मोटापे की मार झेलते विद्यार्थी

अदित कंसल

लेखक, नालागढ़ से हैं

 

इस मोटापे के भस्मासुर से लड़ने के लिए विद्यार्थियों को अपनी दिनचर्या में वांछित परिवर्तन करना चाहिए। सरकार व समाज दोनों को ही इस विषय पर संवेदनशीलता दिखानी होगी। अध्यापकों को चाहिए कि विद्यालय में प्रार्थना सभा में जंक फूड व सोशल मीडिया से होने वाले दुष्प्रभावों व इनसे दूर रहने के उपाय विद्यार्थियों को बताएं। स्कूल प्रबंधन समिति की बैठकों व विद्यालय की आम सभा में भी अध्यापकों, अभिभावकों व पंचायत सदस्यों की विद्यार्थी प्रबंधन व विद्यार्थी निर्माण को लेकर चर्चा होनी चाहिए...

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार भारत में दुनिया की सबसे युवा आबादी निवास करती है। भारत का हर तीसरा व्यक्ति युवा शक्ति (10-24 वर्ष) है। इस युवा संसाधन की क्षमता के रचनात्मक व सृजनात्मक दोहन के लिए युवाओं का स्वास्थ्य बहुत आवश्यक है। आज देखा जाए, तो अधिकतर विद्यार्थी मोटापे से ग्रस्त हैं। देश में 1.44 करोड़ बच्चे मोटापे का शिकार हैं। आंकड़ों के मद्देनजर भारत में हर 10 में से एक बच्चा मोटा है। मोटापे में भारत का विश्व में तृतीय स्थान है। अनुमान है कि 2025 में भारतवर्ष में मोटे बच्चों की संख्या 2.6 करोड़ हो जाएगी। मोटापे की समस्या विकराल रूप धारण कर रही है। हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य में भी मोटापे ने विद्यार्थियों को जकड़ा हुआ है, जिसके कारण विद्यार्थियों में हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर, श्वास रोग जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं।

मोटापे के कारण विद्यार्थियों में आलस्य व उन्माद बढ़ रहा है। वे ठीक ढंग से अध्ययन नहीं कर पा रहे हैं। मोटापा दैनिक गतिविधियों में अवरोध पैदा कर उनकी ऊर्जा व क्षमता का हृस कर रहा है। मोटापे से विद्यार्थियों में अवसाद बढ़ रहा है। सारा दिन उखड़े-उखड़े रहना, किसी भी कार्य में दिल न लगना, हीन भावना से ग्रस्त होना आम लक्षण हैं। मोटापे से विद्यार्थियों का शरीर असंतुलित हो रहा है। अधिक वजन विद्यार्थियों में मानसिक अस्थिरता पैदा कर रहा है। विद्यार्थियों की भंगिमा दोषपूर्ण हो रही है। विद्यार्थियों में बढ़ते मोटापे का पहला बड़ा कारण है - जंक फूड का अत्यधिक प्रयोग। विद्यार्थी पिज्जा, बर्गर, समोसा, मैगी, चिप्स, कुरकुरे व शीत पेय का अंधाधुंध प्रयोग कर रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की वैश्विक पोषण रिपोर्ट 2018 में बताया गया है कि स्कूल जाने वाले 44 फीसदी बच्चे प्रतिदिन शीत पेय पीते हैं। ग्लोबल न्यूट्रीशियन रिपोर्ट 2018 के अनुसार दुनिया में सर्वाधिक बौने बच्चे भारत में हैं। शीत पेय में शुगर की मात्रा अधिक होती है, जिससे विद्यार्थियों में वजन बढ़ने के साथ-साथ मधुमेह की बीमारी अपना शिकार बना रही है। फास्ट फूड के कारण विद्यार्थियों की अधिगम क्षमता प्रभावित हो रही है। शरीर गुब्बारों की तरह फूल रहे हैं। वे कुरूप और बेडौल होते जा रहे हैं। स्मरण-शक्ति व एकाग्रता में कमी आ रही है। जंक फूड विद्यार्थियों की सहनशक्ति कम कर रहा है। वे छोटी-छोटी बातों पर असहज हो जाते हैं तथा आत्म नियंत्रण खो देते हैं। फास्ट फूड में नमक की मात्रा अधिक होती है। जब शरीर में नमक की मात्रा तय मानक से अधिक हो जाती है, तो इससे सुस्ती, बेचैनी, मांसपेशियों की कमजोरी जैसी विकृतियां उत्पन्न होती हैं। मोटापे का दूसरा प्रमुख कारण है - सोशल मीडिया का असीमित उपयोग। यूरोपियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के वैज्ञानिकों ने शोध में कहा है कि बच्चों में बढ़ रहे मोटापे का सोशल मीडिया से सीधा संबंध है। शोध में पता चला है कि मोटापे का कारण अधिक समय तक टीवी, कम्प्यूटर, मोबाइल की स्क्रीन से जुड़े रहना है। विद्यार्थी स्मार्टफोन का बहुत अधिक उपयोग कर रहे हैं। केंद्रीय सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय भारत सरकार द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में 43.36 प्रतिशत लोग स्मार्टफोन से लैस हैं तथा प्रदेश का देशभर में पहला स्थान है। सोशल मीडिया के बहुत अधिक इस्तेमाल से जहां एक ओर विद्यार्थियों में मोटापा बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर वे आभासी दुनिया में उड़ान भरते हैं। प्रतीत होता है जैसे स्मार्टफोन ने विद्यार्थी जीवन को हाईजैक कर लिया है।  विद्यार्थियों में नेत्र रोग जैसे ड्राई आइज, मायोपिया, नेत्र ज्योति क्षीणता इत्यादि बढ़ रहे हैं। चीन के शांक्सी स्थान में एक 21 वर्षीय लड़की की एक आंख की रोशनी लगातार स्मार्ट फोन पर गेम खेलने के कारण चली गई। विद्यार्थी वर्ग मोबाइल से अपराध की दुनिया में पांव पसार रहा है। अश्लील चित्रों व वीडियो को वायरल करना आम बात हो गई है। सोशल मीडिया में अधिक हस्तक्षेप के कारण विद्यार्थी नींद पूरी नहीं कर पा रहे हैं। चिकित्सकों का कहना है कि हमारे देश में हर पांचवां व्यक्ति नींद से जुड़ी बीमारी ऑब्स्ट्रक्टिव स्लीप एपनिया (ओएसए) से जूझ रहा है। विद्यार्थी कक्षाओं में भी मोबाइल उपयोग करने से परहेज नहीं कर रहे।

सारा दिन व्हाट्सऐप, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, ऑनलाइन गेम्स, लाइक, कमेंट, शेयर, पोस्ट में ही बीत जाता है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। बच्चों में चिड़चिड़ापन, क्रोध, हिंसा, नकारात्मकता, तनाव व कुंठा बढ़ रही है। रहा-सहा समय सेल्फी का होता है। अनगिनत विद्यार्थियों की खतरनाक स्थानों पर सेल्फी खींचने के कारण अकाल मृत्यु हो रही है। पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा ‘सेल्फी डेथ’ भारत में ही हैं। बात यहीं तक समाप्त नहीं होती, आलम यह है कि सेल्फी लुक के आकर्षण में युवा प्लास्टिक सर्जरी करवा रहे हैं। मुंबई की सेलिब्रिटी कॉस्मेटिक सर्जन जय श्री शरद के मुताबिक सेल्फी लुक के लिए प्लास्टिक सर्जरी करवाने वाले अधिकतर 17 से 25 वर्ष के युवा हैं। यह वाकई चिंतनीय है। इस मोटापे के भस्मासुर से लड़ने के लिए विद्यार्थियों को अपनी दिनचर्या में वांछित परिवर्तन करना चाहिए। सरकार व समाज दोनों को ही इस विषय पर संवेदनशीलता दिखानी होगी। अध्यापकों को चाहिए कि विद्यालय में प्रार्थना सभा में जंक फूड व सोशल मीडिया से होने वाले दुष्प्रभावों व इनसे दूर रहने के उपाय विद्यार्थियों को बताएं।

स्कूल प्रबंधन समिति की बैठकों व विद्यालय की आम सभा में भी अध्यापकों, अभिभावकों व पंचायत सदस्यों की विद्यार्थी प्रबंधन व विद्यार्थी निर्माण को लेकर चर्चा होनी चाहिए। अभिभावकों को चाहिए कि अपने बच्चों को प्रातः कालीन सैर, योग व व्यायाम के लिए प्रेरित करें। मोटापे को दूर रखने का सबसे सरल तरीका है - काम करना। विद्यालय में प्रतिदिन एक स्वच्छता पीरियड होना चाहिए, जिसमें विद्यार्थी अध्यापकों, अभिभावकों, सामुदायिक सदस्यों के साथ मिलजुल कर विद्यालय परिसर की सफाई, नालियां खोलना, शौचालय सफाई, घास कटाई, पौधों की जुताई, खाद डालना व पानी देना इत्यादि करें। इससे जहां एक ओर स्वच्छता अभियान को बल मिलेगा, वहीं दूसरी ओर विद्यार्थियों में कार्य संस्कृति पैदा होगी तथा मोटापे से भी निजात मिलेगी।