Monday, August 10, 2020 10:44 AM

मासूमियत पर कालिख

शिक्षक समाज में फिर छेद करती एक घटना दुखद व लज्जाजनक है। हरोली के शिक्षक के खिलाफ शिकायतों का पिटारा फूटा, तो अपराध के मोहल्ले में बच्चों का भविष्य अटक गया। शिक्षक ने न केवल अपने रिश्ते को नापाक सिद्ध करते हुए अध्यापन को गाली दी, बल्कि बच्चों की मासूमियत पर कालिख पोतने की हरकत की है। स्कूली शिक्षा के प्रांगण में जीवन का बोध जिस शिक्षक के आचरण से आता हो, वहां उसकी आपत्तिजनक हरकतों ने सिर शर्म से झुका दिया है। बहरहाल अध्यापक पर विभागीय व कानूनी कार्रवाई का शिकंजा कसा गया है, लेकिन यहां तक पहुंची परिस्थितियों ने कई प्रश्न पूछे हैं। अध्यापकों की नई पौध में ऐसे चरित्र का प्रवेश, सामाजिक ढांचे में घटते नैतिक मूल्यों की चुनौती है। शिक्षा के प्रसार ने नौकरी बांटते-बांटते इस कद्र अवमूल्यन कर दिया कि एक अध्यापक की तुलना सामान्य अपराधी से हो रही है। आमतौर पर स्कूलों की चर्चा में शिक्षा में गुणात्मक सुधार, छात्रों के व्यक्तित्व विस्तार, परीक्षाओं में परिवर्तन तथा आगे बढ़ने की प्रतिस्पर्धा में निखार लाने की गुंजाइश रहती है। शिक्षा और पाठ्यक्रम के बीच शिक्षक समुदाय से जीवन के अभिप्राय तथा छात्र जीवन के व्यक्तित्व विकास में खासा असर देखने को मिलता है। विडंबना यह है कि पिछले कुछ सालों में शिक्षा के प्रसार तथा अनावश्यक विस्तार ने ही शिक्षक बनने की प्रक्रिया को महज नौकरी बना दिया। बिना किसी आंतरिक संवेदना, काबिलीयत और साधना के शिक्षक अब शिक्षा का खिताब बनकर अगर स्कूल-कालेज में सजेगा, तो पाठ्यक्रम से इतर कुछ नहीं बचेगा। शिक्षा अब अध्यापक के आपाधापी भरे जीवन के बीच का रिश्ता बटोर रही है, तो आंकड़ों में दर्ज दर्जी की तरह वह अपनी सलवटों को ही सिल रहा है। कभी नौकरी के हुजूम में सियासत से पाने या खुशामद में अवसर बटोरना या कभी बच्चों के प्रति फर्ज को नकल की दरियादिली में परोसना ही अगर नियति है, तो कोई जवाबदेही दिखाई नहीं देती। बेशक हर घटना का संज्ञान कड़ा होगा या समाज केवल ऐसी दुखद व शर्मनाक परिस्थितियों के विपरीत खड़ा होगा, अन्यथा शिक्षण संस्थान तो अब मिड-डे मील से लेकर स्मार्ट वर्दी तक या मुफ्त में आबंटित किताबों की शक्ल में भंडारण की एक प्रक्रिया है। आश्चर्य होता है कि स्कूलों में बच्चियों से छेड़छाड़ के प्रकरण में वही आचरण दोषी है, जिसने छात्रों का चरित्र निर्माण करना है। ऊना की घटना में सख्त हुए शिक्षा मंत्री भले ही छेड़छाड़ के आरोपी अध्यापकों को सीधे बर्खास्त करने का दावा कर दें या यह आश्वासन दें कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं होगी, लेकिन विभागीय तौर पर ऐसे विषयों पर न तो आत्ममंथन और न ही नई कसौटियां तय हो रही हैं। सत्ता में आते ही वर्तमान सरकार के शिक्षा मंत्री ने स्थानांतरण नीति के तहत कुछ करने की इच्छाशक्ति दिखाई थी, लेकिन फिर पांव थक गए या शिक्षक समाज के कद के आगे सियासत कमजोर पड़ गई। कहना न होगा कि हिमाचल में स्थानांतरण सिफारिशों का सबसे अधिक बोझ शिक्षा विभाग पर ही है, लिहाजा स्कूल का वातावरण दोयम है, जबकि प्रथम दृष्टि से शिक्षकों को मनचाहे स्थानों पर टिके या टिकाए रखने की जोर आजमाइश जारी है। ऐसे में छात्रों का भविष्य प्रायः ऐसे हाथों में आ जाता है, जो शिक्षा से हटकर अपने जीवन की व्यस्तताओं में क्रूरता करते हैं। मसला छेड़छाड़ से हटकर भी घिनौना हो जाता है, क्योंकि स्कूली छत से बाहर निकल कर भी बच्चों को न अपनी प्रतिभा दिखाने और न ही क्षमता विकास का कोई रास्ता मिलता है। ऐसी कोई नीति नहीं कि सरकारी स्कूलों के अध्यापकों को अपने बच्चों को अनिवार्य रूप से अपने ही संस्थानों में पढ़ाने को प्रेरित किया जा सके। अपनी तमाम कमजोरियों की वजह से स्कूली शिक्षा बर्र के छत्ते की तरह है, लेकिन इस ढांचे से छेड़छाड़ करने के बजाय दूर रहकर प्रयास हो रहे हैं। विडंबना यह है कि स्कूली थाली में बंटता राशन भी बार-बार जातिगत भेद कर जाता है और तब मंडी की प्राथमिक पाठशाला में लोकतांत्रिक अधिकारों पर लगता ग्रहण देखा जा सकता है। जातीय आधार पर बंटती मिड-डे मील पर कार्रवाई हुई और मुख्याध्यापिका सस्पेंड हो गई, लेकिन यह कौन सी रूढि़वादिता है जिसे शिक्षक प्रशिक्षण या नौकरी प्रदान करने की प्रक्रिया भी नहीं मिटा रही। शिक्षा में प्रयोग करती हमारी पद्धति अगर मानसिक कंगाली के ऐसे उदाहरणों से अभिशप्त है, तो उपचार केवल इक्का दुक्का शिक्षकों के खिलाफ सीधी कार्रवाई से नहीं, बल्कि विभागीय गांठों को खोलकर अध्यापन की डगर को संवारने की जरूरत है।