मड़ीधार का मनसा देवी मंदिर

वैसे तो पूरे देश में माता मनसा के मंदिर कई जगह स्थित है। ऐसा ही जिला सिरमौर की तहसील पच्छाद की सीमा पर स्थित गांव मानरिया की मड़ीधार में माता मनसा देवी का मंदिर लोगों की श्रद्धा का केंद्र है। एक दर्जन पंचायतों के लोग इसे अपनी कुल देवी के रूप में पूजते है। यह मंदिर समुद्र तल से लगभग 8 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित है। इस मंदिर से चूड़धार की पहाडि़यों का विहंगम दृश्य नजर आता है। इस मंदिर के इतिहास के बारे में कोई पुख्ता सबूत तो नहीं है, मगर किंवदंतियों के मुताबिक यह मंदिर चौदह सौ वर्ष से भी अधिक पुराना माना जाता है। यह प्राचीन मंदिर आकर में छोटा है और लकड़ी की कडि़यों के ऊपर मंदिर के गुंबद का निर्माण किया गया था। हालांकि अब इस मंदिर के मूलरूप से छेड़छाड़ किए बिना पुनर्निर्माण किया जा रहा है, जिसके तहत मंदिर के ऊपर 108 फुट ऊंचे गुंबद का निर्माण किया जा रहा है। इस मंदिर में काले रंग के पत्थर पर तराशी करके माता मनसा देवी, शेष शैय्या पर लेटे हुए विष्णु भगवान और माता लक्ष्मी उनके चरण दबाते हुए दिखाई दे रही है। मंदिर में गणपति महाराज, काली माता सहित कई प्राचीन मूर्तिया स्थापित हैं। इस प्रकार की मूर्तियां आसपास के इलाके के मंदिरों में देखने को नहीं मिलती हैं। इस मंदिर से लगभग आधा किमी. दूर दो प्राचीन बावडि़यां भी मौजूद हैं, जिनका जल आगुंतको को शीतलता प्रदान करता है। स्थानीय निवासियों के मुताबिक पहले इस स्थान पर जल का कोई स्रोत नहीं था। इस मंदिर में पूजा अर्चना करने के लिए नहर सवार गांव से करीब एक घंटे की खड़ी चढ़ाई की यात्रा करने के पश्चात पुजारी यहां आते थे। वो अपने साथ घीया को सुखा कर तैयार की गई तुमड़ी में जल भरकर साथ लाते थे और उसे देव कार्य में इस्तेमाल करते थे। एक दिन जब वो जल लेकर आ रहे थे, तो एक स्थान पर विश्राम करने के लिए रुके व उस तुमड़ी को एक स्थान पर रख कर शौच के लिए चले गए। जैसे ही वो वापस आए, तो उन्होंने देखा कि उनकी तुमड़ी गिर गई थी और पानी भी गिर चुका था। इस पर पुजारी चिंतित हो गए और सोच में पड़ गए कि बिना जल से आज पूजा कैसे होगी। इसी सोच में उन्हें पेड़ की छांव में नींद आ गई। नींद में माता ने उन्हें दर्शन दिए और कहा कि जहां तुम लेटे हो वही खुदाई करो, तुम्हें पानी मिल जाएगा। पुजारियों ने जैसे ही खुदाई की वहां उन्हें जल का स्रोत मिला। बाद में वहां पर दो बावडि़यों का निर्माण किया गया। एक बावड़ी के जल का प्रयोग केवल देवकार्य के लिए ही किया जाता है, जबकि दूसरी बावड़ी के जल का प्रयोग आम जनता करती है। लोगों का मानना है कि इस जल स्रोत में कभी भी जल की कमी नहीं होती। यह मंदिर सराहां से 37 किमी. की दूरी पर स्थित है तथा सड़क मार्ग से जुड़ा है। प्रत्येक माह की संक्रांति को मंदिर में भंडारे का आयोजन किया जाता है। श्रद्धालुओं के रुकने के लिए भी मंदिर कमेटी द्वारा व्यवस्था उपलब्ध है। गौरतलब है कि मनसा देवी नागों के राजा वासुकी की बहन मानी जाती है। इन्हें भगवान शिव की पुत्री भी माना जाता है।  सच्चे मन से मांगी हर मुराद माता मनसा देवी पूरी करती है।

- संजय राजन, सराहां