Monday, September 21, 2020 09:55 PM

मां मैंने भी पतंग उड़ानी है

मेरी उम्र करीब 9-10 साल की थी। सर्दियों के दिन थे, शायद मकर संक्रांति के आसपास। इस मौसम में सारे बच्चे पतंग उड़ाया करते थे। उन्हें देखकर मुझे भी पतंग उड़ाने का शौक हुआ। कई दिनों तक आसमान में उड़ती पतंगों को ताकने के बाद मैं भी कमर कसकर मम्मी के पास पहुंच गया और उनके सामने पतंग खरीदने को कहा। मम्मी ने अपने चिर-परिचित मनाही के अंदाज में सिर हिला दिया, लेकिन मैं भी तैयारी से गया था, सो जिद्द पूरी होने से पहले तक हिम्मत नहीं हारी। आखिरकार  मां ने खुद ही पतंग खरीद कर मुझे गिफ्ट करके दी। मैं खुश होकर पतंग उड़ाने की तैयारी में लगा ही था कि मम्मी का फरमान आया ‘पतंग आंगन में ही उड़ानी है। अब मेरी सारी खुशी काफूर हो गई। कारण यह कि आंगन बहुत छोटा था और आंगन के तीन ओर दीवारें और एक ओर छत की सीढि़यां थीं। ऐसे में आंगन से पतंग उड़ाना संभव नहीं था। छत पर पतंग लेकर जाने से मना करने के पीछे मम्मी का मजबूत तर्क था कि छत की मुंडेर पर दीवार नहीं है, पतंग उड़ाते हुए नीचे गिर जाने का खतरा है। आंगन से पतंग न उड़नी थी, न उड़ी। पतंग न उड़ा पाने की खीझ का नतीजा यह हुआ कि मैंने पतंग फाड़ दी और धागे वाली चरखी मम्मी को दे मारी। अब मेरे पास अगले दो दिन तक मुंह फुलाकर छत के कोने पर बैठे हुए, एक बार फिर उड़ती हुई पतंगें देखने के सिवाय कोई चारा न था। तीसरे दिन शाम को पापा घर आए। आते ही पापा के सामने रोते हुए दो दिन पहले भावी पतंगबाज पर हुए अत्याचार की दास्तान कही गई। उन्होंने अगले दिन पतंग खरीदकर देने का वादा किया। दो दिन बाद चेहरे पर थोड़ी हंसी खिली। पापा आए और अपना किया हुआ वादा पूरा करते हुए पतंग और धागा खरीदने के लिए पांच रुपए दिए। मैं भागकर फिर दुकान पर पहुंचा। पर यह क्या दुकान पर आज सिर्फ  पतंगें ही बची थीं। धागा खत्म हो चुका था।  मैं उदास हो गया। मम्मी और पापा आपस में बात करने लगे। उनकी बातों से पता लगा कि पापा को अगले दिन ही वापस जाना है। मुझे झटका लगा कि यार फिर पतंग उड़ाने का सपना अधूरा ही रह जाएगा। छत पर पतंग उड़ाने की परमिशन तभी तक है जब तक पापा घर पर हैं। धागे के नाम पर मुझे पूजा सामग्री में इस्तेमाल होने वाले कच्चे सूत की दो गिट्टियां मिली।  थोड़ी खुराफात लगाकर ‘जुगाड़’  निकाला गया। उस कच्चे सूत की दोनों गिट्टियों के एक-एक धागे को मिलाकर धागे की दो परत बनाई गई और धागे को पहले से जरा मोटा किया गया। फिर पापा को बुलाकर सारी तैयारी दिखाई गई  पापा ने कन्नी दी। पतंग उड़ी। मैं खुशी से उछला पहली बार पतंग उड़ाई थी। पापा बीच में हिदायत दे रहे थे कि मैं छत में पीछे की ओर भी ध्यान देता रहूं ताकि गिर न पड़ूं। आज तो मुझे पतंग उड़ाता देख मम्मी भी मुस्करा रही थीं। तब वह आधे घंटे मेरे लिए खुद आसमान में सैर करने जैसा था। इतने में हवा का तेज झोंका आया। पतंग का धागा कमजोर था, सो पतंग टूटकर दूर उड़ चली। मैं फिर थोड़ा सा उदास हो गया। तभी पापा आए और पीठ ठोंककर बोले-शाबाश! इसके साथ ही मम्मी की तरफ  देखकर बोले, हमारा बेटा आज पतंग उड़ाना सीख गया है। तब मेरे दिमाग में भी यह बात आई कि अरे! हां मैं तो पतंग उड़ाना सीख गया हूं।  मैं फिर से खुश हो गया। पापा ने उस रोज पास बैठाया और तीन बातें सिखाईं। पहली जो मन करे, जिसे करने से खुशी हो और अगर वह काम सही हो तो वही करो। दूसरी कभी हार मत मानना, जैसे धागा न होने पर भी तुमने कच्चे सूत से ही पतंग उड़ा ली, वैसे ही आगे भी अपनी कमियों को दूर करते हुए लड़ते रहना। तीसरी हार जाने पर कभी रुकना मत, कोशिश करते रहना। भले ही आज तुम्हारी पतंग उखड़ गई है, पर तुम्हें पतंग उड़ाना नहीं छोड़ना है। तुम्हें कल और ऊंची पतंग उड़ानी है। उनके शब्द थोड़े आगे-पीछे रहे होंगे, लेकिन उनका मतलब यही था। कि जिंदगी में कभी हार मत मानना चाहे बात पतंग की हो, अपनी जिदंगी के करियर की।