Saturday, September 21, 2019 04:51 PM

मंदी नहीं, आर्थिक सुस्ती

एक शोर मचाया जा रहा है। देश में आर्थिक मंदी है। अर्थव्यवस्था चौपट हो गई है। उसकी बुनियाद हिल गई है। देश खोखला और बर्बाद हो जाएगा। दरअसल अर्थव्यवस्था का आकलन ऐसे स्यापों के आधार पर नहीं किया जा सकता। अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ाव आ सकते हैं। जीडीपी की विकास दर भी छलांगें लगाती रही है। बेशक आर्थिक संकट का दौर है या यूं कहें कि उपभोक्ता की मांग ठंडी है। बाजार में नकदी की कमी है। बैंक और एजेंसियां कर्ज देने में संकोच कर रही हैं। लिहाजा आर्थिक सुस्ती या धीमेपन की स्थितियां बनी हैं, लेकिन इसे ‘आर्थिक मंदी’ करार नहीं दिया जा सकता। भारत के जीडीपी की विकास-दर, अप्रैल-जून की तिमाही के दौरान, पांच फीसदी रही है। दुनिया में अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, कनाडा सरीखे विकसित देशों की विकास-दर ऋणात्मक है। इसके बावजूद उन देशों ने मंदी घोषित नहीं की है। हमारी विकास-दर आज भी सकारात्मक है। चिंता की वजह यह है कि 2018 में इसी अवधि के दौरान जो विकास-दर थी, आज उसमें महत्त्वपूर्ण गिरावट आई है। अर्थव्यवस्था के कोर सेक्टर (कोयला, सीमेंट, इस्पात, ऊर्जा आदि) की विकास-दर करीब 7.3 फीसदी से घट कर 2.1 फीसदी हो गई है। इसके अलावा पर्यटन, शिपिंग, कपड़ा, औद्योगिक उत्पादन, कम्यूटर, रियल एस्टेट और आटोमोबाइल क्षेत्रों में भी लगातार गिरावट देखी जा रही है। आसार ऐसे हैं कि भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अनुमानित विकास-दर 6.9 फीसदी को छूना बेहद कठिन लग रहा है। तो सवाल सहज है कि हम 2024 तक पांच ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था होने का लक्ष्य कैसे हासिल कर सकेंगे? अर्थशास्त्री मानते हैं कि उस लक्ष्य के लिए 12-16 फीसदी की निरंतर विकास-दर होनी चाहिए। कुछ अर्थशास्त्रियों का गणित है कि यदि विकास दर 20-22 फीसदी रहती है, तो उसी सूरत में हम पांच ट्रिलियन डालर तक पहुंच सकते हैं। लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह समेत कांग्रेस के बड़े नेता मौजूदा संकट को ‘आर्थिक मंदी’ साबित करने पर आमादा हैं। पूर्व प्रधानमंत्री इस स्थिति के लिए बुनियादी तौर पर नोटबंदी और जीएसटी को जिम्मेदार मान रहे हैं। उन्होंने कई टिप्पणियां की हैं और मौजूदा दौर को ‘लंबी मंदी’ करार दिया है। डा. सिंह ने आटो उद्योग में करीब 3.5 लाख नौकरियां खत्म होने का भी उल्लेख किया है। बेशक डा. मनमोहन सिंह विश्व स्तर पर प्रख्यात अर्थशास्त्री माने जाते रहे हैं, लेकिन अपने विश्लेषण में वह पूर्वाग्रही हैं। यह उनकी राजनीतिक विवशता हो सकती है। नोटबंदी की घोषणा आठ नवंबर, 2016 को की गई थी। जीडीपी की विकास दर उसके बाद भी करीब आठ फीसदी थी। करीब तीन साल बीत चुके हैं। नोटबंदी के बावजूद भाजपा को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जनादेश हासिल हुआ। इतने अंतराल में नोटबंदी काफी पीछे छूट चुकी है। उसके कारण आर्थिक सुस्ती मानना गलत आकलन है। आर्थिक मंदी की स्थिति 1991 में थी, जब हमारे कोष में विदेशी मुद्रा मात्र 28 अरब डालर रह गई थी, लेकिन आज हमारे पास विदेशी मुद्रा का भंडार करीब 490 अरब डालर का है। सिर्फ आटो उद्योग के कमजोर होने या बिस्कुट कंपनी में छंटनी के आधार पर ही देश की सकल अर्थव्यवस्था का आकलन नहीं किया जा सकता। उसके कई कारण हो सकते हैं। अब त्योहारों से पहले के मौसम में भी आटो बाजार में ठंडक है। बड़ी रियायतों के बावजूद ग्राहक कारों की तरफ आकर्षित नहीं हो रहा है, तो इसके कई और कारण हो सकते हैं। संभवतः कार के प्रति सामाजिक आकर्षण कम हो रहा हो या ग्राहक बिजली से चलने वाली अपेक्षाकृत सस्ती कारों का इंतजार कर रहे हों। बहरहाल हमारा मानना है कि कारों की तुलना में रोजगार, रोटी और घर ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं। सरकारी आंकड़ों के ही मुताबिक, बेरोजगारी बीते 45 सालों में अभी सर्वाधिक है। बेरोजगारी के अलावा, किसान को अपनी फसल की उचित कीमत नहीं मिल पा रही है। औसतन किसान पर लाखों का कर्ज है। नतीजतन ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के हाथ में पैसा ही नहीं है। जब तक पैसा नहीं होगा, तब तक मांग नहीं बढ़ेगी। तो उपभोक्ता खुलकर बाजार में कैसे आएगा? एक अर्थशास्त्री ने नारा दिया है ‘‘सामान खरीदो, देश बचाओ।’’ यानी बुनियादी संकट उपभोक्ता की कम मांग और निवेश का है। हमें प्रतीक्षा करनी चाहिए कि सरकार इन संकटों और सुस्ती से पार पाने के लिए क्या कदम उठाती है? सरकार एमएसएमई वर्ग के छोटे और मझोले उद्योगों के लिए क्या करती है? उत्पादन और निर्माण क्षेत्रों में कितना निवेश बढ़ाया जाता है? देश की बर्बादी और खोखलेपन से उन्हें भी कुछ हासिल नहीं होगा, जो ऐसे जुमले उछाल रहे हैं।