मंत्र सिद्धि के लिए होने वाली प्रक्रिया पुरश्चरण है

तांत्रिक साधनों में मंत्र जप का विशेष विधान है। किसी भी मंत्रसिद्धि के लिए जो प्रक्रिया की जाती है, उसे पुरश्चरण कहते हैं। इसके पांच भाग इस प्रकार हैं : जप, हवन, तर्पण, मार्जन तथा ब्राह्मण-भोजन। प्रत्येक मंत्र के लिए एक संख्या निर्धारित होती है। उस संख्या में जप करने से मंत्र सिद्ध हो जाता है। पुरश्चरण आरंभ करने से पहले विधिवत दीक्षा लेनी चाहिए। यह दीक्षा गुरु, देवी-देवता या उस पुस्तक से ली जाती है जिसके अध्ययन से सिद्धि पाने का प्रयास किया जा रहा हो। पहले श्रीगणेश, नवग्रह, क्षेत्रपाल, दिग्पाल, चौंसठ योगिनी, षोडशमातृका, कुल देवता या लोक देवता आदि का पूजन करके स्थानशुद्धि, भूमिशुद्धि और देहशुद्धि आदि कर्म किए जाते हैं...

-गतांक से आगे...

कवच

जितने माला की जप-संख्या का नियम बनाया हो, उतनी माला मंत्र जप करने के बाद कवच का पाठ करना चाहिए। कवच का अर्थ है : रक्षा करने वाला। कवच पाठ से साधक की आधिभौतिक, आधिदैविक एवं आध्यात्मिक बाधाएं दूर होती हैं और साधना निर्विघ्न समाप्त होती है। फिर निम्नवत मंत्र का जप करके माला की पूजा करनी चाहिए :

ॐ मां माले महामाये सर्वशक्ति स्वरूपिणी।

चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मां सिद्धिदा भव।

ॐ ऐं ह्रीं अक्ष मालिकायै नमः।।

पुरश्चरण विधि

तांत्रिक साधनों में मंत्र जप का विशेष विधान है। किसी भी मंत्रसिद्धि के लिए जो प्रक्रिया की जाती है, उसे पुरश्चरण कहते हैं। इसके पांच भाग इस प्रकार हैं : जप, हवन, तर्पण, मार्जन तथा ब्राह्मण-भोजन। प्रत्येक मंत्र के लिए एक संख्या निर्धारित होती है। उस संख्या में जप करने से मंत्र सिद्ध हो जाता है। पुरश्चरण आरंभ करने से पहले विधिवत दीक्षा लेनी चाहिए। यह दीक्षा गुरु, देवी-देवता या उस पुस्तक से ली जाती है जिसके अध्ययन से सिद्धि पाने का प्रयास किया जा रहा हो। पहले श्रीगणेश, नवग्रह, क्षेत्रपाल, दिग्पाल, चौंसठ योगिनी, षोडशमातृका, कुल देवता या लोक देवता आदि का पूजन करके स्थानशुद्धि, भूमिशुद्धि और देहशुद्धि आदि कर्म किए जाते हैं। यह सब पूजन विधियां साधक की समझ में आ जाएं, इसीलिए उन्हें सरल करके बता रहे हैं। जिस स्थान पर पूजा आदि कर्म किया जाना हो, वहां पहले काष्ठ की एक चौकी रखें। उस पर साफ-सफेद धुला हुआ वस्त्र बिछा दें। यदि गणेश जी की मूर्ति या चित्र हो तो ठीक है अन्यथा साफ मिट्टी के ढेले या साबुत सुपारी पर मौली बांधकर उसे साक्षात गणेश मानकर चौकी पर रख दें। एक स्थान पर अक्षतों का ढेर बनाकर रखें। यह पचास क्षेत्रपालों का प्रतीक होगा। ऐसे ही एक दूसरे स्थान पर दूसरी ढेरी रख दें और इसे चौंसठ योगिनियों का प्रतीक मान लें। इसी प्रकार एक अन्य ढेरी षोडश मातृकाओं के लिए सोलह खानों में बनाकर रख दें। फिर अक्षतों से नौ खानों का एक चित्र बनाएं। उसमें साबुत मूंग के दाने, साबुत उड़द, साबुत मलका मसूर के दाने एवं अक्षतों के दाने भर दें। सूर्य-मंगल का लाल, चंद्रमा-शुक्र का सफेद, बुध का हरा, राहु-केतु और शनि का काला तथा बृहस्पति का पीला रंग है।