Tuesday, January 21, 2020 11:28 AM

मैं भी सूअर हूं सरकार जी

अशोक गौतम

ashokgautam001@Ugmail.com

बडे़ दिनों से उस दोस्त आदमी से बातचीत नहीं हुई थी। कारण, एक दूसरे से सत्ता हथियाने के लिए गहरे लूटमारी मतभेदों के बीच उथली व्यावहारिक समानताएं तलाशते उनका न्यूनतम साझा कार्यक्रम उल्ट-पुल्ट रहा था। जब उनसे फुर्सत मिली तो उनको फोन किया,‘बधाई बंधु ! और प्याज कितना लाए अबके? जनता को कुछ मिले या नए पर अब जनता को दस रुपए में प्याज के साथ जरूर भरपेट खाना मिलेगा। अब भरपेट खाना। इतना खाना कि कल तक के भूखे पेट को कब्ज हो जाए ताकि उसे भी पता चले कि खाना क्या होता है।’ ‘गुर्र-गुर्र! ‘दूसरी ओर से सूअराना आवाज आई तो लगा किसी को या तो मैंने गलत नंबर डायल कर दिया है या फिर किसी गलत ने मेरा काल ले लिया है। मैंने तुरंत फोन काटकर फिर आम आदमी का नंबर लगाया,’ हैलो! कौन मेरे दोस्त आदमी’ मुझसे आदमी की जुबान में पेश आने के बदले दूसरी ओर से फिर वही गुर्र-गुर्र हुई तो एमटीएनएल वालों पर बहुत गुस्सा आया। कम से कम आदमी इतना सूअर तो नहीं हो सकता! यार! नंबर मिला रहा हूं आदमी का और मिल रहा है किसी गुर्र-गर्र वाले का! हम भी न! पता नहीं आजकल किस किसकी बोली बोलने लगे हैं? अगर ऐसा ही रहा तो वह दिन दूर नहीं जब आदमी अपनी बोली भूल जाएगा। ये हो क्या रहा है आजकल भाई साहब? गिरगिट, कुत्ते-बिल्लयों के पास तो मोबाइल थे ही, अब क्या सूअर भी मोबाइललेस हो गए? जय हो संचार क्रांति! अपने को ही गालियां देते हुए एक बार फिर फोन काटकर अपने दोस्त आदमी को बड़े ध्यान से डरते हुए फोन मिलाया तो फिर वही गर्र-गुर्र! आखिर मैंने तंग आकर आगे बात करना चाही,‘कौन? मेरे दोस्त आदमी ही बोल रहे हो न। ‘गुर्र-गुर्र!’ ’यार! तुम्हें हो क्या गया ये? गले में कहीं से चुराकर लाया प्याज का गट्ठा तो नहीं फंस गया है।’ ‘गुर्र! गुर्र!’ यार! बहुत हो गई ये मसखरी! माना, आम आदमी आज भी सूअर की तरह ही ट्रीट हो रहा है, पर ये सूअर की तरह गुर्र! गुर्र ! क्यों कर रहे हो? असली सूअरों और बनावटी सूअरों में बहुत अंतर होता है दोस्त! देखना जो आसपास के किसी असली सूअर ने तुम्हारी गुर्र-गुर्र सुन ली तो....सीधे बात क्यों नहीं कर रहे?’ ‘सीधे बात करता ही कौन है बंधु यहां आजकल! गुर्र-गुर्र।’ हद है यार! आदमी होने के बाद भी आदमी वाली बात कम, सूअर वाली गुर्र-गुर्र अधिक’ ’ये सूअर कब से हो गए तुम’ ‘जबसे सरकार ने इस सर्दी के मौसम में सूअरों को कोट देने की सहर्ष घोषणा की है, गुर्र! गुर्र!’ ’तो तुम कोट के लिए इतने गिर जाओगे? आदमी से सूअर हो जाओगे।’ ‘मुफ्त का पाने के लिए आदमी तो क्या पूंजीपति तक मजे से गिर सकता है। गुर्र! गुर्र!! गिरना हमारा राष्ट्रीय चरित्र है। गुर्र ! गुर्र!! हम अपने को सब कुछ करने से रोक सकते हैं पर गिरने से कतई नहीं रोक सकते। हम अपने तुच्छ से तुच्छ स्वार्थ के लिए मजे से गर्व महसूस करते हुए गिर सकते हैं। हमें गिरने से कोई नहीं रोक सकता। न भगवान एन संविधान!‘ अब उनकी ओर से सूअर की सी बास भी फोन पर आने लगी थी, सो मैंने उनसे अपनी नाक पर मैला रूमाल रख आगे पूछा, ‘मतलब, तुम अब सूअर की तरह गंद भी खाओगे?’ ‘गंद यहां कौन नहीं खा रहा है, गुर्र-गुर्र’ गंद यहां कौन नहीं फैला रहा है, गुर्र -गुर्र और वे गुर्र-गुर्र करते मेरे सामने! कमाल है यार! दो पैरों पर जैसे कैसे खड़ा रहने वाला आदमी अपने हाथों पैरों के सहारे। फिर उन्होंने गुर्र-गुर्र करते अपनी जेब से अपना विजिटिंग कार्ड निकाल मुझे दिया और सूअर की तरह हरकतें करते वहां से चले गए तो मैंने कहा, ‘उनसे जो कपड़ा बचा तो....वरना हो सकता है तुम्हें गर्मियों में कोट के नाम पर कोट के बटन ही न मिलें कहीं।’