भारत के आर्थिक मौके

डा. जयंतीलाल भंडारी

विख्यात अर्थशास्त्री

यदि हम चाहते हैं कि भारत चीन की मंदी के बीच तेजी से उभरते हुए आर्थिक मौकों को अपनी मुट्ठियों में कर लें, तो हमें कई बातों पर ध्यान देना होगा। हमें आर्थिक सुधारों को गतिशील करना होगा। देश में कर सरलीकरण के प्रयासों से भी अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। विभिन्न आर्थिक अध्ययन रिपोर्टों से यह बात उभरकर सामने आ रही है कि जीएसटी भारत के लिए लाभप्रद है, लेकिन उपयुक्त क्रियान्वयन के अभाव में इसका लाभ अर्थव्यवस्था को पर्याप्त रूप में नहीं मिल पाया...

पिछले दिनों 31 जुलाई को चीन के शंघाई में चीन और अमरीका के उच्च स्तरीय अधिकारियों के बीच, दोनों देशों के बीच ट्रेड वॉर समाप्त करने के लिए पहली बार आयोजित आमने-सामने की वार्ता असफल हो गई। ऐसे में देश और दुनिया के अर्थविशेषज्ञ यह कहते हुए दिखाई दे रहे हैं कि अब अमरीका तथा चीन के बीच ट्रेड वॉर और बढ़ेगा, इससे चीन की विकास दर में और कमी आएगी। वैश्विक अर्थविशेषज्ञों का यह भी कहना है कि चीन में जिस तेजी से मंदी का जो परिदृश्य बढ़ता जा रहा है, उसमें भारत के लिए नए आर्थिक मौके निर्मित होते जा रहे हैं। इन मौकों को भारत मुठ्ठियों में लेकर तेजी से विकास की डगर पर आगे बढ़ सकता है। हाल ही में चीन के राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो (एनबीएस) ने कहा है कि चीन में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर वर्ष 2018 में घटकर 6.6 फीसदी पर आ गई है। चीन की आर्थिक विकास दर (जीडीपी) अप्रैल-जून तिमाही में 6.2 फीसदी रही। यह 27 साल में सबसे कम है। इससे कम ग्रोथ 1992 की जनवरी-मार्च तिमाही में दर्ज की गई थी।

इस साल जनवरी-मार्च में ग्रोथ 6.4 फीसदी रही थी। अमरीका के ट्रेड वॉर की वजह से चीन की विकास दर में गिरावट आ रही है। चीन दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश है। वहां के सांख्यिकी विभाग ने सोमवार को जीडीपी के आंकड़े जारी किए। इस साल की पहली छमाही में चीन की जीडीपी ग्रोथ 6.3 फीसदी दर्ज की गई है। एक्सपर्ट के मुताबिक अमरीका-चीन के बीच ट्रेड वॉर जारी रहा, तो दुनियाभर में मंदी का खतरा है। चीन के एक्सपोर्ट के साथ ही इंपोर्ट में गिरावट ज्यादा चिंता की बात है, क्योंकि एशिया के बाकी देशों के लिए चीन प्रमुख बाजार है। इससे यह संकेत मिलता है कि चीन की अर्थव्यवस्था में धीमापन आ रहा है। चीन की मंदी की प्रकृति ढांचागत है। पिछले 28 वर्षों में जोरदार वृद्घि के दौरान चीन एक विशिष्ट निवेश और निर्यात आधारित मॉडल के सहारे आगे बढ़ रहा था। चीन में वित्तीय बचत और विदेशी निवेश का प्रयोग बड़ी परियोजनाओं तथा निर्यातोन्मुखी विनिर्माण में किया गया। इससे चीन दुनिया की फैक्टरी के रूप में उभरकर सामने आया। उसका विदेशी मुद्रा भंडार लगातार बढ़ता गया और व्यापार अधिशेष दुनिया के अधिकांश देशों से अधिक हो गया, लेकिन वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद भी चीन की सरकार विभिन्न पूंजी आधारित क्षेत्रों को जमकर सस्ता ऋण मुहैया कराती रही, जिससे वृद्घि तो मजबूत बनी रही, लेकिन पूंजी की उत्पादकता में काफी कमी आई और विकास दर में कमी आ गई। अब चीन अर्थव्यवस्था को नए सिरे से संतुलित करने के लिए निर्यात से हटकर नवाचार और खपत में निवेश बढ़ाने की रणनीति पर आगे बढ़ा है, लेकिन अब चीन के लिए निकट भविष्य में मंदी घटाना और विकास दर बढ़ाना कठिन काम है। निश्चित रूप से चीन की मंदी के बीच भारत के लिए दुनिया का नया कारखाना बनने का मौका भी है। विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत चीन और पश्चिमी देशों को पछाड़कर दुनिया का नया कारखाना बन सकता है। यद्यपि दुनिया के कुल उत्पादन का 18.6 फीसदी उत्पादन अकेला चीन करता है, लेकिन चीन में आई आर्थिक मंदी एवं युवा कार्यशील आबादी की कमी के कारण बढ़ती श्रम लागत के कारण चीन में निवेश घट रहे हैं और औद्योगिक उत्पादन में मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। चीन इस समय श्रम आधारित उत्पादों के विनिर्माण से दूर हो रहा है। मूल्यवर्धन और प्रदूषण घटाने पर उसका ध्यान केंद्रित होने की वजह से देशभर में इकाइयां बंद हो रही हैं। ऐसे में भारत से कपास, लौह अयस्क, ऑर्गेनिक केमिकल्स तथा विनिर्मित उत्पादों के लिए चीन में नई बाजार संभावना दिखाई दे रही है। गौरतलब है कि अप्रैल 2019 में चीन के साथ द्विपक्षीय कारोबार में व्यापार घाटे को कम करने के लिए भारत ने 380 उत्पादों की सूची चीन को भेजी है, जिनका चीन को निर्यात बढ़ाया जा सकता है। इनमें मुख्य रूप से बागबानी, वस्त्र, रसायन और औषधि क्षेत्र के उत्पाद शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि दुनिया के निवेशक बड़ी संख्या में चीनी बाजारों के बजाय नकदी का प्रवाह भारत समेत नई उभरती अर्थव्यवस्था वाले बाजारों की ओर प्रवाहित करते हुए दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में गुणवत्तापूर्ण मैन्युफेक्चरिंग उत्पादन में चीन से अच्छी स्थिति रखने वाला भारत अमरीकी अर्थव्यवस्था में चीन की जगह ले सकता है। चीन में मंदी के कारण भारत के कारोबार और निर्यात दुनिया के विभिन्न देशों में बढ़ने की संभावना उभरकर दिखाई दे रही है। वैश्विक शोध संगठन स्टैटिस्टा और डालिया रिसर्च के द्वारा मेड इन कंट्री इंडेक्स 2018 में उत्पादों की साख के अध्ययन के आधार पर कहा गया है कि गुणवत्ता के मामले में मेड इन इंडिया मेन इन चायना से आगे है।

इस सर्वेक्षण के तहत लिए गए मानकों में उत्पादों की गुणवत्ता, सुरक्षा मानक, कीमत वसूली, विशिष्टता, डिजाइन, एडवांस्ड टेक्नोलॉजी, भरोसा, टिकाऊपन, सही उत्पादन और प्रतिष्ठा शामिल हैं। सस्ते और दोयम दर्जे के उत्पादों से दुनियाभर के बाजारों को पाटकर अपनी मैन्युफेक्चरिंग की बादशाहत चीन भले ही दिखाता रहा है, लेकिन गुणवत्ता और भरोसे के मद्देनजर भारत में बने उत्पादों से चीन बहुत पीछे हो गया है। ऐसी आर्थिक विदेशी निवेश अनुकूलता और भारत के मेक इन इंडिया अभियान के कारण भारत दुनिया का नया कारखाना बनने की संभावना रखता है। यदि हम चाहते हैं कि भारत चीन की मंदी के बीच तेजी से उभरते हुए आर्थिक मौकों को अपनी मुट्ठियों में कर ले, तो हमें कई बातों पर ध्यान देना होगा। हमें आर्थिक सुधारों को गतिशील करना होगा। देश में कर सरलीकरण के प्रयासों से भी अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। विभिन्न आर्थिक अध्ययन रिपोर्टों से यह बात उभरकर सामने आ रही है कि जीएसटी भारत के लिए लाभप्रद है, लेकिन उपयुक्त क्रियान्वयन के अभाव में इसका लाभ अर्थव्यवस्था को पर्याप्त रूप में नहीं मिल पाया। वास्तविक व्यवहार में आ रही जीएसटी दरों से संबंधित कई उलझनों का निराकरण करना होगा।

अर्थव्यवस्था को डिजिटल करने की रफ्तार तेज करनी होगी। वैश्विक संरक्षणवाद की नई चुनौतियों के बीच सरकार को निर्यात प्रोत्साहन के लिए और अधिक कारगर कदम उठाने होंगे। सरकार द्वारा भारतीय उत्पादों को प्रतिस्पर्धी बनाने वाले सूक्ष्म आर्थिक सुधारों को लागू करना होगा। अब देश की अर्थव्यवस्था को ऊंचाई देने के लिए मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर की अहम भूमिका बनाई जानी होगी। मेक इन इंडिया योजना को गतिशील करना होगा। उन ढांचागत सुधारों पर भी जोर दिया जाना होगा, जिसमें निर्यातोन्मुखी विनिर्माण क्षेत्र को गति मिल सके। हमें अपनी बुनियादी संरचना में व्याप्त अकुशलता एवं भ्रष्टाचार पर नियंत्रण कर अपने प्रॉडक्ट की उत्पादन लागत कम करनी होगी। भारतीय उद्योगों को चीन के मुकाबले में खड़ा करने के लिए उद्योगों को नए आविष्कारों, खोज से परिचित कराने के मद्देनजर सीएसआईआर, डीआरडीओ और इसरो जैसे शीर्ष संस्थानों को महत्त्वपूर्ण बनाना होगा। निश्चित रूप से ऐसा होने पर ही भारत चीन की मंदी के बीच दुनियाभर में उभरते हुए नए आर्थिक मौकों को अपनी मुट्ठियों में करते हुए दिखाई दे सकेगा।