भारत-चीन, हैंड इन हैंड

कर्नल मनीष धीमान

स्वतंत्र लेखक

भारतीय एवं चीनी सेना के बीच भारत के उत्तर पूर्वी क्षेत्र के उमरोई कैंट में आतंकवाद के खिलाफ  7 दिसंबर से 14 दिन के लिए हैंड इन हैंड नामक एक साझा युद्धाभ्यास शुरू हुआ है। यह दोनों देशों के बीच का आठवां युद्धाभ्यास है। 2017 में डोकलाम मसले पर दोनों देशों के बीच सीमा विवाद बढ़ जाने के कारण इस युद्धाभ्यास को नहीं किया गया था, जबकि पिछले साल यानी 2018 में इस अभ्यास को चीन की धरती पर अंजाम दिया गया था। इस युद्धाभ्यास में 120 के करीब इन्फेंट्री बटालियन हिस्सा ले रही हैं जिसमें उत्तर पूर्वी क्षेत्र जैसे कठिन इलाके में आतंकवाद के खिलाफ  कार्रवाई को किस तरह से अंजाम दिया जाए, इसका अभ्यास किया जाएगा। इस दौरान आतंकवादी को जिंदा पकड़ना तथा मुठभेड़ या अंबुश के दौरान सैनिक के घायल होने पर उसको बचाने की टैक्टिक्स एवं तरीके पर अभ्यास किया जाएगा। इस युद्धाभ्यास में दोनों सेनाएं अपनी काबिलीयत और टेक्टिक्स को एक दूसरे के साथ साझा करेंगी। भारत ने जिस तरह पिछले दिनों कश्मीर से धारा 370 हटाने के बाद पाक अधिकृत कश्मीर तथा अक्सिई चिन पर अपने दावे को मजबूती के साथ अंतरराष्ट्रीय मंच पर रखा है, तब से चीन और पाकिस्तान दोनों ही भारत से नाराज चल रहे हैं। दूसरा मार्च में भारत के समुद्री तट विशाखापट्टनम में मिलन नामक समुद्री युद्धाभ्यास जिसमें 41 देश हिस्सा ले रहे हैं, पर इस एक्सरसाइज के लिए चीन को भारत ने न्योता नहीं दिया है। इन सब हालात को देखते हुए चीन का इस युद्धाभ्यास में हिस्सा लेना बहुत अहम हो जाता है। आज जब पूरी दुनिया आतंकवाद के खिलाफ  लड़ाई में  एकजुट हुई है तथा आतंकियों की पनाहगाह बना पाकिस्तान अलग-थलग पड़ गया है, उस वक्त पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय दबाव से बचाने के लिए हमेशा सिर्फ  चीन का ही सहारा मिलता रहा है। ऐसे हालात में चीन का भारत के साथ आतंकवाद के खिलाफ  इस युद्धाभ्यास में शामिल होना दोनों देशों के बीच संबंधों के लिए अच्छा संकेत है। इसमें कोई दो राय नहीं कि चीन ने पाकिस्तान के साथ मिलकर भारतीय सीमा पर सैन्य दृष्टि से आधुनिक सुविधाओं वाले रोड एवं रेलवे कोरिडोर बना कर भारत को चुनौती दी है, पर इसमें भी कोई संदेह नहीं कि भारत एशिया महाद्वीप की एक उभरती हुई शक्ति है जिसको नजरअंदाज करना चीन के लिए फायदे का सौदा नहीं है।

 

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