Monday, October 21, 2019 10:44 AM

ममता के ‘जय जगन्नाथ’

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हर साल ‘भगवान जगन्नाथ’ की शोभा-यात्रा में शामिल होती रही हैं, लेकिन इस बार वह समावेशी भावना की मिसाल बन गईं। ममता अपनी पार्टी की ही सांसद नुसरत जहां के साथ इस्कॉन मंदिर गईं। दोनों ने पूजा-पाठ किया, भगवान की आरती उतारी, जय जगन्नाथ के नारे लगाए और रथयात्रा को रवाना भी किया। टीवी चैनल पर ये दृश्य हैरान करने वाले थे। जिस ममता को ‘जय श्रीराम’ नारे से इतनी चिढ़ थी कि बोलने वालों की पिटाई करने को वह अपना काफिला रुकवा लेती थीं, आज ‘जय जगन्नाथ’ की मुद्रा में वह किसी भी समर्पित हिंदू से कम नहीं लग रही थीं। हालांकि ममता बनर्जी के हिंदुत्व की ‘पोस्टर गर्ल’ मुसलमान है और मुस्लिम थी, लेकिन फर्क इतना है कि उसने मांग में सिंदूर लगा रखा था, गले में मंगल-सूत्र था, कलाइयों में सुहाग का लाल चूड़ा-पूरी तरह हिंदूवादी दुल्हन के लिबास में...! यही नुसरत जहां है, जो तृणमूल कांग्रेस की सांसद हैं और एक जैन परिवार में उन्होंने शादी की है। ममता इस बार नुसरत को साथ लेकर भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा में शामिल क्यों हुईं? क्या आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर वह हिंदुओं को भी अपने साथ जोड़ने की सियासत कर रही हैं? क्या उन्हें एहसास हो गया है कि सिर्फ मुस्लिम तुष्टिकरण से नहीं, बल्कि हिंदुओं के वोट से ही वह सत्ता में लौट सकती हैं? चूंकि 2019 के लोकसभा चुनाव में करीब 57 फीसदी हिंदुओं ने भाजपा को वोट दिए, नतीजतन उसकी मात्र दो से बढ़कर 18 सीटें हो गईं। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में करीब 32 फीसदी हिंदुओं ने वोट दिए, लेकिन उसकी 34 से घटकर 22 सीटें रह गईं। यह ममता बनर्जी के लिए बड़ा सियासी आघात रहा है। यदि हिंदुओं का ध्रुवीकरण भाजपा की तरफ जारी रहा, तो विधानसभा चुनाव के नतीजे भी अप्रत्याशित हो सकते हैं। लिहाजा कुछ भी दलील दी जाए, लेकिन ममता की रणनीति हो सकती है कि एकमुश्त हिंदू वोटबैंक भाजपा के पक्ष में नहीं जाना चाहिए। शायद इसीलिए ममता ने ‘जय जगन्नाथ’ की शरण ली है। हालांकि श्रीराम और श्री जगन्नाथ दोनों ही एक ईश्वर के अवतार माने जाते हैं, लेकिन ‘जय श्रीराम’ बोलने वालों को जेल की सजा क्यों दी गई? ‘जय श्रीराम’ कहने वालों को ‘गालीबाज’ करार क्यों दिया गया? संभवतः नई चुनाव रणनीति के मद्देनजर ममता बनर्जी ‘श्रीराम’ के नाम से न भड़कें, कुछ अंतर्मन में ही पश्चाताप करें, लेकिन ध्रुवीकरण की उलटी चाल मुश्किल लगती है। जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दुर्गा विसर्जन, राम नवमी, हनुमान जयंती को विधिवत मनाने में रोड़े अटकाए थे, लिहाजा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा था, शायद उस कसैले अतीत को भी ‘दीदी’ दोहराना नहीं चाहेंगी। वह नई रणनीति के तहत अब नई चाल चलने वाली हैं। वह कितनी कारगर रहेगी, वह अलग बात है। एक तरफ ‘जय जगन्नाथ’ और दूसरी तरफ नुसरत जहां ऐसी समावेशी सियासत के जरिए ममता बनर्जी अपने ‘दुर्ग’ को बचाना चाहती हैं। वैसे खुद ममता जन्म से हिंदू (ब्राह्मण) हैं। बीते सालों में उन्होंने पुजारियों का सम्मेलन कराया है, वेल्लूर मठ को 10 करोड़ रुपए और दुर्गा पूजा समितियों को 28 करोड़ रुपए की आर्थिक मदद दी है, लेकिन ईद से पहले मुस्लिम कर्मचारियों के भत्ते भी बढ़ाए हैं। ममता दो नावों पर सवारी करना चाहती हैं। मुस्लिम तुष्टिकरण की बात वह ढोल-नगाड़े बजाकर करती रही हैं। बेशक संविधान धर्म, जाति, पंथ, संप्रदाय के आधार पर चुनाव प्रचार करने की इजाजत नहीं देता, लेकिन हिंदू-मुसलमान ही बंगाल चुनाव के यथार्थ हैं। ममता कितनी भी कोशिशें कर लें, उनकी छवि ‘हिंदू-विरोधी’ की बन गई है, लिहाजा ‘जय जगन्नाथ’ बोलकर रथयात्रा को रवाना करने से भी बहुत फर्क पड़ने वाला नहीं है।