Tuesday, August 04, 2020 11:34 AM

मौसम के घाटे

प्राकृतिक आपदाओं से रू-ब-रू होते मंजर पर केंद्र सरकार की राहत के पैगाम, हिमाचल में कुछ खोने को पाना है और इसलिए इस साल 454 करोड़ की राशि का असर महसूस होगा। कुछ तो असर है कि पिछले वर्ष से डेढ़ सौ फीसदी राहत में इजाफा हो रहा है, वरना दर्द के हिमाचली पन्नों की इंतिहा समझी ही नहीं जाती। यह दीगर है कि आपदा के हिमाचली स्वरूप को समझने और मौसम के घाटे को पाटने में उपर्युक्त राहत भी कम रहेगी। पर्वत का हर कदम, आपदाओं के सफर से जूझना है और यही बुनियादी अंतर राष्ट्रीय संसाधनों के आबंटन में हिमाचल जैसे राज्यों को बौना कर देता है। हिमाचल में विकास के हर खाके को आपदाओं के आक्रोश से जूझना पड़ता है, लिहाजा यह कहना होगा कि मौसम के बीच विकास की गुंजाइश इतनी कम है कि प्रगति का सफर हमेशा कशमकश में रहता है। ट्राइबल इलाकों में मौसम की बेरुखी के बीच जिंदगी की हर सांस ऐसी ही आपदाओं का सामना है। अगर बाढ़ में सड़क का बह जाना आपदाग्रस्त होना है, तो यहां आधा साल बर्फ के नीचे सड़क का गुम रहना भी तो प्राकृतिक प्रकोप है। हिमाचल में किसान-बागबान के लिए मौसम का उतार-चढ़ाव हर पैदावार पर भारी पड़ता है। मौसमी अनिश्चितता के कारण यहां पूरे वर्ष की गणना में आपदाओं का अंश हर क्षण मौजूद रहता है। ऐसे में आपदाओं का हिसाब-किताब केवल किसी एक सीजन की परिधि या राष्ट्रीय आपदाओं के आकार में चुन लेना ही सही नहीं होगा। देश जब आपदाओं का वर्णन विस्तारित करता है, तो प्रायः मानसूनी उत्पात का चित्रण राष्ट्रीय प्रावधानों के सामने उदारता दिखाता है, लेकिन पर्वतीय वर्जनाएं केवल एक तरह की बेडि़यां नहीं कि जब राष्ट्र के फैसले हों, ये भी खुल जाएं। हमें लगता है कि पर्वतीय आकलन के मानदंड अभी तक तय नहीं और इसलिए जब विकास का आधार ही अधूरा है, तो इसकी क्षतिपूर्ति किस तरह पूर्ण होगी। हिमाचल की आपदाओं को महसूस करने के लिए खेत-खलिहान से जनजातीय आवरण तक का सांगोपांग वर्णन होना चाहिए। राष्ट्रीय सोच से कहीं भिन्न प्रकृति की प्रवृत्ति में पर्वतीय इलाकों की विडंबनाएं हर विकास को बाधित करती हैं। यहां विकास के बंधन भी कई बार आपदा बन जाते हैं या विकास मापदंड ही पूरे नहीं होते तो मुकम्मल होने से पहले उजड़ जाते हैं। पश्चिमी विक्षोभ का बार-बार लौटना, किस हद तक खुराफाती हो जाता है या मौसम की जंजीरों के बीच कामयाब होना अगर आदत है तो इसे हर मोड़ पर सजायाफ्ता रहना पड़ता है। ऐसे में आपदाओं के बीच राहत राशि ढूंढना एक हद तक सहायक हो सकता है, लेकिन पर्वतीय क्षेत्रों में मौसम की यातनाओं का उत्तर खोजना कहीं अनिवार्य है। मौसम के दस्तूर में हवाओं का घर्षण और साल भर उड़ती छतों या ओलावृष्टि से मजबूर खेती या बागाबनी की नाराजगी का नुकसान झेलना भी अगर नियति मान लिया जाए, तो कहीं पर्वतीय राज्यों से भेदभाव हो रहा है। पर्वतीय अनुसंधान के राष्ट्रीय संकल्प या विकास के मानदंडों का विस्तार तभी संभव है, यदि पर्वतीय विषयों के संचालन के लिए अलग से केंद्रीय मंत्रालय का गठन किया जाए। यह इसलिए कि जब हिमाचल के लिए कोई योजना-परियोजना बनती है, तो राष्ट्र के तयशुदा मानक इन्हें हरा देते हैं। पर्वतीय परियोजनाओं का संचालन राष्ट्रीय मानदंडों, मानकों या फिजीबिलिटी के आधार पर हो ही नहीं सकता, लिहाजा यह पर्वतीय परिवेश को सहेजने की मंशा से होना चाहिए। ग्लोबल वार्मिंग के सामने सबसे पहले पर्वतीय क्षेत्रों का कंधा लगा है, अतः इसका असर भी हिमाचल जैसे राज्यों पर ही पड़ा है। बेतरतीब बारिश, बर्फबारी, तेज हवाओं और बादलों का फटना केवल पर्वत की चूक नहीं, बल्कि देश की नीतियों ने जो ढील दी उनकी सजा ही आपदा बनकर पहाड़ पर बरसी है। कुछ इसी तरह राष्ट्रीय संकल्प और परियोजनाओं के दंभ जब बड़े बांधों की शक्ल में हिमाचल के सीने पर पौंग, भाखड़ा, कौल या चमेरा जलाशय बनकर उतरे, तो पारिस्थितिकीय परिवर्तन या पर्यावरण का मूल्यांकन नहीं हुआ। चीन की सीमा से सटे होने तथा पराछू जैसी झीलों के उछलने के खतरों को झेलने का सबब बन कर जब हिमाचल सतलुज की गोद में तैरती आपदा को देखता है, तो इसका उत्तर चंद करोड़ की राहत राशि कतई नहीं दे सकती। हिमाचल की आपदाओं को विकास के सशक्त ढांचे की जरूरत है। यह जिंदगी और मौसम के संघर्ष के बीच प्राकृतिक संसाधनों की ऐसी रखवाली है जो अपने मूल्य तो देश को दे देती है, लेकिन इसके बदले किए गए योगदान का निरंतर अवमूल्यन हो रहा है। आपदा राहत राशि का वास्तविक संदेश तो मौसम और पहाड़ के रिश्ते की चुनौतियों को विस्तृत परिप्रेक्ष्य में समझने के बाद ही मिलेगा।