मां सरस्वती मंदिर

कहते हैं भगवान अब भी धरती पर हैं और अपनी  लीलाओं से भक्तों के कष्ट निवारण करने के साथ उनके दुखों को भी दूर करते हैं। इसका सबसे बेहतर उदाहरण है मां सरस्वती का यह मंदिर। देवी सरस्वती को कौन नहीं जानता। देवी का जिक्र सबसे पहले ऋग्वेद में हुआ था। सरस्वती देवी को ज्ञान, संगीत, कला और बुद्धिमता का प्रतीक माना जाता है। हिंदू ही नहीं बल्कि सरस्वती देवी को जैन धर्म और बुद्ध धर्म के कुछ संप्रदाय भी मानते हैं। उत्तराखंड में बद्रीनाथ धाम से करीब 3 किमी. दूर माणा गांव है। यह भारत चीन सीमा का आखिरी गांव है। यहां सरस्वती नदी का उद्गम हुआ है। देवी सरस्वती का मंदिर भी यहीं पर है। कहते हैं कि सृष्टि के आरंभ में यहीं देवी सरस्वती प्रकट हुईं थीं। यहां सरस्वती नदी की धारा में जब सूर्य की रोशनी पड़ती है, तो इंद्र धनुष के सातों रंग दिखने लगते हैं। कहते हैं ये देवी सरस्वती की वीणा के तार और सातों सुर हैं। यहीं पास में व्यास गुफा भी है, जहां रह कर व्यास मुनि ने महाभारत महाकाव्य की रचना की थी। मान्यता है कि इस मंदिर में वीणा  वादिनी मां सरस्वती की प्रतिमा के दर्शन से साक्षात सरस्वती के दर्शनों का लाभ मिलता है। मां सरस्वती के हाथ में जो वीणा है, उसके सात सुरों से ही संसार में संगीत आया है और जीव जंतुओं को वाणी मिली है। पुराणों में इस स्थान के बारे में लिखा गया है कि इसी स्थान को प्रभु श्री विष्णु का दूसरा निवास या बैकुंठ भी कहा जाता है। यह स्थान चीन की सीमा के समीप है और खूबसूरत पहाडि़यों के बीचोंबीच बसा है। सर्दी के मौसम में तो इसकी सुंदरता और ज्यादा बढ़ जाती है।

उत्तराखंड के इस दिव्य स्थान से ही पांडवों ने स्वर्ग की यात्रा की थी। सरस्वती नदी के ठीक ऊपर एक बड़ी सी शिला है, जिसे भीम शिला भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है की स्वर्ग जाते वक्त भीम ने इस शिला को उठाकर यहां रखा था। माघ महीने की शुक्ल पक्ष की पंचमी यानी वसंत पंचमी के दिन यहां मां सरस्वती के भव्य  दर्शन होते हैं। कहते हैं कि वाणी की देवी मां सरस्वती इसी इसी दिन प्रकट हुई थीं। इसलिए इस तिथि को सरस्वती जन्मोत्सव भी कहा जाता है। पूरे भारत में सरस्वती पूजा का उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।