Monday, October 21, 2019 07:39 AM

भूखाय दुरजन हिताय

अशोक गौतम

साहित्यकार

इस लोक का हर जीव जिधर देखो डूबने में आकंठ डूबा हुआ है। उसे डूबने से बचाने के लिए जितना प्रयास करो वह उतना ही डूब रहा है। उसे डूबने से बचाने की सारी कोशिशें बेकार हैं। बैंक कर्ज देकर डूब रहे हैं तो कर्जदार कर्ज लेकर डूब रहे हैं । कोई किसी के एकतरफा प्यार में डूबा हुआ है तो कोई किसी के इंतजार में। जिसके पास कुर्सी है। वह कुर्सी के नशे में डूबा हुआ है और जिसके पास कुर्सी नहीं वह कुर्सी हथियाने के नशे में डूबा हुआ है। कुल मिलाकर जिसे एक बार यह डूबने की लत्त लग जाए उसके हाथ में मरते-मरते कितनी ही गउओं की कितनी ही पूंछें क्यों न पकड़वा लो ऐन मौके पर वह गाय की पूंछ पंडित के हाथों थमा वैतरणी में छलांग लगा देता है डूबने के लिए। कारण वही डूबने की लत्त। ऐसे डूबने में महारत रखने वाले चुल्लू भर पानी में भी डूब दिखाने के हुनर रखते हैं चुल्लू भर पानी में डूबकर मरने का नहीं। चुल्लू भर पानी में डूब मरना और चुल्लू भर पानी में डूबना दो अलग- अलग अर्थशास्त्रीय सिद्धांत हैं।  डूबने वाले को डूबने से बचाने के लिए कितने ही पैकेज घोषित क्यों न कर लो आखिर में वे डूब कर ही दम लेते हैं। डूबने के लिए दिन-रात तब तक हाथ -पैर मारते रहते हैं जब तक पूरी तरह से डूब नहीं लेते। जिंदगी में उनका मकसद केवल और केवल डूबना होता है। उनकी खासियत यही होती है कि ये वे डूब कर मरते नहीं उनको डूबते हुए बचाने वाले को डुबोकर रख देते हैं। यह डूबने का चस्का  बहुत बुरा होता है भाईसाहब! जिसे एक बार लग गया तो  समझो वह कभी भी पार  लगने की दुआ न मांगे। बस भगवान से यही दुआ करे कि अब भी उसे तो उसे डूबने से बचाने वाले को भी डुबो दे। डूबने में जो मजा आता है वह पार लगने में नहीं। बस डूबने से बचने का नाक पकड़े वह डूबते हुए भी पैकेज मांगता रहे। ऐसे डूबने वालों को पार लगाने के लिए चाहे जितना ही फंड मुहैया करवाओ भैया! उसे डूबने से बचाने के लिए उसकी ओर चाहे कितने ही बड़े फंड की मोटर वोटर भगाओ पर अंततः वह बचाओ! बचाओ! कहता मोटर वोट की मोटर निकाल उसे डूबती वोट बना कर ही दम लेगा। ऐसे ही कल चलते चलते डूबने का हुनर रखने वाले  मिले। कांधे पर सर्गव फौरी सहायता से खरीदी पंचर ट्यूब उठाए। खुद डूबने तो सरकारी सब्सिडी वाला लिया कर्ज सबसिडी खाकर डुबोने को फिर से पूरे दमखम सहित तैयार! मैंने पूछा और कैसे हो तो वे मुस्कराते हुए तपाक से बोले मजे में हूं! फिर से डूबने की तैयारी कर रहा हूं  सुन मैं चौंका! हद है यार! यहां हर सरकार डूबने वालों को बचाते-बचाते खुद डूबने के कगार पर आ खड़ी है और दूसरी ओर एक ये डूबने वाले हैं  आखिर क्या मिलता है तुम्हें यूं डूबकर बार-बार डूबने डुबोने के बाद भी बच क्यों जाते हो मैंने उनसे यों ही दूसरा सवाल पूछ लिया तो वे फटाक से बोले बहुत कुछ! डूबने पर इतना मिलता है जितना डूबते हुए बचने पर नहीं। न भी मिले तो भी क्या! इस बहाने किसी का कल्याण तो हो ही जाता है। हम भंवर से निकले या नए बासियों और तो भंवर से निकल ही जाते हैं न प्रभु! बस हम खुशी-खुशी इसीलिए बरसात तो बरसात जून के महीने में भी शान से स्वांतः भूखायए दुरजन हिताय शान से डूबते रहते हैं दोस्त! डूबने में हमारा कल्याण तो डुबोने पर उनका कल्याण!