Monday, June 01, 2020 01:54 AM

यह अपनों से और करीब आने का समय है

गणेश गनी

मो.-9736500069

यह दौर इतिहास में पक्के अक्षरों में दर्ज होना है। हम इस बेहद कठिन समय के चश्मदीद गवाह बने हैं, यह बात आगे पैदा होने वाली पीढ़ी शायद ही माने। इस वैश्विक महामारी में हम सब पूरी धरती पर एक जैसे खतरे से दो-चार हो रहे हैं। हमारी सोच और दृष्टिकोण में गजब का परिवर्तन आ रहा है। इस सामाजिक आपात काल के समय में जहां हमें सामाजिक दूरी बनाने पर मजबूर होना पड़ रहा है, परंतु असल में हम अपनों के बहुत करीब आ गए हैं। हम अधिक संवेदनशील हुए हैं। हम चिंतन और आत्ममंथन करते हुए यह अनुभव कर रहे हैं कि जीवन कितना अनिश्चित है। हम समय व्यर्थ के कामों में गंवा देते हैं। इन दिनों मैं कुछ अधिक बेचैन रहा। भीतर के सवाल-जवाब उलझन भरे होते हैं। परंतु धीरे-धीरे मन शांत होने लगता है। मेरे जैसे लोग जब भी कहीं जाते हैं तो किताबें जरूर खरीद लाते हैं, मगर जीवन की आपाधापी में सारी पढ़ी नहीं जातीं तो बहुत सी किताबें अलमारी से झांकती रहती हैं कि उनको पढ़ा जाएगा। इन दिनों फेसबुक आदि पर समय देने के बाद भी बहुत समय बच जाता है तो यही किताबें और पुरानी पत्रिकाएं पढ़ता हूं। अमरकांत, शेखर जोशी, भुवनेश्वर, विजय दानदेथा, अज्ञेय, श्रीलाल शुक्ल और रसूल हमजातोव को पढ़ा। दागिस्तान में एक कवि हुए रसूल हमजातोव। उधर के पहाड़ भी हमारे इधर के पहाड़ों जैसे ही हैं। रसूल कहते हैंः

मूर्ख चीख से हैरान करता है

बुद्धिमान जंचती हुई कहावत से।

बसंत आया, गीत गाओ

जाड़ा आया, किस्सा सुनाओ।

इन दिनों सोशल मीडिया के माध्यम से बहुत कुछ खरा-खोटा सुनने और पढ़ने को मिलता है। हिंदी साहित्य में जो साजिशें और षड्यंत्र रचे जाते हैं, वो भी कभी-कभी उजागर हो जाते हैं। मैं कविता का आदमी हूं तो कविता पढ़ने-लिखने में अधिक समय देता हूं। साहित्य संवाद करता हूं। कहानियां भी खूब पढ़ता हूं। लेकिन इधर कविता की विधा में जो बाढ़ आई थी कवियों की, वो अब कुछ थमती नजर आ रही है। मेरा दागिस्तान किताब में एक जगह हमजातोव लिखते हैं, ‘हमारे साहित्य-संस्थान में ऐसे हुआ था।

पहले वर्ष की पढ़ाई के समय बीस कवि थे, चार गद्यकार और एक नाटककार। दूसरे वर्ष में पंद्रह कवि, आठ गद्यकार, एक नाटककार और एक आलोचक। तीसरे वर्ष में आठ कवि, दस गद्यकार, एक नाटककार और छह आलोचक। पांचवें वर्ष के अंत में एक कवि, एक गद्यकार, एक नाटककार और शेष सभी आलोचक। खैर, यह तो अतिशयोक्ति है, चुटकुला है। मगर यह सच है कि बहुत से कविता से अपना साहित्यिक जीवन आरंभ करते हैं, उसके बाद कहानी-उपन्यास, फिर नाटक और उसके बाद लेख लिखने लगते हैं। हां, आजकल तो फिल्म सिनेरियो लिखने का ज्यादा फैशन है।’ उपरोक्त कथन से, कविता और गद्य लिखना कितना कठिन है, यह बात अब समझ आ जानी चाहिए। हमारे इधर कवि मशरूम जैसे उगे हैं। खत्म भी हो रहे हैं, लेकिन बरसात में फिर उग आते हैं। जो साहित्य की सबसे मुश्किल विधा है, उस पर हाथ आजमाते हैं सबसे पहले। कितनी त्रासदी है। फिर धीरे-धीरे ये कवि अपनी-अपनी असली प्रतिभा की ओर मुड़ जाते हैं।

कविता छोड़ देते हैं। कुछ गार्डनिंग करते हैं, कुछ भागवत कथा सुनाते हैं, कुछ अखबारों में स्तंभकार बन जाते हैं, कुछ पत्रिका निकालते हैं, कुछ साझे संकलन निकालते हैं, कुछ प्रकाशन हाउस चलाते हैं, कुछ गवैये बन जाते हैं, कुछ नाना प्रकार के भोजन पकाते हैं आदि-आदि। यह भी सुखद है कि कविता बची रहेगी। कुछेक ढीठ होते हैं तो हर कवि सम्मेलन में जरूर हाजिरी भर आते हैं। जो जुगाड़बाज होते हैं, वो अकादमियों और सरकारी संस्थाओं के माननीय सदस्य बन जाते हैं। कुछ जीवन भर झोला उठाए घूम-घूम कर केवल कवि सम्मेलनों की अध्यक्षता करते हैं। इस ग्लोबल लॉकडाउन के समय में हमारे देश में हालात आपातकाल जैसे बनते जा रहे हैं। बचाव का कोई और रास्ता नहीं है, सिवाए घरों में पूरी तरह से बंद होने के।