Monday, June 01, 2020 01:52 AM

मजदूर के नाम पर आश्वासन

भारत के औसत मजदूर की तस्वीर आज भी नहीं बदली। सात दशकों की देश की आजादी के बाद भी यह यक्ष-प्रश्न की तरह मौजूद है। मजदूर की स्थिति और छवि एक लाचार, असहाय और बेबस, पलायनवादी व्यक्ति की है। उसे गांव छोड़ कर महानगर आना पड़ा, फिर गांव लौटा, हाथ और जेब खाली ही रहे या परिवार के पोषण में दिक्कतें आती रहीं, लिहाजा पेट और परिवार की खातिर महानगरों की ओर ही जाना पड़ा। भारत में औसत मजदूर की नियति का चक्र कमोबेश ऐसा ही रहा है। दरअसल मजदूर और किसान कांग्रेस की बहुधा सरकारों की प्राथमिकता नहीं रहे। शहरीकरण और घोटाले ही उनकी नीयत में रहे। यही कारण है कि आज लॉकडाउन के एक झटके ने सब कुछ बिखेर कर रख दिया। मजदूर सड़कों, पगडंडियों, खेतों-गांवों के ऊबड़-खाबड़ रास्तों, राजमार्गों और रेल की पटरियों पर एक भीड़ के तौर पर दिखाई दे रहा है। वह कट-मर भी रहा है। हर रोज दुर्घटनाएं हो रही हैं या की जा रही हैं। अब तो सरकारों और अन्य की संवेदनाएं भी ठंडी पड़ चुकी हैं। कुछ हरजाने जरूर घोषित किए जाते हैं। मजदूर की बेबसी और लाचारी के कई दृश्य हैं, लेकिन विडंबना है कि आज भी कोई ठोस, राष्ट्रीय मजदूर नीति नहीं है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आर्थिक पैकेज का दूसरा हिस्सा किसानों, प्रवासी मजदूरों और रेहड़ी-पटरी वालों के नाम संबोधित किया है। देश और सरकारों को किसान और कृषि की कई आधारों पर मदद करनी पड़ी है। ढेरों किस्म के कार्ड, कर्ज, बीमा और सम्मान राशियां दी जाती रही हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य की भी अपनी राजनीति है। किसान के प्रति सरकारें इसलिए मजबूर रही हैं, क्योंकि वह एक ठोस और एकजुट वोट बैंक है, लिहाजा हम प्राथमिकता से मजदूरों की बात करेंगे, क्योंकि वे चुनावी मुद्दा भी बन सकते हैं। यह फिलहाल सबसे ज्वलंत विषय भी है और सरकार पर सवाल भी खड़े करता है। मजदूर कहीं भी काम करे, वह बुनियादी तौर पर असंगठित ही है। पैकेज का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह रहा है कि असंगठित होने के बावजूद उसकी सामाजिक सुरक्षा, न्यूनतम वेतन, ग्रेच्युटी, ईएसआई, स्वास्थ्य के सालाना चेकअप आदि व्यवस्थाओं को सुनिश्चित करने की बात पैकेज में कही गई है। भाजपा और अन्य श्रम संगठन इनमें से ज्यादातर मुद्दों को उठाते रहे हैं। आंदोलन भी किए गए हैं, लिहाजा ये कोई नई पहल नहीं है। फर्क इतना है कि अब भाजपा केंद्र सरकार में है और ज्यादातर राज्यों में भी उसकी या गठबंधन के सहयोगी दल की सत्ता है। यदि मजदूर लॉकडाउन के लागू होते ही खाली जेब, खाली पेट हुआ है, तो ठेकेदार और मजदूर के पुराने समीकरणों को खंगाला जाना चाहिए। सरकार ऐसे प्रावधान रखे कि ठेकेदार मजदूर का नियमित शोषण न कर सकें। पैकेज के मुताबिक, मनरेगा की दिहाड़ी 182 रुपए से बढ़ाकर 202 रुपए की गई है और मई में पंचायतों के तहत 2.33 करोड़ मजदूरों को काम भी मिला है। यह मई, 2019 की तुलना में 40-50 फीसदी ज्यादा रोजगार दिया गया है। पैकेज में इस मद के लिए 10,000 करोड़ रुपए खर्च करने की व्यवस्था की गई है। यहां सवाल मौजू है कि यदि राज्य सरकारों और मनरेगा के तहत काम मिलता रहे, तो मजदूरों का पलायन ही क्यों हो? मौजूदा पलायन आजादी के दौर के बाद सबसे बड़ा है। पैकेज में तीन वक्त के खाने, दो माह के लिए फ्री राशन और ‘एक देश, एक राशन कार्ड’ की घोषणा भी की गई है। लॉकडाउन के दौरान केंद्र समेत कई राज्य सरकारों ने मुफ्त राशन मुहैया कराने के दावे किए। भाजपा ने भी पांच करोड़ लोगों को खाना खिलाने का संकल्प लिया और उसे सार्वजनिक भी किया। एक राशन कार्ड वाली घोषणा 2019 के चुनाव वाली है। तो फिर पैकेज में नया क्या है? क्या सरकार इस बार अपना संकल्प पूरा करेगी? दावा यह भी किया गया है कि देश के 83 फीसदी नागरिकों के पास राशन कार्ड हैं। पैकेज में रेहड़ी-पटरी वालों को 10,000 रुपए का कर्ज मुहैया कराने के लिए 5000 करोड़ रुपए की व्यवस्था घोषित की गई है। दावा है कि ऐसे 50 लाख लोगों को फायदा होगा और वे अपना स्वरोजगार बढ़ा सकेंगे। कुछ और भी घोषणाएं की गई हैं, लेकिन बुनियादी सवाल तो यह है कि सड़कों पर पलायन कर रहे मजदूर को सरकार या उसके प्रतिनिधि कैसे विश्वास दिलाएंगे कि उनकी चिंता की जा रही है और भविष्य संवरा, सुनिश्चित होगा?