथवा विपक्ष में कितने वोट पड़ेंगे और यह भी कि कौन किस तरफ  वोट देगा। इससे मतदान की प्रासंगिकता ही समाप्त हो जाती है और सांसद या विधायक पिंजरे के उस तोते की तरह बन कर रह जाते हैं, जो केवल सिखाए गए शब्द ही बोल सकते हैं। सरकार जो बिल लाती है, उसके दल के लोग उसके पक्ष में वोट देने के लिए विवश हैं। इसलिए संसद में बिल पर होने वाली बहस राजनीति से प्रेरित होती है। दल की नीति और वोट बैंक को निगाह में रख कर आलोचना या प्रशंसा की जाती है, उसका जनहित से कोई लेना-देना नहीं होता। ऐसे में जनहितकारी राज्य की अवधारणा भ्रम मात्र है। प्रधानमंत्री की असीम शक्तियों के सामने हर दूसरा व्यक्ति कठपुतली जैसा है। सांसदों के वेतन-भत्ते तथा उनको मिली अन्य सुविधाओं पर अनाप-शनाप धन खर्च होता है, लेकिन यदि 543 सांसदों में से कानून बनाने की भूमिका सिर्फ मंत्रिमंडल की ही है, तो फिर 543 सांसद चुनने और उन पर धन बेकार करने का क्या तुक है?

क्या हमें यह नहीं तय करना चाहिए कि करदाताओं के इस धन का सही उपयोग हो और हम सिर्फ  उतने ही सांसद चुनें, जितने मंत्रिमंडल के लिए आवश्यक हैं। यह एक अहम सवाल है और हमें पूरी गंभीरता और जिम्मेदारी से मंथन करना होगा कि देश के भविष्य के लिए क्या उपयुक्त है। या तो हम शासन प्रणाली में परिवर्तन करें या फिर सांसदों की संख्या पर अंकुश का प्रावधान करें, ताकि विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाने वाला देश वास्तविक प्रगति के पथ पर ले जाया जा सके।

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