Tuesday, September 25, 2018 02:15 PM

मंडी को 10 माह में विश्वविद्यालय कांगड़ा को दस साल बाद भी नहीं

धर्मशाला— इसे कांगड़ा का दुर्भाग्य कहें या नेताओं की अनदेखी। मंडी जिला को मात्र दस माह में क्लस्टर विश्वविद्यालय मिल गया है और कांगड़ा को दस साल बाद भी विश्वविद्यालय के लिए जमीन तक नहीं मिल पाई है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ, इससे पहले भी ऐसा होता रहा है। वर्ष 2009 में प्रदेश के सबसे बड़े व पुराने कालेजों में शुमार धर्मशाला कालेज को ऑटोनोमस कालेज बनाकर डीम्ड यूनिवर्सिटी बनाने के लिए यूजीसी ने बाकायदा एक करोड़ से अधिक की किस्त भी जारी कर दी थी, लेकिन उस समय भी कांगड़ा भेदभाव का शिकार हो गया। मौजूदा समय में देखें तो कांगड़ा जिला में रीजनल सेंटर सहित करीब 32 कालेज हैं। 1992 में बने रीजनल सेंटर को आज तक अपग्रेड नहीं किया गया। यहां न तो डीम्ड यूनिवर्सिटी बनी और न ही क्लस्टर विवि बनाया गया। इसके पीछे केंद्रीय विवि बनने का तर्क दिया जाता रहा, लेकिन हालात यह हैं कि अभी तक विवि को धर्मशाला में जमीन तक नहीं मिल पाई है।  ऋषि  मुनियों के समय से ही धौलाधार व इसके आंचल को अध्ययन का प्रमुख केंद्र माना जाता रहा है। इसी के चलते देश-विदेश से लोग आज भी अध्ययन व योग के लिए यहां के पहाड़ों में कई माह बिताते हैं। बौद्ध शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र भी धर्मशाला है। बावजूद इसके हमारी सरकारों ने इस स्थान के महत्त्व को समझने के लिए कभी तरजीह नहीं दी और इसे सियासी अखाड़ा ही बनाए रखा।  15 अगस्त 2007 को प्रधानमंत्री ने केंद्रीय विवि बनाने की घोषणा की थी। 20 मार्च 2009 को विवि  खोलने को मंजूरी मिल गई थी और 20 जनवरी 2010 को केंद्रीय विवि हिमाचल प्रदेश में कुलपति ने भी कार्यभार संभाल लिया था। बावजूद इसके अभी तक केंद्रीय विवि के लिए भूमि चयन कर इसका काम शुरू नहीं हो पाया है। आलम यह है कि उधार व जुगाड़ के भवनों में काम चलाया जा रहा है। कांगड़ा के सांसद, विधायक व मंत्री इस दिशा में  इच्छा शक्ति दिखाते तो धर्मशाला कालेज, बीएड कालेज, ब्वायज स्कूल, नसर्री स्कूल व अन्य शैक्षणिक संस्थानों को कंस्टीच्एंट कालेज बनाकर केंद्रीय विवि के तहत ही चलाया जा सकता था। दिल्ली माडल को देखें तो अकेले दिल्ली में ही आधा दर्जन से अधिक सरकारी विवि चल रहे हैं।  इन विश्वविद्यालयों के अधीन कई कंस्टीच्एंट कालेज भी चल रहे हैं। हिमाचल के भी सोलन में करीब आठ निजी विवि चल रहे हैं, लेकिन राज्य सरकारों ने प्रदेश के सबसे बड़े जिला कांगड़ा में उच्च शिक्षा के  स्तर को सुधारने के लिए कभी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर काम ही नहीं किया। 1992 में बने रीजनल सेंटर को प्रोमोट कर डीम्ड विवि बनाया होता तो उस समय पांच सालों में यूजीसी से 12 करोड़ की धनराशि  से यहां अध्ययन करने के लिए आने वाले हजारों छात्रों को बेहतर व सस्ती उच्च शिक्षा मिल पाती। मौजूदा समय में भी मंडी कलस्टर विवि के तहत मात्र आधा दर्जन कालेजों को लिया गया है, लेकिन अकले कांगड़ा जिला में ही करीब तीन दर्जन सरकारी और निजी कालेज हैं। इसके अलावा चंबा व आसपास के जिलों के छात्र आज भी उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए धर्मशाला आते हैं। बुद्धिजीवी व शिक्षाविद इसे कांगड़ा के नेताओं के विजन की कमी व सार्वजनिक मुददों के प्रति रुचि न दिखाने की बात करते हुए उन्हें कटघरे में खड़े कर रहे हैं।