Monday, April 06, 2020 06:17 PM

मिशन रिपीट

यह अरमान हिमाचल की किसी सरकार के अलावा राजनीतिक इतिहास की जरूरत भी है कि ‘मिशन रिपीट’ की संज्ञा में प्रदेश का जनादेश सशक्त हो। भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की पांवटा साहिब की बैठक में सबसे बड़ा ऐलान यही है कि जयराम सरकार निरंतरता के साथ आगामी चुनाव की हैसियत में बहुमत हासिल करे। सरकारों का रिपीट होना वास्तव में एक मॉडल के रूप में कई प्रदेशों में अलंकृत हो चुका है, लेकिन हिमाचल में राजनीतिक सोच के सामने सामाजिक जागरूकता की पहरेदारी हमेशा ताकतवर रही है। अहम बिंदुओं के कारण मतदाता ने हमेशा सरकारों को पटकनी देकर अपने स्वार्थ हल किए। यहां सुशासन के बजाय मतदाता के स्वार्थों की निरंतरता जारी रही। इससे सरकारों के दायित्व में निरंतरता, कर्मठता व साहसिक होने का अभाव पनपा। कमोबेश हर पांच साल बाद सरकार बदलते ही जन अपेक्षाओं की कर्जदारी में केवल नए भ्रम पैदा हुए। इससे प्रदेश में कई दबाव समूह जुड़ते गए और सबसे अधिक दोहन के लिए कर्मचारी वर्ग ने हाथ साफ किए। यहां धूमल सरकार का उल्लेख करना होगा, जब उसके दूसरे कार्यकाल में कर्मचारी सौहार्द के बिछौने बिछाए गए, लेकिन ‘मिशन रिपीट’ के करीब कारवां हार गया। कर्मचारी वर्ग की गिनती में हिमाचल की हर सरकार ने अपना साहस व सामर्थ्य खोया है। मौजूदा सरकार ने आते ही स्थानांतरण नीति के उद्घोष ऊंचे किए, लेकिन अब अध्यापकों की बदलियां भी एक मुद्दा बनकर मुकर रही हैं। हिमाचली सरकारों की ‘मिशन रिपीट’ की सोच भी इस अभियान के खिलाफ रही है। जब हिमाचल की किसी भी सरकार को केवल अगले चुनाव के लिए ही काम करना होगा, तो बड़े व कड़े फैसलों के बजाय अधिकतर निर्णय नर्म या सौहार्दपूर्ण भाव से ही लेने होंगे। इस प्रवृत्ति के कारण कमोबेश हर हिमाचली सरकार का सामाजिक दोहन हो रहा है। इस वजह से न तो नीतियां बन रही हैं और न ही नेता खुद को बुलंद कर पा रहे हैं। अजीब स्थिति के पैमाने असंतुलित होकर संकीर्णता को पनपने का मौका देते हैं। सरकारें अपने आकार से व्यवहार तक केवल राजनीतिक समायोजन ही बन जाती हैं। विडंबना यह कि सरकारों के मंत्री भी केवल अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों तक ही सोच पाते हैं, तो फिर विभागीय तौर तरीके पूरे प्रदेश की संवेदना नहीं पढ़ पाते। कर्मचारियों की आवश्यक नियुक्तियों, नए कार्यालयों को खोलने तथा सत्ता के मार्फत योजनाओं-परियोजनाओं की प्राथमिकताओं में यही संकीर्णता दिखाई देती है। विकास की निरंतरता या पूर्ववर्ती सरकारों की परियोजनाओं को बाधित करने से कोई भी सरकार ‘मिशन रिपीट’ नहीं कर सकती, लेकिन सियासी बहस के यही विषय बनकर सत्ता के अक्स को दर्शाते रहे हैं। हिमाचल में तीसरे विकल्प की खोखली तलाश ने भी सरकारों की पाजेब को अदला-बदली का जरिया बना दिया। जनता के सामने राजनीतिक अंक गणित सीमित है और इसीलिए मुद्दों की फेहरिस्त भी हर बार आक्रोश चुन लेती है। इस लिहाज से हिमाचल का बौद्धिक कौशल, चर्चाओं के पटल पर नए रिश्ते खोजने में मशरूफ रहता है, जबकि सरकारों के कामकाज की चर्चा सही परिप्रेक्ष्य में होती ही नहीं। इसमें मीडिया की भी अहम भूमिका है। पिछले दो-अढ़ाई दशकों में हिमाचली मीडिया का प्रसार जिस तरह हुआ है या अब सोशल व डिजिटल मीडिया ने पंख पसारे हैं, उसका भी सीधा असर सामने आ रहा है। बहरहाल भाजपा ने अपनी सत्ता के दामन में ‘मिशन रिपीट’ के हिलोरे भरते हुए संगठन में आत्मविश्वास भरा है। केंद्र में भाजपा सरकार अगर वास्तव में ‘डबल इंजन’ बनकर राज्य की मुरादें पूरी कर दे, तो आगामी चुनाव से पहले वर्तमान सरकार की इबारत सुदृढ़ होगी। हिमाचल की वर्तमान सरकार ने इन्वेस्टर मीट का मुकुट पहनकर जो रास्ता अख्तियार किया है, उसकी सफलता भी यह तय करेगी कि अगली पायदान में किसका सिक्का चलेगा। हिमाचल के युवा या नए वोटरों के सामने सपनों को हकीकत में बदलने का अवसर, अगर वर्तमान सरकार की उपलब्धि साबित होता है तो निश्चिय ही भाजपा के सपनों को संबल मिलेगा। सत्ता और संगठन के बीच समन्वय और संतुलन की चुनौतियां नए सिरे से हिमाचल को देख रही हैं। सत्ता के बड़े हस्ताक्षरों में अब तक कई नाम रहे हैं, लिहाजा भाजपा को फिर से सरकार बनाने में नेताओं  का करिश्मा भी चाहिए। नेताओं के बीच जयराम ठाकुर सरकार को करिश्मा बनाने और पेश करने का संकल्प, पांवटा साहिब बैठक के इरादों को भले ही ऊंचा कर गया, लेकिन अगले अढ़ाई साल का सफर इसी तरह रेखांकित भी करना होगा।