Monday, October 21, 2019 10:54 AM

 मिथकों परहोता मंथन

भारत भूषण ‘शून्य’

स्वतंत्र लेखक

किंवदंतियों के सहारे गढ़े गए ज्ञान को विज्ञान का मान नहीं माना जा सकता। मिथिहास की सीढि़यां चढ़कर मंदिर में विराजे देवताओं के दर्शन असंभव हैं। अपने आप पर मोहित भव्यता से उपजा सौंदर्य किसी मानदंड को स्थापित नहीं कर सकता। खुदगर्जी से लड़े बगैर किया वैचारिक युद्ध किसी मान्यता को सार्थकता देने में विफल रहा है। चोर होने की सभी आशंकाओं को तिरोहित किए बिना सज्जन होने की जिद ने किसी समाज का भला नहीं किया। उपदेशक होने के सभी राग तब तक बेमतलब हैं जब तक आसक्ति के राग को विराम न दे दिया गया हो।

मेरे होने का अहसास मेरे अस्तित्व की गूंज को जान लेना है। दूसरों की कथाओं से उपजा ज्ञान तब तक मेरा नहीं होने वाला जब तक मैं खुद के खालीपन को पकड़ नहीं लेता। चकाचौंध करते बादलों से बारिश की आस अकसर व्यर्थ जाती है। जो अपने को जानने का श्रम नहीं कर पा रहे, वे देश को जानने की डींगें हांक सकते हैं। अपने महत्त्व की धार को कसते रहने से अहमन्यता का फरसा तैयार हो जाता है। विगत के गीत गाते रहने से हम आज के राग को भुला देते हैं। विगत की त्रुटियों से मिलाप करने के बाद गई यात्रा का सार्थक गंतव्य मिलने के आसार बना करते हैं। आपकी आंख से रचे गए स्वप्निल नक्शे का आधार नहीं बनेगा यदि तक आपके पांव ठोस धरातल को छू नहीं रहे होंगे। हमारी विचार प्रक्रिया इन्हीं मिथकों से ऊपर उठने में सदियां बिताती आ रही है। यह काल इन मिथकों को फिर से जीने और जीवंत बनाने के लिए जाना जाएगा और वह भी तब जब हम डिजीटल होने का खुला स्वांग भी धर रहे हैं। अब हमारे नेता नए मिथकों को बनाने में ही अपनी ऊर्जा लगाने में जुटे हैं, यह विडंबना भी इस वैज्ञानिक युग की विशेष उपलब्धि कहलाएगी।