मेहनत ने आसान बनाई रितु की राह

इंडोनेशिया के जकार्ता में भारतीय महिला कबड्डी टीम की अहम सदस्य के रूप में देश के लिए सिल्वर मेडल जीतने वाली जिला सिरमौर के दूरदराज क्षेत्र शिलाई के शरोग गांव में जन्मी रितु  नेगी आज किसी परिचय की मोहताज नहीं है। रितु नेगी ने शिलाई के छोटे से गांव शरोग से नन्हे-नन्हे कदमों से सफर तय कर इंडोनेशिया के जकार्ता व मलेशिया तक का सफर अपने बलबूते पर तय कर लिया है। आज रितु को न केवल जिला सिरमौर व हिमाचल प्रदेश ने पलकों पर बिठाया है, बल्कि पूरा भारतवर्ष भी बेटियों की जीत का जश्न मना रहा है। जकार्ता में संपन्न हुई एशियाई खेलों में भारतीय महिला कबड्डी टीम की डिफेंडर रितु नेगी विश्व की सर्वश्रेष्ठ डिफेंडर महिला खिलाड़ी इन एशियाई खेलों में चुनी गई। आज हिमाचल की जुबान पर देश की महिला कबड्डी टीम की तीन बेटियां, जो कि हिमाचल से संबंधित हैं रितु  नेगी, प्रियंका नेगी व कविता का नाम हर व्यक्ति की जुबान पर है। हिमाचल प्रदेश का जिला सिरमौर का गिरिपार क्षेत्र अत्यंत ही पिछड़ा माना जाता है, परंतु समय का पहिया ऐसा घूमा कि यहां के प्रतिभाशाली खिलाडि़यों ने न केवल अपने गांव व क्षेत्र का नाम रोशन किया है, अपितु देश को भी गौरवान्वित किया है। इन्ही में से एक रितु नेगी का नाम अहम है। शिलाई के शरोग गांव निवासी पेशे से शिक्षक व स्वयं राष्ट्रीय स्तर के कबड्डी खिलाड़ी रहे भवान सिंह नेगी व पूर्णिमा नेगी की चार संतानों में रितु नेगी सबसे बड़ी बेटी है। जब रितु  नेगी मात्र सातवीं कक्षा में थी तो उसका रुझान कबड्डी की ओर बढ़ना शुरू हुआ। उसके बाद रितु  नेगी ने कबड्डी के खेलों में उसकी अंगुली पकड़ने वाले शिलाई के कबड्डी खिलाड़ी व शारीरिक शिक्षक स्व. हीरा सिंह नेगी के बताए मार्ग पर ऐसा कदम बढ़ाया कि पीछे मुड़कर नहीं देखा। रितु की प्राथमिक शिक्षक शरोग में हुई, परंतु उसके माता-पिता ने अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए अपने गांव से शिलाई के लिए कूच किया।

यहां पर जैसे ही रितु प्राथमिक स्तर से मिडल स्तर पर पहुंची। स्व. हीरा सिंह नेगी ने रितु की काबिलीयत को परखा तथा उसे आगे लाने का निर्णय लिया। आरंभ में रितु नेगी के माता-पिता अपनी बेटी को पुरुष वर्ग का खेल माना जाने वाला कबड्डी में नहीं भेजना चाहते थे, शिक्षक स्व. हीरा सिंह अपनी बात पर अड़े रहे तथा वह रितू को बिलासपुर स्थित महिला कबड्डी छात्रावास के लिए ट्रायल के लिए भेज दिया। यही दिन रितु के कबड्डी के खेल के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। आठवीं कक्षा में रितु  का चयन पहली बार झारखंड में वर्ष 2004-05 में राष्ट्रीय स्कूली प्रतियोगिता के लिए हुआ। रितु  नेगी को कबड्डी का खिलाड़ी बनाने के पीछे सर्वाधिक योगदान यदि किसी व्यक्ति का है, तो वह स्व. हीरा सिंह पीटीआई थे। जब रितु नौवीं कक्षा में थी तो उसका ट्रायल बिलासपुर में कबड्डी छात्रावास के लिए हुआ तथा वह छात्रावास के लिए चयनित हो गई। रितु नेगी के पिता भवान सिंह ने बताया कि रितु करीब नौ वर्ष कबड्डी छात्रावास बिलासपुर में रही तथा इस दौरान वह कई बार राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदेश व देश का नेतृत्व करती रही। रितु के तीन भाई हैं तथा वह अपने भाई-बहनों में सबसे बड़ी है। सबसे बड़ी खासियत यह है कि चार भाई-बहनों में से केवल रितु ही कबड्डी की खिलाड़ी है। रितु के भाई कबड्डी में या अन्य खेल में रुचि नहीं रखते हैं। रितु के पिता भवान सिंह नेगी ने बताया कि यह बेहद ही कठिन क्षण थे जब उन्होंने बेटी को खेल छात्रावास बिलासपुर में छोड़ा था। रितु वर्ष 2011 में मलेशिया में संपन्न हुई कबड्डी की एशियन चैंपियनशिप में भारतीय महिला कबड्डी टीम की कप्तान रही तथा उस दौरान रितु  ने देश के लिए गोल्ड मेडल लाया।  परिवार का बलिदान आज परिणाम तक पहुंचा है।  रितु वर्तमान में भारतीय रेलवे में सिकंदराबाद में सेवाएं दे रही हैं। भारतीय रेलवे ने भी रितु को पदोन्नत्ति का ऑफर दिया है, परंतु रितु  हिमाचल में सेवाएं देना चाहती हैं।

— सूरत पुंडीर, नाहन

मुलाकात

राष्ट्रगान की धुन व तिरंगे को देख कर हमारी रगों में दौड़ने लगा...

शिलाई से जकार्ता तक के सफर में रितु अपना मूल्यांकन कैसे करती हैं?

शिलाई से जकार्ता तक का सफर  चुनौतीपूर्ण अवश्य रहा, लेकिन जीवन में हार न मानना व कठिन परिश्रम से हर चुनौती का सामना करके, मंजिल अवश्य मिल जाती है।

कोई ऐसा एहसास जो केवल खेल के मैदान पर हुआ?

खेल के मैदान में सिर्फ स्वर्ण पदक जीतने का सपना था, जो कि एशियाई खेलों  2018 में तो पूरा न हुआ, लेकिन एशियन जूनियर टीम की कप्तानी करके 2011 में मलेशिया में पूर्ण हो चुका था। आगे जब भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मौका मिलेगा तो अवश्य पूरा करेंगे।

जब देश के लिए खेलीं तो जज्बात और दबाव क्या रहे और जब जीत कर तिरंगा ओढ़ा या राष्ट्रगान बजा तो?

जब देश के लिए कुछ करने का स्वर्णिम अवसर मिला तो निश्चित रूप से दबाव पदक जीतने का था। तिरंगे का मान बढ़ाने के लिए भारतीय महिला टीम ने भरसक प्रयत्न किया। राष्ट्रगान की धुन व तिरंगे को देख कर हमारी रगों में खून दौड़ने लगा।

कबड्डी में कैसे कूदीं और कौन सी प्रेरणा सारथी बनी?

कबड्डी में बाल्यावस्था से ही रुचि थी। पाठशाला में स्वर्गीय सेवानिवृत्त शारीरिक अध्यापक हीरा सिंह व अपने माता-पिता की प्रेरणा जीवन में खेल के क्षेत्र में मार्गदर्शक बनीं।

भारतीय महिला कबड्डी को हिमाचल की देन व योगदान?

भारतीय महिला कबड्डी टीम की हिमाचल की बेटियों का योगदान किसी भी राज्य से कम नहीं है। सर्वप्रथम हिमाचल की बेटियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रंजीता ठाकुर रोहडू से, पूजा ठाकुर बिलासपुर, जिसने जूनियर में भारत की कप्तानी करके स्वर्ण पदक दिलाया। 2014 में एशियाई खेलों में स्वर्ण  पदक प्राप्त किया। तत्पश्चात मैंने (रितु नेगी)  2011 में एशियाई खेलों में प्रियंका नेगी व कविता ठाकुर ने भारतीय महिला टीम में  अपना योगदान करके रजत पदक दिलाया।

जहां रितु सबसे अलग खड़ी होती है या जो  केवल आपका ही अंदाज है?

मेरा एक बेहतरीन अंदाज यह है कि मैं राइट कार्नर में एक मजबूत डिफेंडर की भूमिका न केवल भारतीय रेलवे की टीम बल्कि भारतीय महिला टीम की भी मैं सुपर स्टार डिफेंडर हूं।

एशियन गेम्स की तैयारी में ऐसी क्या चूक रही कि गोल्ड छूट गया या कोई अन्य कारण रहा?

एशियन गेम्स 2018 में हमारी बेहतरीन तैयारी थी। चार महीने से हमने खूब मेहनत करके तैयारी की थी। चूक का सबसे बड़ा कारण गलत एंपायरिंग था और इससे बड़ा कारण रिव्यू का न होना था। चार-चार फैसले गलत देने से हमारा मैच टर्न हो गया और हमें सिल्वर मेडल से संतोष करना पड़ा।

आज तक सबसे कठिन मुकाबला और  यादगार जीत?

सबसे यादगार जीत मेरी कप्तानी में खेल रही । भारतीय महिला कबड्डी की जीत थाईलैंड के विरुद्ध मलेशिया में 2011 में रही और कठिन मुकाबला जकार्ता में फाइनल मैच ईरान के  साथ 24 अगस्त, 2018 को रैफरी के चार-चार गलत फैसले के बावजूद हमने आखिरी मिनट तक मैच को मुकाबले पर रखा।

असफलता को कैसे देखती हैं?

इस असफलता को हम गंभीरता से ले रहे हैं और यही सीख लेना चाहेंगे कि किसी भी विरोधी टीम को अंकों के लिहाज से अपने नजदीक आने का मौका न दें और न ही अपने ऊपर हावी होने दें।

गिरिपार के लिए जो करना चाहेंगी?

गिरिपार के लिए एक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी होने के नाते सरकार से चाहूंगी कि हमारे इस पिछड़े क्षेत्र को सरकार जन-जातीय घोषित करे व खेलों के लिए खेल छात्रावास और लड़कियों के लिए बेहतर शिक्षा प्रदान करने के लिए छात्रावास का प्रबंध करे ताकि गांव से प्रतिभावान खिलाडि़यों को तराशा जा सके।

आपके लिए जीत क्या है और उसका मंत्र क्या है?

जीत हर किसी का लक्ष्य होता है, पंरतु जीवन में कभी लक्ष्य तक पहुंचने में कमी रह जाती है। इस असफलता से कभी निराश नहीं होना चाहिए। अपनी असफलता को सफलता का हथियार बना कर दोगुने उत्साह ेके साथ कड़ी मेहनत व लगन से कार्य करके सफलता की सीढ़ी चढ़ी जा सकती है।

 

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