मंदिर व मस्जिद दोनों ही बनें

फिरोज बख्त अहमद

स्वंत्रत लेखक

1991 और फिर 2003 में प्रयाग पीठ शंकराचार्य स्वामी माधवानंद सरस्वती जी ने एक समाधान राम-बाबरी प्रकरण का सुझाया था कि अयोध्या परिसर में भव्य राम मंदिर के साथ एक भव्य बाबरी मस्जिद का भी निर्माण कराया जाए। इसी प्रकार से अयोध्या स्थित राम मंदिर के पुजारी महंत लाल दास ने एक साक्षात्कार में लेखक को यह बात बताई थी कि वास्तव में राम हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी के प्यारे हैं...

पिछले दिनों कई टीवी चैनलों पर धुआंधार बहस के चलते देखा कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए ट्रकों से पत्थर लाए जा रहे हैं। जब किसी ने इस पर आपत्ति जताई तो भाजपा के विनय कटियार ने कहा कि ये ट्रक अब से थोड़े ही ये तो पिछले 22 साल से आ रहे हैं और निर्माण की प्रक्रिया तब से ही चालू है। उधर विपक्ष का इस बारे में कहना था कि यह मामला न्यायालय में है अतः इसे वहीं रहना चाहिए। जहां यह मामला न्यायालय में है, वहीं कुछ इस प्रकार की आवाजें सुनने में आती रही हैं कि इस प्रकरण का फैसला यदि आपसी सद्भावना से न्यायालय के बाहर निपटा लिया जाए तो बहुत अच्छा रहेगा। वास्तव में जब कोई राजनीतिक समस्या धार्मिक समस्या का रूप धारण कर लेती या धार्मिक समस्या राजनीति का रूप धारण कर लेती है तो उसमें आपत्ति ही आपत्ति होती है क्योंकि कोई भी पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं होता। उससे भी भयंकर पहलू इस प्रकार की समस्याओं का यह रहता है कि वोट बैंक की राजनीति के चलते धार्मिक समस्याओं को बड़े वीभत्स रूप से भुनाया जाता है। इससे बढि़या समादर क्या हो सकता है श्री राम के लिए। 1991 और फिर 2003 में प्रयाग पीठ शंकराचार्य स्वामी माधवानंद सरस्वती जी ने एक समाधान राम-बाबरी प्रकरण का सुझाया था कि अयोध्या परिसर में भव्य राम मंदिर के साथ एक भव्य बाबरी मस्जिद का भी निर्माण कराया जाए। इसी प्रकार से अयोध्या स्थित राम मंदिर के पुजारी महंत लाल दास ने एक साक्षात्कार में लेखक को यह बात बताई थी कि वास्तव में राम हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी के प्यारे हैं मगर जिस प्रकार से राम मंदिर को लेकर भयावह राजनीतिककरण किया गया है, वह स्वयं श्रीराम के त्याग, तपस्या एवं उनके जन मानस हित की जीवन शैली पर दाग है। उधर मुस्लिमों को यह सोचना चाहिए कि जिस प्रकार से हजरत मोहम्मद उनके प्यारे हैं और मक्का में उनका एक आस्था स्थल है, इसी प्रकार से श्रीराम भी हिंदू भाइयों के प्यारे हैं और यदि वे उनकी जन्म स्थली को एक भव्य मंदिर में परिवर्तित करना चाहते हैं तो बावजूद इसके कुछ दंगाई तत्त्वों द्वारा बाबरी मस्जिद को शहीद कर दिया गया, दिल बड़ा करके, बड़प्पन के साथ बैठ कर ठंडे दिमाग से सोचें और इसका एक ऐसा हल निकालें जो सभी को मंजूर हो।

महंत लाल दास ने लेखक को बताया कि वे लोग जो आज विश्व हिंदू परिषद के झंडे तले राम मंदिर के निर्माण की ललकार दे रहे हैं, उनमें से एक भी पूजा अर्पण के लिए अयोध्या नहीं आया। आस्था से अधिक वास्तव में यहां प्रथा पैसे की जुड़ गई है। फिर यह कि जहां भी राम लला की मूर्ति लगा कर उसकी पूजा अर्चना की जाए, वही स्थान स्वयं राम मंदिर बन जाता है। लाल दास जी ने यह भी कहा कि यदि भगवान राम आज दुनिया में उतरेंगे तो सबसे पहले उन्हीं लोगों का कोर्ट मार्शल करेंगे जो उनके नाम में जन मानस हित को छोड़ भारत में विभिन्न संप्रदायों के बीच खून-खराबा कराने पर उतारू हैं। लेखक इस बात को रिकार्ड पर लाना चाहता है कि एक जनसभा में जब आरएसएस एक सुप्रिमो दत्तात्रेय होसबाले मुस्लिमों एवं आरएसएस के बीच पुल बांधने की बात पर विचार-विमर्श कर रहे थे और जब राम मंदिर का मुद्दा आया तो उन्हें एक सलाह दी गई। लेखक ने उनसे कहा कि राम-बाबरी समस्या का समाधान केवल आपसी संभावना व सद्भावना से कहीं बेहतर हो सकता है कोर्ट की तुलना में। इसका सबसे बढि़या समाधान यह है कि पूर्ण भारत में इस प्रकार का वातावरण बनाया जाए कि सभी हिंदू एवं मुस्लिम धर्मगुरू व बुद्धिजीवी एक ही प्लेटफार्म पर आएं और किसी शुभ दिवस पर आपसी रंजिशें भुला कर अयोध्या परिसर में किसी मुस्लिम धर्म गुरु से राम मंदिर की बुनियाद रखवाएं और ऐसे ही हिंदू धर्मगुरु से बाबरी मस्जिद की। यदि ऐसा हो गया तो उससे न केवल दोनों संप्रदायों के बीच पुरानी ऐतिहासिक रंजिशें समाप्त होंगी बल्कि पूर्ण विश्व में भारत का गुणगान होगा। मगर यहां सबसे बड़ी समस्या यह है कि संघ परिवार के अधिकतर शीर्ष नेता या यह कहिए कि सभी नेता बाबरी मस्जिद को मानते ही नहीं। पहले तो उसे ये लोग ढांचा कहते थे, अब तो उस ढांचे का अस्तित्व को नहीं मानते। यहां पर यह कहना अनुचित न होगा कि आज भी भारत में 90 प्रतिशत हिंदू भाई धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखते हैं, अपने मुस्लिम भाइयों का हर क्षेत्र में विकास चाहते हैं, यही कारण है कि सदियों से हिंदू और मुसलमान भारत में इस प्रकार से घुल-मिल गए हैं जैसे दूध में शक्कर। 

शायद भाजया एवं संघ परिवार ऐसा सोचता हो कि यदि जोर-जबदस्ती कर एक भव्य राम मंदिर बनवा भी दिया जाए तो उसके बदले में उन्हें जबरदस्त हिंदू वोट प्राप्त होगा और उनकी सरकार चलती रहेगी। यह सोच विपिरीतार्थक है क्योंकि न तो भारत के अधिकतर हिंदू और न ही मुस्लिम कट्टरपंथी हैं और यदि मौजूदा सरकार ने इस प्रकार की हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल कायम कर दी तो कोई अजब नहीं कि इसके अगले इलेक्शन में भाजपा को लोकसभा में 500 सीटें प्राप्त होंगी मगर खेद का विषय यह है कि न तो किसी को भगवान राम से कोई प्रेम है और न ही किसी को इस बात की फिक्र है कि सांप्रदायिक सद्भावना में बिगाड़ पैदा होगा। उधर प्रधानमंत्री मोदी जिस प्रकार से सभी को साथ लेकर चलना चाहते हैं, उन्हें भी चाहिए कि वे इस बात के लिए तैयार हो जाएं कि अब अयोध्या में जो निर्माण हो उसमें एक ओर तो राम मंदिर की स्थापना हो तो दूसरी ओर सरयू नदी के पार बाबरी मस्जिद की स्थापना हो और इस पूरे लगभग 80 एकड़ क्षेत्र में अंतर धर्म सद्भावना का स्कूल, विश्वविद्यालय आदि खोला जाए और साथ ही विश्व विख्यात माल्स, बच्चों के ज्वॉय पार्क, उद्यान, पूर्ण भारत के खान-पान आदि सुविधाएं उपलब्ध हों। ऐसा हो गया तो भारत बड़ी तेजी से आगे बढ़ता हुआ अमरीका चीन, ब्रिटेन आदि को पीछे छोड़ स्वर्ग का एक टुकड़ा बन जाएगा। 

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