महिलाओं को न्याय चाहिए, दया नहीं

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

हाल के दिनों में चार मुद्दों पर बहस हो रही है। 1. देश बलात्कार की घटनाओं से भरा हुआ हो गया है और वास्तव में एक राजनेता जो क्रूर मजाक के लिए जाना जाता है, भारत को एक बलात्कारी कहता है। 2. भारत में अन्य देशों की तुलना में विशेष रूप से यौन अपराधों की घटनाओं में वृद्धि हुई है। 3. महिलाओं को समानता की जरूरत है ताकि इस तरह की घटनाओं को कम किया जा सके। 4. बलात्कार घटिया कानून और व्यवस्था के परिणाम हैं...

भारतीय मीडिया में बलात्कार बार-बार दोहराया जाने वाला शब्द बन गया है क्योंकि हाल के दिनों में बहुत से भीषण और कू्रर बलात्कार हुए हैं और यह विषय खूब उछल रहा है। असामान्य व्यवहार प्रदर्शित होने पर बलात्कार में लिप्त होने के मनोवैज्ञानिक कारण हैं, लेकिन सामान्य जीवन में भी अनिच्छुक महिला यौन संबंधों पर यौन अतिरेक में लिप्त होने की प्रवृत्ति वासनात्मक क्रियाएं हैं जिन्हें दंडित नहीं किया जा सकता है, लेकिन वे निंदनीय हैं। आपराधिक कार्यों के लिए सेक्स सबसे प्रचलित मकसद है, लेकिन जैसे ही समाज विकसित होता है तथा समानता और अच्छे संचार के भाव संभव हो पाते हैं, ऐसा ही सहजावबोध विभिन्न अच्छी और सामाजिक रूप से स्वीकृत कार्रवाइयों में परिष्कृत होता है। फिर भी यह आश्चर्य की बात है कि संयुक्त राज्य अमरीका और जर्मनी जैसे उन्नत देशों में यह उच्च घटना है। हाल के दिनों में चार मुद्दों पर बहस हो रही है। 1. देश बलात्कार की घटनाओं से भरा हुआ हो गया है और वास्तव में एक राजनेता जो क्रूर मजाक के लिए जाना जाता है, भारत को एक बलात्कारी कहता है। 2. भारत में अन्य देशों की तुलना में विशेष रूप से यौन अपराधों की घटनाओं में वृद्धि हुई है। 3. महिलाओं को समानता की जरूरत है ताकि इस तरह की घटनाओं को कम किया जा सके। 4. बलात्कार घटिया कानून और व्यवस्था के परिणाम हैं। मैं इस लेख में बताना चाहता हूं कि उपरोक्त सभी कथन सत्य नहीं हैं। हालांकि मेरा मानना है कि एक भी बलात्कार निंदनीय है, फिर भी मैं इस सब की एक कम गंभीर तस्वीर को चित्रित करना चाहूंगा क्योंकि जहां तक अंतरराष्ट्रीय तुलना का संबंध है, भारत अन्य देशों की तुलना में इस अपराध में कमतर है। उन्नत देशों में बलात्कार की सबसे ज्यादा घटनाएं होती हैं, उदाहरण के लिए अमरीका में 8476, जर्मनी में 7724, जबकि भारत में 2172 हैं।

यह सच नहीं है कि भारतीय महिलाएं असमानता से पीडि़त हैं। समानता के लिए कोई दीवानगी नहीं है क्योंकि यह संभव नहीं है कि महिलाएं कई मायनों में श्रेष्ठ हों और शारीरिक शक्ति जैसे अन्य क्षेत्रों में पुरुष श्रेष्ठ हों। आइए हम यौन अपराधों की दो प्रमुख घटनाओं पर नजर डालते हैं ः पहला मामला हैदराबाद का है जहां महिला डाक्टर ने यौन उत्पीड़न की शिकायत की थी और उन्हीं लोगों द्वारा उसे प्रताडि़त किया गया था। स्थिति को समझने के लिए एक ही दृश्य के मध्य, रात्रि में पुलिस ने सभी चार लोगों की बंदूक की लड़ाई में मार दिया। पुलिस के दावे के अनुसार इसके कई तर्क हैं, अपराधी पुलिस के हथियार छीनकर भागने की फिराक में थे। आत्मरक्षा में पुलिस ने उन्हें मार डाला। मानव अधिकार तर्क है कि पुलिस ने उन्हें मार डाला। सच्चाई जो भी हो, लेकिन जैसा कि देशभर में देखा गया, बलात्कार के आरोपियों का मुठभेड़ में मारा जाना देश के लोगों के लिए उत्सव मनाने जैसी घटना थी क्योंकि वे बलात्कार को सबसे निंदनीय घटना के रूप में मानते हैं। यूपी के मामले में महिला कुछ अपराधियों के खिलाफ  रिपोर्ट करने के लिए पुलिस स्टेशन गई थी जो उसे परेशान कर रहे थे। ऐसा कई अखबारों ने लिखा है। लेकिन पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज नहीं की क्योंकि रिपोर्ट के अनुसार अपराधी बलात्कार की धमकी दे रहे थे। पुलिस ने यह कहते हुए विश्वास करने से इनकार कर दिया कि ‘बलात्कार’ नहीं हुआ है, केवल तभी अपराध हुआ माना जाएगा जब अपराध हुआ हो। वह घर वापस जा रही थी, जब इन अपराधियों ने खेतों में उसके साथ बलात्कार किया और उसे मार डाला। जब वह जीवित थी, तो उसने बहन को सूचित किया, जिसे दिल्ली में अस्पताल ले जाया गया, जहां वह जख्मों के कारण जीवित नहीं रह सकी। उसने मामले के बारे में मरते हुए बयान और जानकारी दी।

दोनों मामलों में यह स्पष्ट है कि महिलाओं और कानून का पूरी तरह अनादर किया गया। कानून के डर की कमी के कारण यह संभव है कि मामलों में इतनी देरी हो जाती है कि जब मामला तय हो जाता है तो कोई भी सजा को नहीं जोड़ सकता है। दिल्ली के प्रसिद्ध निर्भया मामले को लें, जिसने राष्ट्रीय ध्यान और चिंता को पकड़ने के बावजूद फास्ट ट्रैक कोर्ट में 7 साल का समय लिया है। यह अपराध प्रबंधन में स्वयंसिद्ध है कि अपराध पर अंकुश लगाने के लिए सजा तत्काल होनी चाहिए। देरी होने पर यह अपना मूल्य खो देता है। नौ लाख से अधिक ऐसे मामले, जिनमें ज्यादातर किशोर यौन अपराध से संबंधित हैं, भारतीय अदालतों में लंबित पड़े हैं। अदालतों में इस तरह की दौड़ और न्याय पाने में अक्षमता महिलाओं से आदर व सम्मान छीन लेते हैं। यह अफसोस की बात है कि पुलिस से लेकर अदालतों तक पूरी न्याय व्यवस्था को महिला के सम्मान के खिलाफ  तौला जाता है। महिलाओं को समानता या दया की आवश्यकता नहीं है। यहां तक कि जन्मदिन का जश्न मनाने को छोड़ देना भी कोई समाधान नहीं है, महिलाओं को न्याय और सम्मान की जरूरत है। एक लड़की धर्मशाला में शिक्षक द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकायत करती है, लेकिन बाद में पुलिस रिकॉर्डिंग में उसे अपना बयान बदलने के लिए कहा जाता है। बाद में एक एनजीओ को यह पता चलता है। जिस तरह से पुलिस थानों या कार्यालयों में या सार्वजनिक जरूरतों में महिलाओं से व्यवहार किया जाता है, उससे इस तरह की समस्याओं का माकूल और समय पर समाधान नहीं हो पाता। आरोपियों के सम्मान की खातिर इस तरह के मामलों को दबा दिया जाता है। समाज की उचित प्रतिक्रिया प्राप्त करने के लिए यह जरूरी है कि महिलाओं की शिकायतों को संजीदगी के साथ सुना जाए।

ई-मेलः singhnk7@gmail.com

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