Friday, September 24, 2021 06:32 AM

मीठे और रसीले आम

किसी वन में नदी किनारे मीठे और रसीले आमों का वृक्ष था। उस पेड़ के आम इतने मीठे और रसीले थे कि हर कोई उन आमों  का लुफ्त उठाता था। पर ज्यादातर आमों का लुत्फ  उस वृक्ष पर रहने वाले बंदर उठाते थे। बंदरों के समूह का चतुर मुखिया गर्मी की शुरुआत में नदी के ऊपर फैली टहनियों पर लगे बौर नष्ट करवा देता। वह कहता, यदि इन टहनियों पर आम लगकर नदी में गिरें तो मानवों तक पहुंच जाएंगे, फिर वे इस वृक्ष के सारे फल ले जाएंगे। और हम सारे भूखे मर जाएंगे, पर एक साल कुछ बौर रह गए। उनमें आम लगे और वे पानी में गिरे। वे जिन मछुआरों को मिले उनके मुखिया ने कुछ आम राजा को भेंट किए। राजा ने भी इतने रसीले आम पहले कभी नहीं खाए थे। राजा ने सैनिकों  को बोला कि पता करो कि इतना रसीला आम किस  पेड़ कहा है। सैनिकों ने पता किया और राजा को बताया वह राजा अगले दिन सैनिकों सहित आम तोड़ने जा पहुंचा। तब बंदरों के मुखिया ने बंदरों को वह स्थान छोड़कर नदी के पार सुरक्षित स्थान पर चलने का आदेश दिया। उसने एक लंबी व मजबूत लता पेड़ की टहनी से बांधी और दूसरा सिरा उस पार के पेड़ पर बांधने के लिए छलांग लगाई। पेड़ की डाली तो हाथ में आ गई किंतु लता छोटी पड़ गई। तब लता को तानते हुए उसने शेष हिस्से पर अपना शरीर रस्सी की भांति तान लिया। फिर सारे बंदर लता और उसके शरीर पर से होकर पार उतरे। वह लहूलुहान हो गया। अंत में एक दुष्ट बंदर ने जो स्वयं मुखिया बनना चाहता था, उसे जोर से धक्का मारा। वानरराज का हाथ डाली से छूटा और पत्थर पर गिरने से उसकी मृत्यु हो गई। राजा यह सब देख रहा था। बंदरों के मुखिया का ऐसा आत्म बलिदान देख उसने सैनिकों को वहां से लौटने का आदेश दिया और कभी भी किसी प्राणी को न सताने की शपथ ली। अच्छाई अंततः अपना प्रभाव दूसरों पर छोड़ने में कामयाब होती है। यदि जीवन में एक बुरा व्यक्ति भी हमारी अच्छाई को देखकर सुधर जाए तो जीवन सफल मानना चाहिए।

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