Wednesday, July 17, 2019 12:36 AM

मेरी सांप्रदायिकता तथा आतंकवाद

किताब मिली

विरोधी कहानियां

‘मेरी सांप्रदायिकता तथा आतंकवाद विरोधी कहानियां’ के रचना संग्रह में ‘अतीत’ में भारत-पाक बंटवारे के बारे जो सोचा-समझा जाता है, उसकी बुनियाद गढ़ा यह एक दृश्य है। कितनी रात और अकेली मादा सारस आदि लगभग सभी कहानियों के प्लाट मारधाड़ के गिर्द ही घूमते हैं। लेखक शायद अति संवेदनशील प्रवृत्ति के हैं, लिहाजा वह हर कहानी के निष्कर्ष को पाठक के ऊपर ही छोड़ देते हैं। हालांकि स्पष्ट संदेश यही मिलता है कि प्रेम से बड़ा धन कोई नहीं। मारधाड़ और नफरत की सोच ने हमेशा लुटिया ही डुबोई है। चेहरों को पढ़ने, किरदारों को गढ़ने और पूरी कहानी में उन्हें लेखक ने जिंदा रखने की भरपूर कोशिश की है। स्थानीय कथानकों की हाजिरी अपनापन लिए हुए है। अकेली मादा सारस में साधुराम दर्शक ने महिलाओं के दर्द को काफी अच्छे से उकेरा है। अंधेरे का जुगनू में कालू का किरदार पूरी कहानी को ही रोशन कर देता है। लेखक महोदय ने जिंदा-मुर्दा कहानी में जीवन के  श्याम-श्वेत पन्नों में करीने से रंग भरे हैं। इसी तरह नन्हा गुलाब बूढ़ा खार व क्रोध आदि कहानियों में लेखक ने जीवन को पहेली की तरह प्रस्तुत किया है, जिसे सुलझाने में व्यक्ति हमेशा उलझन में रहता है। साधुराम दर्शक के ज्यादातर कथानक संदेश देते हैं कि मनुष्य जाति का सबसे बड़ा दुख यही है कि वह भेद नहीं मिटा पाता। साधुराम के ऐसे प्रयास को साधुवाद। उन्होंने ‘मेरी सांप्रदायिकता तथा आतंकवाद विरोधी कहानियां’ संग्रह के जरिए नवोदित पाठकों को भी लेखनी के जरिए कसरत करने की खूब सीख दी है। आकर्षक आवरण के साथ बाजार में पहुंची यह पुस्तक पाठकों की समझ में वृद्धि करेगी, ऐसी कामना है। मेरी सांप्रदायिकता तथा आतंकवाद विरोधी कहानियां : साधुराम दर्शक, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस नई दिल्ली, 200 रुपए

-ओंकार सिंह