Sunday, July 05, 2020 05:49 AM

मीडिया पर कोरोना का कहर

डा. चंद्र त्रिखा

वरिष्ठ साहित्यकार-पत्रकार

भारतीय लोकतंत्र का चौथा स्तंभ संकट में है। कोरोना का कहर सिर्फ  प्रवासी श्रमिक-त्रासदी तक सीमित नहीं है, इससे चरमराने वाले क्षेत्रों में औद्योगिक व व्यावसायिक क्षेत्रों के अलावा मीडिया का क्षेत्र भी शामिल है। यह चौथा स्तंभ इस समय गंभीर चुनौतियों का शिकार है। प्रिंट मीडिया यानी अखबारी दुनिया क्षेत्र में सबसे बड़ा संकट प्रसार व वितरण को लेकर आया और दूसरा बड़ा संकट विज्ञापन-राजस्व में एकाएक आई गिरावट से जुड़ा है। निजी क्षेत्र में बड़े-बड़े औद्योगिक संस्थानों ने अपने-अपने विज्ञापन-बजटों में भारी कटौती कर दी, दूसरी ओर सरकारी विज्ञापनों का बजट भी गड़बड़ा चुका है। इस संकट का बुरा असर छोटे समाचार-पत्रों पर तो स्वाभाविक था ही, बड़े-बड़े समाचार समूहों पर भी पड़ा और उन्होंने दो फैसले तात्कालिक प्रभाव से लागू किए। पहला फैसला मीडिया कर्मियों के वेतनों में कुछ कटौतियों का था, दूसरा फैसला तत्काल प्रभाव से समाचार पत्रों की पृष्ठ संख्या में कमी का था। ‘आउटलुक’ सरीखी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं को तो कुछ समय के लिए अपना मुद्रण-प्रकाशन स्थगित भी करना पड़ा। एशिएन एज, डक्कन क्रॉमिकल और डीएनए सरीखे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों को विवश होकर अपने कुछ संस्करण भी अनिश्चित समय के लिए बंद करने पड़े। केंद्रीय वित्त मंत्री ने जहां विभिन्न उद्योगों के लिए कुछ राहतें घोषित कीं, वहां मीडिया-उद्योग को छुआ तक नहीं। कुछ दबावों व अपीलों के बाद न्यूज प्रिंट पर पांच प्रतिशत कस्टम ड्यूटी की रियायत दी गई। मगर वह रियायत भी विज्ञापन-बजट में कटौतियों के दृष्टिगत हवा हो गई। लॉकडाउन के मध्य प्रिंट मीडिया के खिलाफ  एक सुनियोजित साजिश के तहत एक अफवाह  प्रचारित की गई कि अखबारों के न्यूज प्रिंट से कोरोना फैल सकता है। प्रिंट मीडिया के लोगों को इन अफवाहों के निराकरण के लिए भी विशेष अभियान चलाने पड़े। भारतीय समाचार-पत्रों के रजिस्ट्रार की अंतिम रिपोर्ट के अनुसार 31 मार्च 2018 को भारतीय पत्र-पत्रिकाओं की कुल संख्या एक लाख 18239 थी। इनमें 17573 समाचार पत्र और लगभग एक लाख 666 पत्र-पत्रिकाएं शामिल थीं। ‘दि पिच मेडीसन एडवर्टाइजिंग रिपोर्ट 2020’ के अनुसार कुल मीडिया में 20446 करोड़ का विज्ञापन-रेवेन्यू अपेक्षित था। मगर सारे अनुमान हिल गए। भारत में इस समय 900 के लगभग टीवी चैनल हैं। इनमें से लगभग 55 प्रतिशत समाचार-चैनल हैं। शेष 45 प्रतिशत मनोरंजन चैनल पुराने कार्यक्रम दोहराने पर मजबूर हैं। नए कार्यक्रमों की शूटिंग नामुमकिन हो चुकी है। एक प्रमुख चैनल के एक केंद्र को ‘कोरोना संक्रमित’ होने के संदेह में ‘लॉकडाउन’ का शिकार होना पड़ा है। उसके लगभग सभी कर्मी अब क्वारंटाइन में हैं। यही स्थिति ऑनलाइन डिजिटल मीडिया की भी है। बहुत सारी वेब साइट्स बंद हो चुकी हैं। टीआरपी बनाए रखने के लिए कुछेक चैनलों को अपने पुराने कार्यक्रमों पर लौटना पड़ रहा है। प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर संकट का एक कारण विज्ञापन-बिलों की अदायगी का रुक जाना भी है। सिर्फ  केंद्र सरकार की ओर से ही 435 करोड़ रुपए की अदायगी रुकी हुई है। यही स्थिति शेष राज्य सरकारों की है। मीडिया की दुनिया में केंद्र या राज्यों की सरकारों के अनुदानों की घोषणा मुमकिन नहीं है। मगर कोरोना संकट से मुक्ति के इस दौर में तीन बातों पर सरकार सकारात्मक रुख अपना सकती है। पहली, रुकी हुई विज्ञापन राशियों की तत्काल अदायगी हो। दूसरी, नए विज्ञापन-बजट में पांच से दस प्रतिशत की वृद्धि हो। तीसरी, न्यूज प्रिंट पर कस्टम ड्यूटी और घटाई जाए। इन दिनों हमारे देश में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की सबसे बड़ी देन व उपलब्धि यह है कि मीडिया ने रिपोर्टिंग में पूरी तरह  संयम बनाए रखा। जिस मीडिया को अक्सर प्रतिपक्ष के कुछ नेता ‘गोदी-मीडिया’ कहने लगे थे, उस मीडिया ने भी निष्पक्षता, तटस्थता और प्रामाणिकता बनाए रखने के ही प्रयास किए। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों के संवाददाताओं, फोटोग्राफरों ने पूरा-पूरा जोखिम उठाकर फील्ड में रिपोर्टिंग की। सरकार-विरोधी मीडिया ने भी इस अवसर पर अपने पाठक, श्रोता एवं दर्शक को यथासंभव प्रामाणिक सामग्री परोसने की ही कोशिश की। पूरे विश्व की पत्रकारिता में यह एक अनूठा उदाहरण रहा। प्रिंट मीडिया की आर्थिकता दरअसल विचित्र रही है। किसी भी उद्योग में ऐसा नहीं होता कि उसका बिक्री मूल्य उसकी उत्पादन लागत का एक-चौथाई भी न हो। कोई एक सचित्र, बहुरंगी, 12-16 पृष्ठ का दैनिक समाचार पत्र बाजार में ग्राहक अथवा पाठक के पास भले ही तीन रुपए में पहुंचता हो, मगर उसका उत्पादन मूल्य आठ से 10 रुपए तक होता है। अखबारों के संचालक कोशिश करते हैं कि यह अंतर विज्ञापनों से पूरा हो। विज्ञापन या तो सरकारें देती हैं या निजी उद्योग। सरकारों में विज्ञापनों पर नियंत्रण रखने वाले संस्थानों से विज्ञापनों की प्राप्ति और बिलों की वसूली भी सीधे रूप में नहीं होती। बिचौलिए भी होते हैं और नखरे वाले बाबू भी। केंद्र व राज्य सरकारों से मोटे तौर पर अखबारों को लगभग 20-22 हजार करोड़ रुपए की राशि अभी भी वसूलनी है। इनकी तात्कालिक अदायगी की शुरुआत यदि न हुई तो अनेक अखबार पूरी तरह बंद होने के कगार पर पहुंच जाएंगे। इस संबंध में यदि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और राज्यों के लोकसंपर्क विभाग यदि कोई ठोस उपाय नहीं करते तो लोकतंत्र के इस महत्त्वपूर्ण चौथे स्तंभ पर गंभीर संकट छा सकता है। निर्भीक, निष्पक्ष और प्रामाणिक मीडिया लोकतंत्र की मजबूती की अनिवार्य शर्त है। इस बात की गंभीरता को सरकारी तंत्र को भी समझ लेना चाहिए और प्राइवेट सेक्टर को भी। मीडिया पर इतना संकट तो आपातकाल में भी नहीं आया था। वैसे भी हर स्तर पर जिंदगी अब मीडिया के बिना चल नहीं पा रही। जब यह दिमागी खुराक का अभिन्न अंग है और सही सूचना का एकमात्र स्रोत है तो उसे बचाने के लिए भी तत्काल फैसले लिए जाने चाहिए। कोरोना-काल में नागरिकों के प्रति जो जिम्मेदार भूमिका भारतीय मीडिया ने निभाई है, उसके मद्देनजर कलम, कैमरा और ‘माउस’ के इन योद्धाओं के लिए भी सलामी तो बनती है।