भ्रष्टाचार और चुनाव प्रणाली

पीके खुराना

लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं

शहाबुद्दीन याकूब कुरैशी ने इस बहस को शुरू करते हुए ‘दि हिंदू’ को दिए अपने इंटरव्यू में आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली का पक्ष लिया। उन्होंने चुनाव प्रणाली से जुड़े कई और मुद्दों पर भी बात की और कहा कि अब चूंकि चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय को हर ईवीएम के साथ वीवीपैट के उपयोग का आश्वासन दिया है, तो बैलेट पेपर पर लौटने की मांग बेमानी हो जाती है। वर्तमान सरकार द्वारा इलेक्शन बांड जारी करने के नियम का विरोध करते हुए उन्होंने कहा कि इससे सारा शासनतंत्र कुछ पंूजीपतियों के हाथ में चला जाएगा...

आम आदमी राजनीतिज्ञों से घृणा करता है, उन्हें भ्रष्ट मानता है। इसके दो सामान्य कारण हैं। पहला तो यह कि जीता हुआ उम्मीदवार जीत के बाद अकसर गायब हो जाता है। दूसरा यह कि जीता हुआ उम्मीदवार अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करता है। भ्रष्ट तरीके अपनाकर चुनाव तो जीतता है, परंतु और भी ज्यादा भ्रष्ट तरीके अपनाकर देश और जनता को लूटता है। जीते हुए उम्मीदवार के कुछ नजदीकी लोग फायदे में रहते हैं, जबकि सामान्य जन स्वयं को ठगा सा महसूस करता है। साइकिल पर चलने वाला उम्मीदवार अगला चुनाव आने तक करोड़पति या कभी-कभी तो अरबपति भी हो जाता है। सच है कि हमारे देश में अकसर 60-70 प्रतिशत मतदान होता है, यानी चुनी गई सरकार को 30 प्रतिशत जनता ने वोट नहीं दिया। जिन लोगों ने मतदान किया, उनमें से भी बहुत से लोग विपक्षी अथवा स्वतंत्र उम्मीदवारों को वोट देते हैं। विजयी उम्मीदवार सिर्फ इसलिए चुन लिया जाता है, क्योंकि उसे सबसे ज्यादा वोट मिले। कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि कोई उम्मीदवार सिर्फ एक वोट के अंतर से जीता। यानी, जिन लोगों ने विजयी उम्मीदवार के खिलाफ वोट दिया, उनके वोट बेकार चले गए, क्योंकि उनकी मनपसंद का उम्मीदवार विधायक नहीं बन पाया। इसे ‘फस्र्ट पास्ट दि पोस्ट’ का नियम कहा जाता है। इस प्रकार सिर्फ एक वोट ज्यादा पाने वाला व्यक्ति सभी शक्तियों का स्वामी बन जाता है और हारा हुआ उम्मीदवार एकदम अप्रासंगिक हो जाता है। परिणाम यह है कि चुनाव जीतना ही सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाता है। इसलिए उम्मीदवार जीत सुनिश्चित करने के लिए हर तरह के जायज और नाजायज तरीके अपनाते हैं।

इसके विपरीत  ‘प्रपोर्शनल रिप्रेजेंटेशन’ यानी आनुपातिक प्रतिनिधित्व के सिस्टम में विभिन्न दलों को उनके वोट प्रतिशत के हिसाब से सीटें दी जाती हैं और उनकी सूची के वरीयता क्रमानुसार उम्मीदवारों को सदन में जगह मिलती है। यानी, अगर सदन में कुल 100 सीटें हों और भाजपा को सारे प्रदेश में 34 प्रतिशत मत मिलें, तो विधानसभा में उसके 34 सदस्य होंगे। यही नियम चुनाव लड़ रहे शेष दलों पर भी लागू होगा। सन् 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को 31.3 प्रतिशत मत मिले थे और उसके 282 उम्मीदवार विजयी रहे थे। यदि आनुपातिक प्रतिनिधित्व का नियम लागू होता, तो उसके केवल 169 उम्मीदवार ही सांसद हो पाते। कांग्रेस को 19.5 प्रतिशत मत मिले थे और उसके 44 उम्मीदवार विजयी रहे थे, जबकि आनुपातिक प्रतिनिधित्व के नियम के अनुसार उसके 105 उम्मीदवार सांसद बन जाते। तेलुगु देशम पार्टी को 2.5 प्रतिशत मत मिले और उसके 16 उम्मीदवार विजयी रहे, जबकि बहुजन समाजवादी पार्टी को 4.3 प्रतिशत मत मिले, लेकिन लोकसभा में उसका खाता भी नहीं खुल पाया। इन सब कमियों का मिला-जुला असर यह है कि केवल कुछ वोट अधिक लेकर भी सत्तासीन दल को अधिक सीटें मिली होती हैं, चाहे उसका वोट प्रतिशत उतना अधिक न रहा हो। हिंदुस्तान एकता पार्टी ने एक ट्वीट में आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली का समर्थन किया, तो जवाब में दिव्य हिमाचल के चेयरमैन तथा ‘ह्वाई इंडिया नीड्स दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ के यशस्वी लेखक भानु धमीजा ने इसके विरोध में ढेरों तर्क दे डाले। धमीजा का मानना है कि राष्ट्रपति प्रणाली लागू कर देने के बाद वर्तमान चुनाव प्रणाली की खामियां स्वयं ही कम हो जाएंगी। वे जोर देकर कहते हैं कि आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली में हर दल को सीट की गारंटी होगी, तो वह मतदाताओं को आर्किर्षत करने के लिए किसी भी हद तक जाएगी और इससे अतिवाद को बढ़ावा मिलेगा।

लोग अपने-अपने धर्म के दल बना लेंगे, हर छुटभैया अपना दल खड़ा कर लेगा और मतदाताओं को लुभाने के लिए कुछ भी वादे कर लेगा। यदि मतदाता पार्टी को वोट दे रहे हैं और मत प्रतिशत के आधार पर पार्टी को सीटें मिल रही हैं, तो यह कैसे तय होगा कि कौन सा उम्मीदवार किस चुनाव क्षेत्र का प्रतिनिधि है? ऐसे में उम्मीदवार पार्टी अध्यक्ष का गुलाम हो जाएगा और वह स्वयं को पार्टी का प्रतिनिधि मानेगा न कि मतदाताओं का। यह तो लोकतंत्र की मूल अवधारणा के ही खिलाफ है। जवाब में प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और आम आदमी पार्टी के पूर्व संस्थापक सदस्य मयंक गांधी ने उनसे असहमति जताते हुए कहा कि यदि पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र हो, तो उम्मीदवारों की सूची बनाने में पार्टी के अध्यक्ष की मनमानी के बजाय कार्यकर्ताओं की आवाज सुनी जाएगी और ऐसे योग्य प्रत्याशी भी चुनाव जीत सकेंगे, जो कम साधनसंपन्न हैं। वह मिश्रित प्रणाली की वकालत करते नजर आते हैं, जिसमें मतदाताओं के पास दो वोट देने का अधिकार हो। एक मत वह चुनाव क्षेत्र के प्रतिनिधि के लिए दे और एक मत पार्टी के लिए दे। उनका यह भी कहना है कि विश्व भर में आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली को ज्यादा मान्यता प्राप्त है और 195 में से 89 देश इसी प्रणाली से सरकार चुनते हैं। यह एक पुख्ता तर्क है कि सन् 2014 में भाजपा को 282 सीटें मिली थीं, जबकि देश के कुल साढ़े 88 करोड़ मतदाताओं में से पौने 55 करोड़ लोगों ने मतदान किया और उनमें से भी साढ़े 37 करोड़ मतदाताओं ने भाजपा को अस्वीकार किया था। केवल सवा 17 करोड़ मतदाताओं के मत से जीती यह सरकार देश में पहली बार सत्ता में आई है। इसके बावजूद प्रधानमंत्री मोदी असीम शक्तियों के स्वामी हैं। यही कारण है कि पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त शहाबुद्दीन याकूब कुरैशी ने इस बहस को शुरू करते हुए ‘दि हिंदू’ को दिए अपने इंटरव्यू में आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली का पक्ष लिया। उन्होंने चुनाव प्रणाली से जुड़े कई और मुद्दों पर भी बात की और कहा कि अब चूंकि चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय को हर ईवीएम के साथ वीवीपैट के उपयोग का आश्वासन दिया है, तो बैलेट पेपर पर लौटने की मांग बेमानी हो जाती है। वर्तमान सरकार द्वारा इलेक्शन बांड जारी करने के नियम का विरोध करते हुए उन्होंने कहा कि इससे सारा शासनतंत्र कुछ पंूजीपतियों के हाथ में चला जाएगा, क्योंकि वे मनमाने ढंग से धन देकर राजनीतिक दलों को काबू में रख सकेंगे। चूंकि इस संबंध में कंपनियों से पूछताछ नहीं होगी, तो बहुत से धनपति सिर्फ इलेक्शन बांड खरीदने के लिए भी कंपनियां खड़ी कर लेंगे। ऐसे में कंपनियां सरकार चलाएंगी। इसमें कोई शक नहीं कि हमारी वर्तमान शासन प्रणाली और चुनाव प्रणाली दोनों ही दोषपूर्ण हैं। इसलिए इन पर बहस होनी चाहिए, ताकि हम इस नतीजे पर पहुंच सकें कि देश में सामंजस्य और मजबूत लोकतंत्र के लिए कौन सी प्रणाली सर्वाधिक उपयुक्त है।

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