मन पक्का कर लें तो शरीरकुछ भी करने में सक्षम है

मेरा भविष्‍य मेरे साथ-9

सैनिक प्रशिक्षण केंद्र में कठोर ट्रेनिंग, बात बात पर सजाए खाने व सोने को भी वक्त न मिलना,  शरीर का हर अंग ऐसे दुखता था कि उठना-बैठना भी मुश्किल था। तब हमें टायलेट की छत से लटकती रस्सी का औचित्य समझ आया जब नित्य कर्म के लिए उसकी मदद लेनी पड़ती थी और उसी के सहारे बैठे हुए नींद पूरी करते थे। एक दिन एसटीडी  बूथ पहुंच मां से बात की। मां ने पूछा कि आवाज बड़ी उदास लग रही है क्या बात है ट्रेनिंग में ज्यादा तंगी है क्या। मैंने रूहांसे स्वर में सब छोड़ घर आने की बात कही तब मां ने कहा कि बेटा तुम्हारे नाना ने सेना में  तीन लड़ाइयां लड़ी थीं, 62 की लड़ाई में  पलटन से अलग  लापता  दो साल अकेले जंगलों में रहने के बाद वापस आने पर 65 की लड़ाई में फिर हिस्सा लिया, वह कहते थे कि उनकी बेसिक ट्रेनिंग इतनी सख्त थी कि उसकी बदौलत वह मुश्किल वक्त में भी सर्वाइव कर पाए। आप बाबू नहीं सैनिक हो, मन पक्का करो, शरीर कुछ भी करने में सक्षम है। डर के छोड़ दोगे तो ताउम्र आत्मगिलानी एवं जगहंसाई  के साथ जीना पड़ेगा। मैं दुःखी तो था पर मां की बात से मोटीवेट हो, हर चीज को सकारात्मक लेने लगा।

केंद्र की दीवारों पर लिखे शब्द ट्रेनिंग में बहाया पसीना लड़ाई में खून बचाता है। पक्का इरादा, मजबूत लक्ष्य, एक गोली, एक दुश्मन। तथा उस्तादों द्वारा बात बात पर कहना कि बूट और रिक्रूट को जितना रगड़ोगे उतना चमकेगा। थोड़े दिन में शरीर को आदत हो गई और शायद हम ट्रिक्स आप द ट्रेड भी सीख गए थे। खेल प्रतियोगिता के दौरान मुझे बास्केट बॉल टीम में चुन लिया गया पर बाक्सिंग एवं क्रॉसकंट्री में हिस्सा लेना हर सैनिक के लिए अनिवार्य था। जिसका अभ्यास रोजाना शाम को होता था। जिस शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना को सहन करना नेक्स्ट टू इंपॉसिबल लगता था, इस दौरान पता चला कि गर मन में पक्का इरादा कर लो तो कुछ भी संभव है। रात भर शारीरिक सजा पाना और सुबह बैटल लोड के साथ 12 किलोमीटर दौड़ना, फिर फायरिंग करना, यह सब हम उम्र साथियों के लिए रोज का काम हो गया था और इसे अब हम सब हंसते खेलते करने लगे थे। सेना में हिमाचल, जम्मू यानी डोगरा, पंजाब मतलब सरदार, हरियाणा, राजस्थान वाले जाट, यूपी, बिहार एवं एमपी वाले बिहारी, उड़ीसा, बंगाल यानी बंगाली, उत्तर-पूर्व से आने वाले 7 राज्यों के लोगों को थापा या कांचा और साउथ के चारों राज्यों के लोगों को तंबी या अन्ना के नाम से पुकारा जाना ट्रेनिंग सेंटर में रोज की बात थी, जैसे हमारा क्षेत्र और उनकी भाषा के बारे में ज्ञान बड़ा तो हमें हर राज्य और हर क्षेत्र के लोगों का उनकी भाषा के अनुसार पता चलने लगा। नॉन हिंदी भाषीय सैनिकों के लिए दोपहर को हिंदी क्लास चलती थी। कैटल कैचिंग अभ्यास के दौरान नान हिंदी सैनिकों का उस्ताद को रिपोर्ट करना कि आज दो काला गाय भैंस व चार मेल गाय बैल गेंहू का पेड़ खाने आया था। उतरी भारतीय के लिए अकसर सजा के दौरान हंसी का बहाना होता था। बैटल लोड के साथ 5 कि मी. दौड़ व 20 कि मी. पैदल, अलग-अलग हथियारों से विभिन्न दूरी पर लगे टारगेट्स हिट कर ,बाक्सिंग एवं क्रासकंटरी आदि में हिस्सा ले सब को कुशलता से पूरा करने के अलावा  अलग-अलग भाषाओं, क्षेत्रों के बारे में जानकारी, खेल प्रतियोगिता, शारीरिक परीक्षण, जंगल ट्रेनिंग, हथियारों की जानकारी के साथ हमारा प्रशिक्षण खत्म हुआ। ट्रेनिंग में हर क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ रहने वाले रिक्रूट को बैस्ट रिक्रूट का अवार्ड दिया जाता है। पासिंग आउट परेड के दौरान उसे परेड कमांडर बनने का मौका तथा मुख्य अतिथि द्वारा सम्मानित किया जाता है। बैस्ट सैनिक का मैडल लेते वक्त मुझे मां की बात याद आ रही थी कि मन पक्का कर लो, तो शरीर कुछ भी करने में सक्षम है।

 

Related Stories: