Thursday, July 09, 2020 04:50 PM

मजदूरों की घर वापसी करे सरकार

कंचन शर्मा

लेखिका शिमला से हैं

कोरोना वायरस के काल में जबकि पूरी दुनिया थम चुकी है, ऐसे में हमारे देश में लाखों-करोड़ों मजदूर भूख-प्यास से बेहाल, पैरों में छाले लिए दिन-रात घर वापसी के लिए सैकड़ों मील लंबा दुरूह सफर करने को मजबूर हैं। इससे विकट स्थिति इन मजदूरों के लिए और क्या हो सकती है! इसी प्रकरण के चलते औरंगाबाद में ट्रैक पर सोए मजदूरों के कटने की खबर ने दिल झकझोर कर रख दिया। निर्माण के किसी भी क्षेत्र में सबसे ज्यादा पसीना बहाने वाले आज इस विकट समय में भूख-प्यास और पैदल चलने की थकान में सबसे ज्यादा आंसू बहा रहे हैं। न केवल बिहार बल्कि पूरे देश के मजदूर अपने-अपने घरों की वापसी में तिल-तिल को मजबूर हैं। उनके पास शहरों में काम नहीं रहा, देने को मकान का किराया नहीं रहा, खाने को रोटी नहीं, जाने को किराया नहीं, सरकार से मदद नहीं। आम इनसान को इनसे सरोकार नहीं। ऐसे में मजदूर घर वापसी नहीं करेगा तो क्या करेगा। सड़कों से जाते हैं तो पुलिस रोकती है, ट्रैक से चलें तो ट्रेन काटती है, गांव से जाएं तो गांव वाले आपत्ति करते हैं। कंधों पर भूख-प्यास से बिलखते बच्चे, भूख से लड़खड़ाती टांगें, पांवों में छाले और बहुत से तो नंगे पैर ही पत्थर, कंकड़, कांटों भरी राह पर चलने को मजबूर हैं। चलते-चलते इंतजार है तो केवल राह किनारे इन मजदूरों के लिए खाना खिलाने वाले कुछ सज्जन लोगों का। कुछ खाते हैं और कुछ बचा कर साथ रख लेते हैं, क्या मालूम आगे कुछ मिले न मिले। सभी मजदूरों की दुख भरी कहानी एक सी है। कुछ के भूख-प्यास व थकान से मरने के समाचार हैं। घर वापसी के लिए जो ट्रेनें व बसें हैं वो पर्याप्त नहीं। लॉकडाउन कब तक चलेगा, इसकी कोई तारीख नहीं। इन मजदूरों के पास प्राइवेट गाडि़यों के लिए पैसा नहीं। आखिर क्यों इन लोगों के लिए राज्य सरकारें कुछ नहीं कर रही। करोड़ों-अरबों रुपए कोविड फंड में दान किए जा रहे हैं, क्या इसमें से इन मजदूरों के लिए कुछ भी नहीं। एक प्रबुद्ध नागरिक होने के नाते मेरा निजी आह्वान है सरकार से कि जब तक एक-एक मजदूर अपने घर सरकार के सहयोग से नहीं पहुंचता, तब तक एक भी कोविड का पैसा किसी का भी मनोबल बढ़ाने के लिए खर्च न किया जाए।

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