महात्मा गांधी और कश्मीर

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

डोगरा शासक महाराजा प्रताप सिंह ने महात्मा गांधी को 1915 में श्रीनगर आने का निमंत्रण दिया था। ध्यान रहे महाराजा प्रताप सिंह को ब्रिटिश सरकार प्रताडि़त ही नहीं कर रही थी बल्कि उनको पदच्युत करने का प्रयास भी कर रही थी। महात्मा गांधी का निश्चित मत था कि रियासतों में कांग्रेस को अपना संगठन शुरू नहीं करना चाहिए। क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने अधिकांश भारत पर तो कब्जा कर ही रखा था। रियासतों में अभी भी भारतीय शासक थे...

संसद द्वारा अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिए जाने के कारण जम्मू-कश्मीर, विशेष कर कश्मीर संभाग को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। इस पूरी बहस में कश्मीर को लेकर महात्मा गांधी का क्या मत था, यह जान लेना रुचिकर होगा। वैसे तो जिस समय अक्तूबर 1949 में उस समय की संविधान सभा में जब अनुच्छेद 370 को लेकर बहस हो रही थी, तब महात्मा गांधी यह संसार छोड़ कर जा चुके थे, लेकिन अनुच्छेद 370 का जन्म अक्तूबर 1949 में हुआ था, यह तो ठीक है, लेकिन उसका बीजारोपण पंडित जवाहर लाल नेहरू, माऊंटबेटन दंपति और शेख मोहम्मद अब्दुल्ला अक्तूबर 1947 में ही कर चुके थे। इसलिए इस विषय पर महात्मा गांधी के मानस को जान लेना उचित होगा। जम्मू-कश्मीर के डोगरा शासकों के साथ महात्मा गांधी का संबंध किसी न किसी प्रकार से बना हुआ था। डोगरा शासक महाराजा प्रताप सिंह ने महात्मा गांधी को 1915 में श्रीनगर आने का निमंत्रण दिया था।

ध्यान रहे महाराजा प्रताप सिंह को ब्रिटिश सरकार प्रताडि़त ही नहीं कर रही थी बल्कि उनको पदच्युत करने का प्रयास भी कर रही थी। महात्मा गांधी का निश्चित मत था कि रियासतों में कांग्रेस को अपना संगठन शुरू नहीं करना चाहिए। क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने अधिकांश भारत पर तो कब्जा कर ही रखा था। रियासतों में अभी भी भारतीय शासक थे। चाहे उनके अधिकारों को भी ब्रिटिश सरकार  ने सीमित किया हुआ है। गांधी मानते थे कि भारतीयों को मिल कर अंग्रेजी शासन से लड़ना चाहिए कि रियासतों के भारतीय शासकों से, लेकिन 1915 में अनेक कारणों से गांधी जी जम्मू-कश्मीर नहीं जा सके।

1932 में जब शेख अब्दुल्ला ने ब्रिटिश सरकार की प्रत्यक्ष-परोक्ष सहायता से स्थानीय शासकों के खिलाफ  मोर्चा खोल दिया था और राज्य में हिंदू-मुस्लिम विवाद पैदा करने का प्रयास शुरू कर दिया था तो महात्मा गांधी जी एक बार फिर श्रीनगर जाना चाहते थे, क्योंकि गांधी जी किसी भी तरह हिंदू-मुस्लिम खाई को बढ़ने देना नहीं चाहते थे, लेकिन अनेक कारणों से गांधी जी वहां उस समय भी नहीं जा सके। 1946 में गांधी जी ने एक बार फिर श्रीनगर जाने का कार्यक्रम बनाया, लेकिन किन्हीं कारणों से वह भी संभव नहीं हो सका। उधर जिन्ना कश्मीर की वादियों में जहर घोल रहे थे। मुस्लिम नेतृत्व को लेकर शेख मोहम्मद अब्दुल्ला का विवाद इन्हीं दिनों शुरू हुआ था।

गांधी जी को लगा कि अब उनको हर हालत में जम्मू-कश्मीर में जाना ही चाहिए। जैसे ही उनके श्रीनगर जाने की भनक लगी, निहित स्वार्थी तत्त्वों ने प्रचार करना शुरू कर दिया कि गांधी जी महाराजा हरि सिंह पर दबाव डालने जा रहे हैं कि वे भारत में शामिल हो जाएं। मुस्लिम लीग तो यह प्रचार कर ही रही थी, लेकिन उससे भी ज्यादा चिंता माऊंटबेटन दंपति की थी। लार्ड माऊंटबेटन कुछ दिन पहले ही श्रीनगर में जाकर भारत में न शामिल होने के लिए डरा धमका आए थे। इसलिए जम्मू- कश्मीर जाने से कुछ दिन पहले 29 जुलाई 1947 को गांधी जी अपनी प्रार्थना सभा  में इस दुष्प्रचार का उत्तर दिया। उन्होंने कहा, ‘मैं महाराजा को यह सलाह देने के लिए जम्मू-कश्मीर नहीं जा रहा कि उन्हें भारत में शामिल होना चाहिए या पाकिस्तान में। राज्य में असली सत्ता तो लोगों के हाथ में होती है। शासक तो जनता का नौकर है। यदि वह अपने आप को नौकर नहीं मानता तो वह असली शासक है ही नहीं। मेरा तो अंग्रेजों के साथ झगड़ा ही इस बात को लेकर है। वे अपने आपको इस देश का शासक बताते हैं। मैंने उन्हें शासक मानने से इनकार कर दिया। शासक तो एक दिन मर जाएगा। महाराजा भी एक दिन मर जाएंगे। लेकिन लोग सदा रहेंगे।

पाकिस्तान में जाना है या हिंदोस्तान में, इसका निर्णय तो लोग ही करेंगे। अभी तक रियासतों पर वायसराय का डंडा चलता था, लेकिन अब अंग्रेज तो जाने वाले हैं। इसलिए असली प्रभुसत्ता जनता के हाथ में आ गई है। कश्मीर के गरीब लोग मुझे जानते हैं। ‘महात्मा गांधी ने अपनी इस सभा में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण बात कही थी कि कश्मीर के लोग मुझे जानते हैं। गांधी जी तो भारत विभाजन के ही खिलाफ थे। वे अंत तक अखंड भारत के समर्थक रहे थे। वे हिंदू भारतीय और मुसलमान भारतीय का विभाजन भी स्वीकार नहीं करते थे। उनके लिए वे एक ही राष्ट्र के एकात्म अंग थे। मतांतरण को वे राष्ट्रांतरण का आधार नहीं मानते थे। इसलिए उन्होंने संकेत दे दिया था कि कश्मीर के लोग मुझे जानते हैं। अब देखना था कि श्रीनगर में क्या होता है? इसलिए सब की आंखें श्रीनगर की ओर लगी थीं। महात्मा गांधी 77 साल की उम्र में पहली बार 1947 में प्रथम अगस्त को जम्मू-कश्मीर गए थे।

अंग्रेजों के भारत से चले जाने में कुछ दिन ही बचे थे। गांधी जी को चिंता थी कि साम्राज्यवादी और सांप्रदायिक शक्तियां जम्मू-कश्मीर में अराजकता पैदा करेंगी। गांधी, माऊंटबेटन को समझते-समझते इतना तो समझ ही गए होंगे कि ब्रिटिश रणनीति जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान में शामिल करवाने की रहेगी। वैसे भी एक महीना पहले माऊंटबेटन, जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह को समझाने और डराने के लिए स्वयं श्रीनगर जा चुके थे, लेकिन महाराजा किसी भी तरह पाकिस्तान में जाने के लिए तैयार नहीं थे। राज्य के एक हिस्से, कश्मीर घाटी में शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने भी अंग्रेजों की प्रत्यक्ष परोक्ष सहायता से अपने लिए स्थान बना लिया था। वह भी इस मामले में सौदेबाजी कर रहा था। उसके प्रतिनिधि पाकिस्तानी नेताओं के बराबर सम्पर्क में थे, लेकिन जिन्ना उससे व्यक्तिगत कारणों से काफी खफा थे, इसलिए वहां उसकी दाल गलती नजर नहीं आ रही थी। ऐसे समय में महात्मा गांधी रियासत में पहुंचे थे।

वे तीन दिन कश्मीर घाटी में रहे और दो दिन जम्मू में,  लेकिन इसे भारत का दुर्भाग्य ही कहना होगा कि नरसिम्हा राव के कार्यकाल के उपरांत भारत की सबसे पुरानी पार्टी इतालवी मूल की सोनिया गांधी के कब्जे में आ गई जिसका भारत में प्रवेश नेहरू वंश के एक बेटे राजीव गांधी से शादी के माध्यम से हुआ था। उसका न तो कांग्रेस की परंपरा से कोई संबंध था और न ही महात्मा गांधी के वैचारिक अनुष्ठान से। यही कारण है कि जब संसद ने अनुच्छेद 370 को समाप्त कर जम्मू-कश्मीर में भारतीय संविधान को लागू कर दिया तो उसका सबसे ज्यादा विरोध सोनिया माईनो गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने ही किया।

इसके लिए कांग्रेस देश भर में मुसलमानों को भड़काने में अग्रणी हो गई , जैसे अनुच्छेद 370 के हटने से भारत के तमाम मुसलमानों के अधिकारों का हनन हो रहा हो। मामला यहां तक पहुंचा कि इस प्रश्न को लेकर धीरे-धीरे कांग्रेस और पाकिस्तान का स्वर एक ही हो गया। दरअसल अनुच्छेद 370 की समाप्ति महात्मा गांधी को समस्त भारतीयों की ओर से दी गई सच्ची श्रद्धांजलि थी, लेकिन सोनिया गांधी उसका विरोध कर स्वर्ग में भी गांधी जी की आत्मा को कष्ट पहुंचाया है, जिसे  गांधी माफ  करेंगे और न ही भारतीय।

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