मेहनत और लगन ने बना दिया आईएएस अफसर

हरिकेश मीणा : डीसी हमीरपुर

प्रोफाइल

जन्म तिथि : 14 अगस्त, 1981

शिक्षाः  प्राइमरी एजुकेशन राजकीय प्राथमिक पाठशाला हणुतया (राजस्थान) में हुई। छठी से दसवीं तक की पढ़ाई घर से 3 से 4 किलोमीटर दूर सरकारी स्कूल हड़ोली में हुई। प्लस वन और टू कोटा में की। उसके बाद इलेक्ट्रिकल में इंजीनियरिंग 2005 में आईआईटी कानपुर से की।

 बैच :  2012 हिमाचल काडर के आईएएस

पत्नी का नाम :  डा. अनिता मीणा

जन्म स्थान :  गांव हणुतया, जिला स्वाई माधोपुर,राजस्थान  अब तक किन-किन पदों पर रहे

बतौर आईएएस फर्स्ट पोस्टिंग एसी डिवलेपमेंट, बीडीओ सिराज जिला मंडी, एसडीएम सुंदरनगर, एसडीएम नालागढ़, एडीसी मंडी, डीसी चंबा और वर्तमान में डीसी हमीरपुर।

मंजिलें उनको मिलती हैं जिनके सपनों में जान होती है। पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है। कुछ ऐसे ही सपनों, हौसलों और आत्मविश्वास की कहानी है 38 वर्षीय आईएएस आफिसर हरिकेश मीणा की। इलेक्ट्रिकल इंजीनियर कल एक प्रशासनिक अधिकारी बन जाएगा, शायद हरिकेश मीणा के अलावा यह किसी ने सोचा भी नहीं होगा, लेकिन कहते हैं न कि लगन, मेहनत के साथ यदि माता-पिता का आशीर्वाद इनसान के साथ हो तो फिर चाहे आर्थिक तंगी हो या फिर दूसरा कोई भी चैलेंज, इनसान बड़े से बड़ा मुकाम हासिल कर सकता है। कुछ ऐसी ही कहानी है आईएएस आफिसर डीसी हमीरपुर हरिकेश मीणा की। ग्रामीण परिवेश में एक किसान के घर जन्मे हरिकेश मीणा राजस्थान के स्वाई माधोपुर जिले के रूरल गांव हणुतया के रहने वाले हैं। सरकारी स्कूल में पढ़कर कई परेशानियों का सामना कर हरिकेश मीणा ने आईएएस तक का सफर तय किया, लेकिन उनका मानना है कि जिन्हें हम परेशानियां कहते हैं वे दरअसल सफलता के चैलेंज होते हैं। जब हम उन चैलेंज को पार कर रहे होते हैं तो सफलता हमारे पास आ रही होती है। घर से फाइनांशियली कंडीशन अच्छी नहीं थी, इसलिए पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी भी की। सपना एक ही था कि प्रशासनिक अधिकारी बनेंगे, इसलिए लक्ष्य को हासिल करने के लिए दिन-रात एक किया। खुद कोचिंग लेने में समर्थ नहीं थे, लेकिन दोस्तों ने तैयारी करवाने में पूरा सहयोग दिया। एक किसान का बेटा एक दिन आईएएस बनेगा, यह शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। क्योंकि परिवार का सीधा नाता माटी से है, इसलिए छोटे से छोटे व्यक्ति खासकर किसानों की जरूरतों से भली भांति परिचित हैं। विभागों के साथ तालमेल बिठाने को प्राथमिकता देते हैं ताकि लोगों के काम प्रभावित न हों। सरकार की जनकल्याणकारी नीतियों और प्राथमिकता को हमेशा आगे रखकर चलते हैं ताकि जनता को समय पर योजनाओं का पूरा लाभ मिल सके। 31 वर्ष की आयु में आईएएस अफसर बने हरिकेश मीणा की पहली पोस्टिंग मंडी जिला के सिराज में बतौर एसी डिवेलपमेंट कम बीडीओ के रूप में हुई थी। श्री मीणा की धर्मपत्नी वर्किंग वूमन हैं। वह रेलवे में डाक्टर हैं और आजकल शिमला में पोस्टेड हैं। दो बच्चे हैं जिनमें बेटा साढ़े तीन साल का और बेटी एक साल की है।

मुलाकात  : खुद का विश्वास ही मंजिल तक पहुंचाता है...

हरिकेश मीणा : डीसी हमीरपुर

प्रशासनिक अधिकारी बनने का क्या मतलब होता है?

हर पोस्ट पर काम का नेचर चेंज होता है, लेकिन टारगेट हमेशा यही रहता है कि डिवलेपमेंट के साथ सभी विभागों में समन्वय बना रहे ताकि कोई भी काम प्रभावित न हो। लॉ एंड ऑर्डर को बनाए रखना भी अहम जिम्मेदारी होती है। इसके अलावा ड्यूटी को उस तरह से करना जो सरकार की प्राथमिकता हो और जनता की जरूरत हो।

आपने स्कूली शिक्षा और कालेज व विश्वविद्यालय की पढ़ाई कहां से पूरी की?

मैं ग्रामीण परिवेश में पला -बढ़ा। प्राइमरी एजुकेशन अपने ही गांव की राजकीय प्राथमिक पाठशाला हणुतया में हुई। उसके बाद छठी से दसवीं तक की पढ़ाई मेरे घर से तीन से चार किलोमीटर दूर सरकारी स्कूल हड़ोली में हुई। प्लस वन और टू कोटा में की। उसके बाद इलेक्ट्रिकल में इंजीनियरिंग 2005 में आईआईटी कानपुर से की।

खुद पर कितना विश्वास है और इसकी ताकत कहां से आती है। पढ़ाई की उपलब्धियां क्या रहीं?

थोड़ा मुस्कराते हुए...विश्वास था तभी तो यहां तक पहुंच पाए। देखिए जब भी हम कोई भी मिशन लेते हैं तो खुद पर विश्वास करना ही पड़ता है क्योंकि यही विश्वास आपकी ताकत होता है, परीक्षा किसी भी तरह की हो रिजल्ट तो आना ही होता है चाहे पहले आए या देरी से, आपकी इच्छा के अनुरूप आए या न आए, लेकिन हमारा पहला कर्त्तव्य यही बनता है कि हर काम में अपना सौ फीसदी दें। स्कूल में पढ़ते थे तो पता था कि एक चीज तो हमारे हाथ में है कि लगन से पढ़ाई कर सकते हैं। इसलिए वहां कोई कसर नहीं छोड़ी इसलिए हमेशा अच्छी पोजीशन में ही उत्तीर्ण होते रहे।

कितने प्रयास के बाद आईएएस के लिए चुने गए और इसके पीछे प्रेरणा?

आईएएस बनने के लिए मैंने चार बार परीक्षा दी। 2009 में अलाइड में सिलेक्शन हुआ। बीच-बीच में तैयारी चलती रही, लेकिन फाइनली चौथे चांस में मैं आईएएस के लिए सिलेक्ट हुआ। जब स्कूल में या कहीं दूसरी जगह बड़े अधिकारियों को देखता था तो वहीं से इच्छा जागने लगी थी कि मुझे एक प्रशासनिक अधिकारी बनना है।

यह कब और कैसे सोचा कि आपको आईएएस अफसर ही बनना है?

ईश्वर की कृपा से स्कूल समय में ही अफसर बनने का विचार दिमाग में आ गया था। फे्रंकली स्पीकिंग मैं आईएएस में सिलेक्ट होने से पूर्व कभी किसी आईएएस अफसर से मिला भी नहीं था। बस यह था कि प्रशासनिक सेवा में जाना है।

आपने सिविल सेवा परीक्षा के दौरान कौन से विषय चुने और इसके पीछे का कारण?

फिजिक्स और केमिस्ट्री मेरे सब्जेक्ट थे। विश्वास तो था ही खुद पर सब्जेक्ट से कंफर्ट लगता था कि इसमें मेहनत कर लेंगे। सब्जेक्ट ऐसे थे कि साइंटिफिक ओरिएंटेशन था तो पता था कि एक नहीं तो दो या फिर तीन बार में हो जाएगा। इसके अलावा आईआईटी के मेरे कुछ फ्रेंड थे, वे दिल्ली में तैयारी कर रहे थे। फाइनांशियल तौर पर मैं उतना सक्षम नहीं था कि मैं दिल्ली जाकर तैयारी कर सकूं इसलिए मैं वेदांता में जॉब करता रहा, लेकिन स्टडी मैटीरियल मैं कोरियर के माध्यम से दोस्तों से मंगवा लेता था।

सामान्यतः यहां तक पहुंचने के लिए आपकी दिनचर्या क्या रही?

दिनचर्या तो कंडीशन के हिसाब से होती है, क्योंकि पहले मुझे खुद को फाइनांशियली स्ट्रांग करने के लिए जॉब करनी पड़ी। इसलिए मेरी दिनचर्या कुछ भिन्न थी। बच्चों को वह सब्जेक्ट पढ़ाता था जो मैंने विषय ले रखे थे। जैसे फिजिक्स और केमिस्ट्री। कई बार छह माह के बाद कुछ समय के लिए जॉब छोड़ देता था और फिर खुद को कमरे में बंद कर तैयारी करने लगता। जो दोस्त दिल्ली में स्टडी कर रहे थे वे मैटीरियल भेजते रहते थे तो काफी हेल्प हो जाती थी।

वैसे तैयारी में किताबों के अलावा और किस-किस सामग्री का सहारा मिला?

किताबों के अलावा एग्जाम के पैटर्न को स्टडी करते रहे। जैसे पिछले पांच या दस साल से किस तरह के पेपर आ रहे हैं। उनको सॉल्व करते रहे खुद ही चैक करते रहे। दूसरा, आप खुद के सबसे बड़े जज होते हो। आप जब कोई लाइन लिखते हो तो आप चैक करके देख सकते हो कि इसकी जगह यह नहीं, इससे बेहतर भी लिखा जा सकता है तो इस तरह प्रैक्टिस करते रहे। इसके अलावा न्यूजपेपर पढ़ने का शौक था, वहां से भी काफी हेल्प मिलती रही।

आजकल कोचिंग क्लासेज का चलन बढ़ रहा है। क्या सफलता पाने के लिए कोचिंग क्लास जरूरी है या हम खुद भी सफलता पा सकते हैं?

वैसे कंपलसरी तो नहीं है, लेकिन क्योंकि एग्जाम में सबसे जरूरी यह होता है कि आपको क्या नहीं पढ़ना है। क्योंकि सिलेबस है तो डिफाइन है और आपको पता है कि एग्जाम का पैटर्न कैसे चला हुआ है। कई बार हम यह गलती करते हैं कि दुनिया भर की चीजें पढ़ते रहते हैं और साल दो साल उसी में निकल जाते हैं। इसलिए सबसे जरूरी यह पता होना चाहिए कि आपको क्या पढ़ना नहीं है। और मैं समझता हूं कि ऐसी कंडीशन में कोचिंग लेना जरूरी हो जाता है। कोचिंग से यह आइडिया लग जाता है कि क्या पढ़ना है, क्या पढ़ना नहीं है।

आपकी कार्यशैली आम आफिसर की तरह ही है या कि कुछ हटके है?

फिर एक बार मुस्कराते हुए...मैं यह खुद तो जज नहीं कर सकता, लेकिन क्योंकि मैं एक रूरल बैकग्राउंड से हूं तो आम आदमी की परेशानी, उसकी जरूरतों को बड़े करीब से समझता हूं। हर आदमी को किसी न किसी से काम पड़ता है। अगर हम आफिसर हैं तो ऐसा नहीं कि हमें किसी दूसरे दफ्तर में काम नहीं पड़ता। जब हम कहीं काम करवाने जाते हैं और हमें बिना मतलब काफी देर तक बाहर बैठना पड़े तो वह सबसे बुरा लगता है। इसलिए मेरी हमेशा यह कोशिश रही है कि यदि कोई मुझसे आफिस में मिलने आता है तो मैं उसे बाहर इंतजार न करवाऊं। क्योंकि पता नहीं उसे कितनी जल्दी है, वह कितनी दूर से किस तरह यहां तक आया है। साथ ही कोशिश रहती है कि ऐसा सिस्टम बनाऊं कि लोगों को छोटे-छोटे काम के लिए जिला मुख्यालय न आना पड़े। क्योंकि यदि काम तहसील और एसडीएम स्तर पर होना है तो लोग इतनी दूर यहां आकर क्यों पहुंचे, इसलिए मैं फॉलोअप लेता रहता हूं।

जो युवा आईएएस अफसर बनने का सपना देख रहे हैं, उनको आप क्या सुझाव देना चाहेंगे?

सबसे पहले हमें यह देखना चाहिए कि जो भी डिसीजन लें, उस पर स्ट्रिक्ट रहें। क्योंकि चैलेंज तो होते हैं। डिफरेंट जॉब का डिफरेंट वर्ककल्चर होता है और डिफरेंट एन्वायरमेंट होता है। कई बार देखा गया है कि मायूसी बड़ी जल्दी आ जाती है। खुद पर विश्वास बनाए रखें। अगर किसी की पारिवारिक फाइनांशियल कंडीशन ठीक नहीं है तो वह पहले कोई जॉब जरूर करें। अगर आपकी फाइनांशियल कंडीशन थोड़ी ठीक होगी तभी आप भी अपने लक्ष्य के बारे में भी सोच पाएंगे और प्रयत्न कर पाएंगे। - नीलकांत भारद्वाज, हमीरपुर

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