Monday, September 16, 2019 08:06 PM

‘म्हारे देऊआ चौल घौरा वे जाणा…’

खीरगंगा तीर्थ यात्रा के बाद डढ़ेई से बनाउगी रवाना हुए देवता कशूनारायण

कुल्लू -धार्मिक नगरी मणिकर्ण घाटी के डढ़ेई गांव में देवलु एक साथ रोते हुए और नाचते हुए नजर आए। इस अलौकिक नजारे को देखकर कई लोग हैरान रह गए। यह उस दौरान हुआ, जब एक महीने की खीरगंगा यात्रा कर सैंज घाटी के बनाउगी गांव के देवता कशूनारायण अपने देवालय की ओर डढ़ेई गांव से रवाना हुए। जहां देवता कशूनारायण के कारकूनों और हारियानों ने बहुत दिन होने के चलते देवता को घर ले जाने के लिए नाटी डाली, वहीं डढ़ेई गांव के देवलु इसलिए रो पड़े कि अब न जाने देवता कब यहां आएगा। लिहाजा, देवता घर जाते हुए देवता सुननारायण, देवता मकाल के कारकूनों के साथ-साथ यहां की महिलाएं व युवा भी भाव विभोर होकर रो पड़े। लिहाजा, देवता सुननारायण और  देवता कशूनारायण के कारकून और हारियान कई दिनों तक एक साथ रहे। बता दें कि शुक्रवार को देवता कशूनारायण लगभग एक महीने की खीरगंगा तीर्थ यात्रा के बाद डढ़ेई गांव से अपने देवालय बनाउगी के लिए रवाना हो गए हैं। देवता की रवानगी के दौरान का माहौल तब आकर्षक बना, जब बनाउगी, शैंशर सहित अन्य सैंज घाटी के ग्रामीणों ने अपने आराध्य देवता को कुल्लवी गीत म्हारे देऊआ चौल घौरा वे जाणा गीत गाकर देवालय जाने के लिए तैयार किया। गीत गाते ही देवता कारकून, हारियानों के साथ वहां से रवाना हो गया। काफी दिनों तक देवता सुननारायण, देवता मकाल, अठारहपेड़े और देवता कशूनारायण के कारकून एक साथ रहे और देवता कशूनारायण की प्राचीन देव परंपरा को बखूबी निभाया। बता दें कि सावन के तीन प्रविष्टे को देवता की खीरगंगा तीर्थयात्रा शुरू हुई थी। देवता शैंशर, भलाण, पारला भुंतर, धरमौर, मतेउड़ा होते हुए तपोस्थली डढ़ेई पहुंचे थे। देवता ने सुननारायण ऋषि से भव्य देवमिलन किया और तीर्थ यात्रा करने की आज्ञा मांगी। तीर्थ यात्रा से पहले देवता ने हुरण, धारला, शराणीबेहड़, टील, शांगचण गांव की परिक्रमा भी की। वहां से फिर डढ़ेई गांव रवाना हुए और वहां पर शाउणी जाच को मनाया। इन रिवायतों को पूरा करने के बाद देवता खीरगंगा यात्रा के लिए निकल पड़े और खीरगंगा में शाही स्नान कर शक्तियां अर्जित कीं। यही नहीं देवता ने इस दौरान तीर्थ स्थल के आसपास परिक्रमा भी की, जिसमें देवता ने कारकून, हारियानों को बताया कि जितने एरिया में परिक्रमा की, वह उनका एरिया है। वहीं, फिर स्नान कर देवता डढ़ेई गांव पहुंचे। इसके बाद  देवता सुननारायण ऋषि और अपने स्थान में जाकर शक्तियां अर्जित कीं और देवालय रवाना हो गए हैं। देवता के कारदार मोहन लाल ठाकुर ने बताया कि यह तीर्थ यात्रा 70 सालों बाद हुई। यह बहुत अच्छी यात्रा रही है।