Tuesday, May 21, 2019 05:57 AM

मुंडेर पर खड़ी भीड़

भारत भूषण ‘शून्य’

स्वतंत्र लेखक

विभाजित होने की सभी खूबियां हम सदियों से पालते पोसते रहे हैं। इस कमी को नजरअंदाज करना ही हमारे लिए कथित विरासत बनता आया है। हमारी नजर में मंदिरों के स्वर्ण कलश की कल्पना सदा बलवती रही, लेकिन गांव की उर्वरा भूमि हमेशा जातियों और उपजातियों में बंटी रही। राम हमारे आदर्श पुरुष, इस पर कोई संदेह नहीं, लेकिन घर में राम की उम्मीद दूसरों के होने से फैलती फूलती रही। बांट देने की हर कल्पना में पारंगत इस कौम ने धर्म की जो धज्जियां उड़ाईं, वे आज हमारी छाती पर सत्ता का अट्टहास कर रहीं। मानवीय होने के सभी आदर्श गांव के कुएं की मुंडेर तक आते-आते ध्वस्त होते गए। पानी को बांट देने की लकीरें हमने लगाईं। अध्यात्म को किसी कौम का अभिजात्य वेश पहनकर हम सांस्कृतिक नृत्य करने में सिद्धहस्त हुए। विविधता का यह देश अपने जीने के अंदाज को लेकर कौतूहल जगाता आया, लेकिन हमने इसे कोलाहल बना आनंदित होते रहे। जिंदगी के हर रूप में अस्तित्वगत सौंदर्य को अध्यात्मवाद कहने वाले आज अपनी इस गुणात्मक पराकाष्ठा को राजनीतिक सत्ता की विशेषता बताने लगे हैं। नीतियों की महीन गणना करने की योग्यता अब मतपत्रों पर लगे ठप्पों पर मेहरबान हो रही है। यह हमारी सनातनी नियति है। ब्रह्मांड को जानने और समझने का दम मानवता को सम्मान दिए बिना खोखला रहेगा। कुरीतियों को जमींदोज किए बिना कोई धर्म अपनी महत्ता और सदाशयता को कभी नहीं पा सका और कोई देश अपनी कमजोरियों को जाने और दूर किए बिना कोई महत्त्वपूर्ण मुकाम नहीं पा सका। आइए, इस सच्चाई को पकड़ें। वरना सत्ता का अजगर हमारी हर कथित महत्ता और विरासत को भी लील जाने की तैयारी में है।