यशपालः क्रांतिकारी और लेखक

ओ.पी. शर्मा

लेखक, शिमला से हैं

यशपाल का जन्म 3 दिसंबर 1903 को फिरोजपुर, पंजाब में हुआ था, परंतु उनके माता-पिता के परिवार और उनके पूर्वजों की एक शाखा हिमाचल के हमीरपुर क्षेत्र के भूंपल गांव के वासी थे। उनके दादा गरडू राम विभिन्न स्थानों पर व्यापार करते तथा भोरंज तहसील में  टिक्कर के खेतिहर तथा निवासी थे, पिता हीरालाल दुकानदार तथा तहसील के हरकारे थे। इसके पूर्व हिमाचल प्रदेश के जिला महासू के अंतर्गत रियासत अर्की के चांदपुर ग्राम से थे। यह सूचना राजस्व रिकार्ड जमाबंदी 1968-69 में अंकित है...

भारत को स्वतंत्र करने के लिए क्रांतिकारी आंदोलन में अपनी सक्रिय हिस्सेदारी के लिए जब यशपाल ‘1903-1976’ को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई, वह सिर्फ  28 वर्ष के थे। तब किसे पता था कि एक दिन यही युवक भारत के सबसे महत्त्वपूर्ण और प्रतिष्ठित लेखकों में गिना जाएगा। यशपाल ने दो जीवन जिए और दोनों में अपने-अपने ढंग से देश के लिए महत्त्वपूर्ण काम किए। उनका पहला जीवन देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित था तो दूसरा साहित्य सेवा को। यशपाल का जन्म 3 दिसंबर 1903 को फिरोजपुर, पंजाब में हुआ था परंतु उनके माता-पिता के परिवार और उनके पूर्वजों की एक शाखा हिमाचल के हमीरपुर क्षेत्र के भूंपल गांव के वासी थे। उनके दादा गरडू राम विभिन्न स्थानों पर व्यापार करते तथा भोरंज तहसील में  टिक्कर के खेतिहर तथा निवासी थे, पिता हीरालाल दुकानदार तथा तहसील के हरकारे थे। इसके पूर्व हिमाचल प्रदेश के जिला महासू के अंतर्गत रियासत अर्की के चांदपुर ग्राम से थे। यह सूचना राजस्व रिकार्ड जमाबंदी 1968-69 में अंकित है। उनके आरंभिक जीवन में स्वतंत्रता आंदोलनों तथा राजनीतिक जागरूकता का दौर था। वह पहले महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में कूद पड़े । पर कुछ ही समय बाद उन्हें लगा कि ऐसे आंदोलन भारत की गरीब जनता और आम आदमी के लिए कोई मायने नहीं रखते। न ही ब्रिटिश सरकार पर इस असहयोग आंदोलन का कोई प्रभाव होगा। वह पंजाब केसरी लाला लाजपत राय द्वारा संस्थापित और राष्ट्रीय विचारों के केंद्र नेशनल कालेज, लाहौर में दाखिल हो गए। यहां उनकी मित्रता सरदार भगत सिंह से हुई जिन्हें 1928 में पुलिस सुपरिंटेंडेंट सांडर्स की हत्या के लिए नई दिल्ली की सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में 1929 में बम विस्फोट करने के बाद फांसी पर लटका दिया गया था।

यशपाल अपने क्रांतिकारी जीवन के संस्मरणों ‘सिंहावलोकन’ में लिखते हैं- ‘एक दिन भगत सिंह और मुझे रावी नदी में नौकाभ्यास का अवसर मिला। बस हम दोनों थे, कोई और नहीं था याद नहीं यह प्रसंग कैसे आया, पर किसी कारण उस सुनसान में भगत सिंह पर पूर्ण विश्वास कर मैंने उससे कहा, ‘आओ देश पर प्राणों की आहुति देने का प्रण कर लें’। भगत सिंह बहुत गंभीर हो गया और मेरी ओर हाथ बढ़ा कर कहा, ‘मैं प्रण करता हूं’ यशपाल ने पहले कुछ समय भगत सिंह के साथ ‘नवजवान भारत सभा’ में सहयोग दिया, फिर 1929 में लाहौर बम फैक्टरी पर पुलिस के छापे के बाद फरार होकर हिंदोस्तानी समाजवादी प्रजातंत्र सेना की गतिविधियों में शामिल हो गए। यहीं उनकी मित्रता चंद्रशेखर आजाद से हुई जो 1931 में इलाहाबाद में पुलिस से सशस्त्र मुठभेड़ में शहीद हुए। अगले दो वर्षो के दौरान यशपाल ने अनेक स्थानों पर बम बनाने के लिए गुप्त रूप से विस्फोटक तैयार किए। 1929 में उन्होंने ब्रिटिश वाइसराय लार्ड  इर्विन की रेलगाड़ी के नीचे बम विस्फोट किया, लाहौर में बोर्सटल जेल से भगत सिंह को मुक्त करने के प्रयत्न में भाग लिया और कानपुर में अपने दल के साथियों को गिरफ्तार करने आए पुलिस बल के दो कांस्टेबलों को मार गिराया । इसी समय उनकी भेंट अपनी भावी पत्नी 17 वर्षीय प्रकाशवती से हुई जो अपने परिवार को छोड़ कर उनके क्रांतिकारी दल में शामिल हो गई थीं। 1932 में इलाहाबाद में पुलिस से मुठभेड़ के समय पिस्तौल में गोलियां समाप्त हो जाने पर यशपाल को गिरफ्तार कर लिया गया। वह लाहौर षड्यंत्र केस के मुख्य अभियोगी थे। पर लंबी कार्यवाही और खर्च की आशंका से सरकार ने इन मुकदमों को न चलाने का फैसला किया था। उनके खिलाफ  कुछ अन्य मुकदमें भी पर्याप्त सबूत और गवाह न होने के कारण खारिज करने पड़े। और अंत में उन्हें केवल सशस्त्र मुठभेड़ के दंड के रूप में आजीवन कारावास दिया गया। यशपाल-प्रकाशवती का जेल में विवाह भारत के इतिहास में अपनी तरह की अकेली घटना थी। इस खबर को समाचार पत्रों ने खूब उछाला। इस हल्ले के परिणामस्वरूप बाद में सरकार ने जेल मैनुअल में एक विशेष धारा जोड़कर भविष्य में सजा पाए कैदी के जेल में विवाह की मनाही कर दी। हिंदी लेखक भीष्म साहनी के अनुसार यशपाल उस पौध के लेखक थे, जिसमें एक ओर लेखक सामाजिक क्षेत्र में होने वाले जनसंघर्ष से जुड़ता है, दूसरी ओर उसी से उत्प्रेरित होकर अपना साहित्य रचता है। पिछले पच्चासेक वर्ष के विश्वसाहित्य की यही विशिष्ट प्रवृत्ति रही है और उसने साहित्य को ऐसे जुझारू और महान लेखक दिए हैं। यशपाल का निधन दिसंबर 1976 में अपने संस्मरणों ‘सिंहावलोकन’ का चौथा भाग लिखते समय हुआ था। ‘विप्लव कार्यालय’ प्रकाशन गृह की संस्थापक तथा 60 वर्षों से अधिक अपने पति की प्रकाशक प्रकाशवती का निधन 88 वर्ष की आयु में सितंबर 2002 में हुआ था। 2003-2004 में यशपाल की जन्म शताब्दी के अवसर पर देश भर में जिस उत्साह और लगन से समारोह हुए, वैसी भावना प्रेमचंद की जन्म शताब्दी के अतिरिक्त नहीं देखी गई थी। शिमला तथा कोलकाता में साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सेमिनारों, कोचीन में केरल साहित्य अकादमी, दिल्ली भाषा अकादमी तथा पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला आदि के सेमिनारों से लेकर हिंदी भाषी राज्यों के बीसियों छोटे-बड़े नगरों में भी इस अवसर पर समारोह हुए। इन अवसरों पर यशपाल के बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के सबसे महत्त्वपूर्ण हिंदी लेखक होने’ तथा हिंदी साहित्य और उनके बाद की पीढ़ी के लेखकों पर उनके गहरे प्रभाव की बात बार-बार कही गई। भारत सरकार ने इस अवसर पर यशपाल की स्मृति में डाक टिकट भी जारी किया था।