Monday, April 06, 2020 06:38 PM

मूल्यपरक शिक्षा में बाल साहित्य का योगदान

डा. अदिति गुलेरी

मो.-9816305643

जिस प्रकार साहित्य मानवीय अनुभूतियों और संवेदनाओं को प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है, उसी प्रकार बच्चों के अंतर्मन से तादात्म्य स्थापित कर उनके भाव जगत को प्रभावित, विकसित और प्रकाशित करने का कार्य बाल साहित्य करता है। कभी वह बालकृष्ण का सखा बनकर उसके साथ क्रीड़ा करता है, कभी उसकी उंगली थामे उसे कौतूहल और विचित्रताओं की भूलभुलैयों में भ्रमण करा देता है। कभी मार्गदर्शक बनकर उसे विवेक और ज्ञान की ऊंची-नीची सीढि़यों पर चढ़ना सिखाता है तो कभी उसके बाल कलाकार को जगाता, प्रेरित करता और अभिव्यक्ति के लिए आतुर कर देता है। बाल साहित्य सृजन में निरंतर प्रयासरत बाल पत्रिकाएं समकालीन हिंदी बाल साहित्य के अमोघ अस्त्र हैं जिनमें कविता, कहानी तथा अन्य बाल मनोरंजक स्तंभों के साथ-साथ समीक्षा आदि के माध्यम से सशक्त बाल साहित्य का प्रकाशन किया जा रहा है। प्राचीन बाल साहित्य भारतीय पृष्ठभूमि में पूरी तरह से मूल्यपरक था। कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन, राम-लक्ष्मण के बचपन के प्रसंग तथा कौरव-पांडवों के बाल जीवन की घटनाएं भारतीय बच्चों को मनोरंजन भी देती थी और साथ ही साथ सांस्कृतिक मूल्यों तथा मानवीय संवेदनाओं को स्थापित करने की प्रक्रिया को आसान भी बनाती थी। इस सिलसिले में पंचतंत्र के रचनाकार ने पंचतंत्र की कहानियों में उल्लेखनीय कार्य किया था। पशुओं और आम लोगों के माध्यम से विविध घटनाएं और प्रसंग इस प्रकार सृजित किए गए कि उनकी हर कथा में मानवीय मूल्य स्वयं ही आते चले गए। इन कहानियों में मैत्री, एकता, पारिवारिक प्रेम, देशभक्ति, करुणा, त्याग, सहनशीलता आदि मूल्यों को विभिन्न कथाओं में पिरोया गया है। इसी प्रकार ‘शठे शाठ्यम’ अर्थात जैसे के लिए तैसा की नीति को भी महत्त्व दिया गया है। इस प्राचीन परिप्रेक्ष्य में यदि हम बाल साहित्य को परखें तो कई ऐसे प्रश्न उठ खड़े होते हैं, जिनके सटीक उत्तर हमें आज मिल नहीं पाते। उदाहरणार्थ, सच बोलना एक मूल्य है। इसमें किसी को कोई संदेह नहीं है, किंतु व्यावहारिक रूप में कोई भी सफल, प्रभावशाली व विकसित व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति के साथ-साथ आम जनमानस दैनिक जीवन में हमेशा सच नहीं बोलता। उस समय हमें हमारे मूल्य झूठे से लगने लगते हैं। समाज को बदलने के लिए साहित्य की भूमिका सदैव महत्त्वपूर्ण रही है। बच्चों के लिए किताबें महज पाठ्यक्रम तक ही सीमित रह गई हैं। विभिन्न पुस्तकालयों में भी विद्यार्थियों की संख्या व कर्मण्यता नगण्य ही रहती है। यदि पहले की बात करें तो बालक दादा-दादी, नाना-नानी से कहानियां सुनते थे। उन कहानियों से वे परोक्ष रूप से सब शिक्षाएं और संस्कार हासिल करते थे जो उनके भावी जीवन में फलदायी होते थे। बच्चे राष्ट्र की धरोहर होते हैं जिनमें हमारा अतीत सोता है, वर्तमान करवट लेता है और भविष्य अंकुरित होता है। बच्चे मानव जीवन की सनातन अखंड परंपरा के प्रतीक होते हैं जिनमें परिवार, समाज, देशकाल, वातावरण आदि विधायक तत्त्वों का समावेश भी रहता है। उसी परंपरा के रक्षार्थ बालक को सर्वथा एक अनमोल भेंट समझकर व संजोकर रखना होता है। डोरेमोन, शिनचैन, शिजूका, मिक्की माउस, स्पाइडर मैन, ही मैन कार्टून देख कर हमारे बच्चे कौन से मूल्यों को प्राप्त करते हैं? यह विचारणीय है। ऐतिहासिक, पौराणिक, सामाजिक, वैयक्तिक लगाव पैदा करने के लिए बाल साहित्यकारों, अभिभावकों, अध्यापकों; इन तीनों कडि़यों को आपस में जुड़ना होगा। उन्हें जब हम सब वेद, ग्रंथों की छोटी-छोटी कहानियां सुनाएंगे तब वे भी अवश्य राम की तरह पुत्र होंगे, आजाद, भगत सिंह, सुभाष चंद्र, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल बहादुर शास्त्री की तरह देशभक्त बनेंगे। अगर हम ऐसा नहीं कर पाए तो वे अपने परिवेश, जड़ों, संस्कारों से कटते चले जाएंगे। ऐसी स्थिति में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि बाल साहित्य रचनाकार क्या करें? दुर्लभ मानवीय मूल्यों के आकाश में अपनी विषयवस्तु खोजें या यथार्थ के भौतिक धरातल पर पुराने मूल्यों को पटककर चलता हुआ भौतिक और व्यावहारिक पाठ्य सामग्री का सृजन करें। यह प्रश्न केवल बाल साहित्य रचनाकारों के लिए नहीं, बल्कि समाजशास्त्रियों, मनोवैज्ञानिक और राष्ट्रीयता का चिंतन करने वाले प्रत्येक नागरिक के लिए एक चुनौती है। व्यक्ति का संबंध केवल मनुष्यता के नाते होता है। बाल साहित्य सृजन के महान उद्देश्य के अंतर्गत बाल मानस का चतुर्मुखी विकास आवश्यक है। इस विकास के लिए बच्चों में अच्छे गुणों की अभिवृद्धि कर नई पीढ़ी को एक स्वर्णिम भविष्य प्रदान करना है। वे अच्छे गुण सर्वविदित हैं; यथा उत्साह, विश्वास, विनय, स्वाभिमान, अनुशासन, सदाचार, समय पालन, आत्मबल, साहस, निर्भयता, आज्ञापालन, सात्विकता, अनुसंधान, त्वरित निर्णय, उत्सुकता, निश्चय आदि। बच्चों में अच्छे संस्कार पनपे और वे रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाएं, यही सभी चाहते हैं। निष्कर्षतः स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि बाल साहित्य बच्चों को मनोनुकूल, उनका मनोविज्ञान समझकर, उन्हीं के स्तर पर उतरकर, उन्हीं की भाषा में उनके समझने योग्य अभिव्यक्ति पर उतरकर ही लिखा जाना चाहिए। बाल साहित्य का लक्ष्य बच्चों के मानसिक धरातल पर उतारकर उन्हें रोचक ढंग से नई जानकारियां देना है। बच्चों को जो अच्छा लगता है, उसे ग्रहण करने में सकुचाते नहीं हैं और जो सामग्री उन्हें थोपी हुई लगती है, उसे नकारने में कदापि संकोच नहीं करते हैं। बाल साहित्य लिखने से पहले बाल साहित्यकार को बच्चों के साथ घुटने-घुटने चलना होगा। उनकी खीझ, उनकी मुस्कान, उल्लास, बालहठ, चंचलता और सर्वोपरि स्नेह की लालसा से साक्षात होना होगा। बाल साहित्य उनके लिए एक पूरा संसार होता है, जिसमें वे रहते हैं। अतएव, बच्चों को जो साहित्य दिया जाए, वह नैतिक मूल्यों से भरपूर, कल्पना, मनोरंजकता के साथ-साथ वास्तविकता का पुट लिए हुए हो ताकि बच्चों के मन पर पैठ बनाने में सफल रहे।

बाल साहित्य लेखन परंपरा में हिमाचल का योगदान-4

अतिथि संपादक : पवन चौहान

बाल साहित्य की लेखन परंपरा में हिमाचल का योगदान क्या है, इसी प्रश्न का जवाब टटोलने की कोशिश हम प्रतिबिंब की इस नई सीरीज में करेंगे। हिमाचली बाल साहित्य का इतिहास उसकी समीक्षा के साथ पेश करने की कोशिश हमने की है। पेश है इस विषय पर सीरीज की चौथी किस्त...

विमर्श के बिंदु

* हिमाचली लेखकों का बाल साहित्य में रुझान और योगदान

* स्कूली पाठ्यक्रम में बाल साहित्य

* बाल चरित्र निर्माण में लेखन की अवधारणा

* इंटरनेट-मोबाइल युग में बाल साहित्य

* वीडियो गेम्स या मां की व्यस्तता में कहां गुम हो गई लोरी ?

* प्रकाशन की दिक्कतों तथा मीडिया संदर्भों से जूझता बाल साहित्य

* मूल्यपरक शिक्षा और बाल साहित्य

* बाल साहित्य और बाल साहित्यकार की अनदेखी, जिम्मेदार कौन?

* हिमाचल में बाल पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका

* हिमाचली बाल साहित्य में लोक चेतना

* वर्तमान संदर्भ में बच्चों तक बाल साहित्य की पहुंच