मंदी को तोड़ने के उपाय

भरत झुनझुनवाला

आर्थिक विश्लेषक

यदि बाजार में मांग होती है तो उद्यमी येन केन प्रकारेण पूंजी एकत्रित कर फैक्टरी लगाकर माल बना कर उसे बेच ही लेता है। बाजार में मांग होती है तो उसे उत्पादित माल के दाम ऊंचे मिलते हैं और वह लाभ कमाता है। बाजार में मांग नहीं हो तो माल बना कर गोदाम में रखना पड़ता है जहां वह बर्बाद होता है। इसलिए मांग के अभाव में निवेश नहीं होता है। इस समय विकास दर न्यून होने और निवेश न होने का मूल कारण है कि बाजार में मांग नहीं है। प्रश्न है कि ऐसा क्यों? अर्थव्यवस्था की वर्तमान दुर्गति नोटबंदी और जीएसटी के बाद शुरू हुई है...

सरकार के सभी प्रयासों के बावजूद अर्थव्यवस्था की विकास दर लगातार गिरती ही जा रही है। विकास दर गिरने का मूल कारण यह है कि बाजार में मांग नहीं है। यदि बाजार में मांग होती है तो उद्यमी येन केन प्रकारेण पूंजी एकत्रित कर फैक्टरी लगाकर माल बना कर उसे बेच ही लेता है। बाजार में मांग होती है तो उसे उत्पादित माल के दाम ऊंचे मिलते हैं और वह लाभ कमाता है। बाजार में मांग नहीं हो तो माल बना कर गोदाम में रखना पड़ता है जहां वह बर्बाद होता है। इसलिए मांग के आभाव में निवेश नहीं होता है। इस समय विकास दर न्यून होने और निवेश न होने का मूल कारण है कि बाजार में मांग नहीं है। प्रश्न है कि ऐसा क्यों? अर्थव्यवस्था की वर्तमान दुर्गति नोटबंदी और जीएसटी के बाद शुरू हुई है। इन दोनों कदमों से बड़े उद्योगों को लाभ और छोटे उद्योगों को हानि हुई है। छोटे उद्योगों को तीन प्रकार से हानि हुई है। पहला यह कि जीएसटी लागू होने से किसी राज्य के माल को दूसरे राज्य में ले जाना आसान हो गया है। पूरा देश एक बाजार बन गया है। एक बाजार बनने से बड़े उद्योगों को पूरे देश में अपने माल को भेजने में सहूलियत हो गई है। बड़े उद्योगों की क्षमता होती है कि वे दूसरे राज्यों में माल भेज सकें। छोटे उद्योग मुख्यतः अपने शहर अथवा राज्य में ही माल भेज पाते हैं। नोटबंदी और जीएसटी से छोटे उद्योगों को जो पूर्व में अपने राज्य की सरहद पर संरक्षण मिलता था वह समाप्त हो गया है। जैसे हरिद्वार में एक पर्दे बनाने का कारखाना था। पूर्व में उसे सूरत के पर्दों से संरक्षण था क्योंकि सूरत से पर्दों को हरिद्वार लाना उतना आसान नहीं था। अब अंतरराज्यीय व्यापार आसान हो गया है इसलिए सूरत के पर्दे हरिद्वार में आसानी से पहुंच रहे हैं और हरिद्वार के छोटे उद्यमी का धंधा कमजोर पड़ गया है।

दूसरी बात यह कि छोटे उद्योगों पर जीएसटी लागू करने में बोझ ज्यादा पड़ रहा है। उन्हें कम्प्यूटर इत्यादि में निवेश करना पड़ रहा है या उनकी समझ से यह कार्य बाहर है। छोटे उद्यमी को माल खरीदना, श्रमिक को रखना, माल बेचना, बैंक जाना, खाते लिखना, सब कार्य स्वयं ही करने होते हैं। उस पर जीएसटी रिटर्न भरने का अतिरिक्त बोझ आ पड़ा है। तीसरा कारण यह कि जीएसटी लागू होने से छोटे उद्योगों पर टैक्स का वास्तविक भार बढ़ गया है। इतना सच है कि उन्हें जीएसटी में माल की बिक्री पर टैक्स कम देना पड़ता है, लेकिन साथ-साथ उनके द्वारा खरीदे गए कच्चे माल पर अदा किए गए जीएसटी का सेट ऑफ  या रिफंड भी नहीं मिलता है।

अतः यदि किसी पर्दे बनाने के छोटे कारखाने नें अपनी खरीद पर सामान्य दर से 20 रुपए का जीएसटी अदा किया और उत्पादित पर्दे पर रियायती दर से केवल पांच रुपए का जीएसटी अदा किया, तो उसके लिए जीएसटी का सच्चा बोझ 15 रुपए पड़ जाएगा। इसके विपरीत किसी परदे बनाने के बड़े कारखाने ने छोटे उद्योग की ही तरह अपनी खरीद पर सामान्य दर से 20 रुपए का जीएसटी अदा किया और उत्पादित पर्दे पर समान्य दर से 25 रुपए का जीएसटी अदा किया, तो उसे 20 रुपए का सेट ऑफ  मिल जाएगा और उस पर जीएसटी का सच्चा बोझ मात्र 5 रुपए पड़ेगा। इसलिए जीएसटी लागू होने के बाद पूरे देश में छोटे उद्योग दबाव में आ गए हैं। इसी प्रकार सरकार ने जो रियल एस्टेट कानून बनाया है उसको लागू करने के बाद छोटे बिल्डरों को परेशानी है और बडे़ बिल्डरों को नहीं। इस प्रकार की तमाम योजनाओं के चलते सरकार ने चाहे-अनचाहे छोटे उद्यमों को दबाव में लाया है जिसके कारण छोटे उद्यमों द्वारा रोजगार कम उत्पन्न किए जा रहे हैं और बाजार में मांग कम है। याद रखें कि बड़े उद्यमी की आय अधिक हो तो वह विदेश सैर करता है। उसकी आय से घरेलू बाजार में मांग कम ही बनती है। इसके विपरीत छोटे उद्यमी की आय अधिक हो तो वह घरेलू बाजार में माल ज्यादा खरीदता है। इस विश्लेषण के सही होने का प्रमाण यह है कि हमारा शेयर बाजार लगातार उछल रहा है जबकि विकास दर लगातार गिर रही है। यह विरोधाभाषी चाल इसलिए है कि कुल अर्थव्यवस्था में संकुचन के बावजूद बड़े उद्योगों का धंधा बढ़ रहा है। जैसे छोटे उद्योगों का धंधा 100 रुपए कम हुआ जबकि बड़े उद्योगों का धंधा 40 रुपए बढ़ा। तब कुल अर्थव्यवस्था में 60 रुपए की कमी आई जबकि बड़े उद्योगों का 40 रुपए का विस्तार हुआ। इसलिए कुल अर्थव्यवस्था के संकुचन से विकासदर गिर रही है लेकिन बड़े उद्योगों का धंधा बढ़ने से शेयर बाजार उछल रहा है। छोटे-बड़े उद्योगों की जो बात देश के अंदर लागू होती है वही विदेश व्यापार पर भी लागू होती। हमने मुक्त व्यापार को स्वीकार किया है जिसके कारण चीन का माल अपने देश में आसानी से प्रवेश कर रहा है। चीन में बड़े उद्योगों द्वारा ही माल अधिकतर बनाया जा रहा है इसलिए हमारे छोटे उद्योग दोहरे दबाव में हैं।

घरेलू बड़े उद्योगों और विदेशी बड़े उद्योगों दोनों के माल का बाजार में आसानी से आने से उनका धंधा कमजोर पड़ रहा है। इस परिस्थिति में सरकार को छोटे उद्योगों को संरक्षण देना चाहिए। जीएसटी में व्यवस्था करनी चाहिए कि कच्चे माल पर दिए गए जीएसटी का छोटे उद्यमों को नकद रिफंड मिले। इसके अलावा पूर्व में जिस प्रकार कई माल को छोटे उद्योगों के उत्पादन के लिए संरक्षित कर दिया गया था उसे पुनः लागू करने पर भी विचार करना चाहिए। हमें समझना चाहिए कि मुक्त व्यापार से आम आदमी का लाभ नहीं हो रहा है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है कि अमरीका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप संरक्षणवाद की तरफ बढ़ रहे हैं। इंग्लैंड में ब्रेक्सिट के अंतर्गत इंग्लैंड के लोगों नें चाहा है कि वे यूरोपियन यूनियन से बाहर आएं, यह मुक्त व्यापार की सैद्धांतिक समस्या है। इतना सही है कि मुक्त व्यापार में पूरे देश अथवा विश्व का एक बाजार हो जाता है और हर व्यक्ति को माल सस्ता मिलता है, लेकिन सस्ते माल को बनाने के लिए बड़े उद्यमियों को खुला मैदान मिलता है जिससे आम आदमी के रोजगार का हनन होता है। वह सस्ते माल को दुकान की खिड़की में देख सकता है, लेकिन उसकी जेब में धन नहीं होता कि उस सस्ते माल को खरीद सके। इसलिए मुक्त व्यापार और बड़े उद्योगों को छूट देने के मंत्र पर सरकार को पुनर्विचार करना पड़ेगा अन्यथा वर्तमान गिरावट रहने की संभावना जारी रहेगी।  

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