माओवादी आत्मा के वश में जकड़ी कांग्रेस

मनमोहन वैद्य

लेखक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह हैं

ऐसा भी नहीं है कि वह समाजहित में चलने वाले संघ के कार्यों तथा समाज से संघ को सतत् मिलते और लगातार बढ़ते समर्थन के बारे में नहीं जानते। फिर भी वह ऐसा क्यों कह रहे हैं, शायद उनके राजनीतिक सलाहकार उन्हें यह बताने में सफल रहे हैं कि संघ की बुराई करने से संघ के खिलाफ बोलने से उन्हें राजनीतिक फायदा हो सकता है। इसलिए नाटकीय आवेश के साथ आरोप करना उन्हें सिखाया गया है। आरोपों को साबित करने की जिम्मेदारी उनकी नहीं है। एक स्वयंसेवक ने उन्हें न्यायालय में चुनौती दी, तो आरोप साबित करने के स्थान पर वह न्यायालय में आने से ही कतरा रहे थे...

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ करने पर संघ से परिचित और राष्ट्रीय विचारधारा के लोगों का आश्चर्यचकित होना स्वाभाविक है। भारत के वामपंथी, माओवादी और क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ के लिए राष्ट्र विरोधी तत्त्वों के साथ खड़े तत्त्वों का इससे आनंदित होना भी अस्वाभाविक नहीं है। वैसे इसका अर्थ यह नहीं कि राहुल गांधी जिहादी मुस्लिम आतंकवाद की वैश्विक त्रासदी से अनजान हैं। ऐसा भी नहीं है कि वह समाजहित में चलने वाले संघ के कार्यों तथा समाज से संघ को सतत् मिलते और लगातार बढ़ते समर्थन के बारे में नहीं जानते। फिर भी वह ऐसा क्यों कह रहे हैं, शायद उनके राजनीतिक सलाहकार उन्हें यह बताने में सफल रहे हैं कि संघ की बुराई करने से संघ के खिलाफ बोलने से उन्हें राजनीतिक फायदा हो सकता है। इसलिए नाटकीय आवेश के साथ आरोप करना उन्हें सिखाया गया है। आरोपों को साबित करने की जिम्मेदारी उनकी नहीं है। किसी एक आरोप पर एक स्वयंसेवक ने उन्हें न्यायालय में चुनौती दी, तो आरोप साबित करने के स्थान पर वह न्यायालय में आने से ही कतरा रहे थे। वास्तव में संघ भारत की परंपरागत अध्यात्म आधारित सर्वांगीण और एकात्म जीवन दृष्टि के आधार पर संपूर्ण समाज को एकसूत्र में जोड़ने का कार्य कर रहा है। इस सर्वसमावेशक जीवन दृष्टि की तुलना जिहादी मुस्लिम ब्रदरहुड से करना समस्त भारतीयों और देश की महान संस्कृति का घोर अपमान है। वास्तव में जिहादी मुस्लिम मानसिकता और उनके कारनामों को देखा जाए, तो उसके साथ ब्रदरहुड शब्द ही बेमेल लगता है। इनका यह तथाकथित ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ सलाफी सुन्नी मुसलमानों के अलावा अन्य मुसलमानों को भी अपने ब्रदरहुड में  स्वीकार नहीं करता। इतना ही नहीं, उन्हें मुसलमान मानने से ही इनकार करता है। इस 11 सितंबर को स्वामी विवेकानंद के विश्व विख्यात शिकागो व्याख्यान को 125 वर्ष हुए हैं। उन्होंने भारत के सर्वसमावेशी एकात्म और सर्वांगीण जीवन दृष्टि के आधार पर विश्वबंधुत्व का विचार सबके सम्मुख रखा था। यह केवल बौद्धिक प्रतिपादन नहीं था। वह अपने हृदय के भाव बोल रहे थे। शिकागो में अपने ऐतिहासिक संबोधन में स्वामी विवेकानंद ने उद्बोधन की शुरुआत ही ‘मेरे अमरीकन भाइयो और बहनो’ से की थी, जिसे सुनकर संपूर्ण सभागार अचंभित और उत्तेजित हो उठा और कई मिनटों तक खड़े होकर सभी की तालियों की ध्वनि से सारा सभागृह गूंज उठा था। भाषण में उन्होंने कहा था ‘मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूं, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति दोनों की ही शिक्षा दी है। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते, बल्कि समस्त धर्मों को सच्चा मानकर स्वीकार करते हैं। मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीडि़तों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता है कि हमने अपने वक्ष में यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था, जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी। आगे वह कहते हैं ‘सांप्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मांधता इस सुंदर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज कर चुकी है। वह पृथ्वी को हिंसा से भरती रही है, उसको बारंबार मानवों के रक्त से नहलाती रही है, सभ्यताओं का विध्वंस करती और सभी देशों को निराशा के गर्त में डालती रही है। यदि यह वीभत्स दानवता न होती, तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता। डा. अंबेडकर ने ‘थाट्स ऑन पाकिस्तान’ में स्पष्ट कहा है कि इस्लाम एक बंद समुदाय है और वह जो मुसलमान और गैर मुसलमान के बीच भेद करते हैं, वह वास्तविक है। इस्लामिक ब्रदरहुड  समस्त मानवजाति का समावेश करने वाला विश्वबंधुत्व नहीं है। यह मुसलमानों का मुसलमानों के लिए ही बंधुत्व है।

वहां बंधुत्व है, पर उसका लाभ उनके समुदाय तक ही सीमित है। जो उसके बाहर हैं, उनके लिए तुच्छता और शत्रुता के सिवा और कुछ भी नहीं है। मुस्लिम ब्रदरहुड सर्वत्र शरिया का राज्य लाना चाहता है। संघ हिंदू राष्ट्र की बात करता है, जो सभी को स्वीकार करते हुए स्वामी विवेकानंद द्वारा प्रतिपादित विश्वबंधुत्व का प्रसार करता है। एक ज्येष्ठ स्तंभ लेखक ने 2 वर्ष पूर्व कांग्रेस का वर्णन ऐसा किया कि ‘यह कांग्रेस पार्टी किसी भी हद तक जाकर सत्ता में आने का प्रयास करती है और पार्टी की बौद्धिक गतिविधि उन्होंने कम्युनिस्टों को सौंप दी है। कांग्रेस की बौद्धिक गतिविधि जब से कामरेडों ने संभाल ली है, तब से पार्टी ऐसी असहिष्णुता का परिचय देते हुए राष्ट्रीय विचारों का घोर विरोध करने लगी है। 1962 के चीन के आक्रमण के समय संघ के स्वयंसेवकों ने जान की बाजी लगाकर सेना की जो सहायता की उससे प्रभावित होकर पंडित नेहरू ने 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने के लिए संघ स्वयंसेवकों को निमंत्रित किया था और तत्काल सूचना मिलने पर भी 3000 स्वयंसेवक उस परेड में शामिल हुए थे। 1965 में पाकिस्तान के आक्रमण के समय देश के प्रमुख नेताओं की आपात बैठक प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री जी ने बुलाई। इसमें सरसंघचालक गुरुजी को बुलाया गया था और उनकी तुरंत दिल्ली पहुंचने की व्यवस्था भी सरकार ने की थी। इस बैठक में एक कम्युनिस्ट नेता द्वारा शास्त्री जी से बार-बार, आपकी सेना क्या कर रही थी, पूछने पर गुरुजी ने कहा ‘आपकी सेना, आपकी सेना क्या कहे जा रहे हो, हमारी सेना कहो, आप क्या किसी दूसरे देश के हो’? राजनीति को राजनीति की जगह पर रखते हुए आपसी संवाद की ऐसी परंपरा 1970 के दशक तक चलती रही। फिर क्रमशः वामपंथी विचारों का प्रभाव कांग्रेस में बढ़ने लगा। शत्रुतापूर्ण भाषा और असहिष्णुता झलकने लगी। भाजपा को छोड़कर अधिकतर राजनीतिक दलों के बौद्धिक, वैचारिक प्रकोष्ठ में इन वामपंथियों का प्रभाव या वर्चस्व कम, अधिक मात्रा में है ऐसा दिखता है। इसलिए अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए राष्ट्रीय विचारों का हरसंभव विरोध और वामपंथी विचारों से प्रेरित समाज विखंडन के प्रयासों को इनके द्वारा समर्थन होता दिखता है। गत कुछ वर्षों से अपने देश के प्रमुख विपक्ष कांग्रेस की स्थिति ऐसी विचित्र हो गई है कि लगता है जो बौद्धिक गतिविधि कम्युनिस्टों को आउटसोर्स कर दी थी, उसके स्थान पर कांग्रेस के शरीर में माओवादी आत्मा का  ही प्रवेश हो चुका है।

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि कांग्रेस अध्यक्ष के इस अपमानजनक वक्तव्य के समर्थन में जितने लेखकों के लेख प्रकाशित हुए हैं, उनके तार भी माओवादी या वामपंथी विचारों से जुड़े दिखते हैं। क्या यह कम आश्चर्य की बात है कि माओवाद प्रेरित जितने भी आंदोलन हुए, उन्हें कांग्रेस ने भरसक खुला समर्थन दिया है। ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह, इंशा अल्लाह’ जैसे नारे या भारतीय संसद पर आतंकी हमला करने वाले अफजल गुरु (जिसकी सजा यूपीए शासन के दौरान ही घोषित हुई थी) के समर्थन में अफजल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं, जैसे नारे लगाने वालों का खुला समर्थन कांग्रेस के नेताओं ने किया है! समाज में जातीय विद्वेष भड़काकर संविधान की धज्जियां उड़ाते हुए की गई हिंसा का समर्थन, बिना किसी के भड़काए सार्वजनिक और निजी संपत्ति ध्वस्त करने वालों का समर्थन जब कांग्रेस पार्टी करती है, तब इस पार्टी के शरीर का कब्जा कर बैठी माओवादी आत्मा का स्पष्ट परिचय होता है। अर्बन माओवादी किस-किस रूप में समाज में व्याप्त हुए हैं और कैसे प्रतिष्ठित हो गए हैं, यह अभी की कुछ घटनाओं से जनता के सामने आ गया है। ऐसी देश विघातक ताकतों को कांग्रेस का समर्थन देखकर आश्चर्य कम और दुःख अधिक होता है।

 

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