Monday, June 01, 2020 01:19 AM

यह रचना समय नहीं है फिर भी रचनात्मक रहना है

एसआर हरनोट

मो.-9816566611

-गतांक से आगे...

इससे पहले अपनी बालकनी से कभी भी इन हिमाच्छादित शृंखलाओं को इतना साफ  और सुंदर नहीं देखा है। सामने की पहाडि़यों पर जो प्रदूषण की एक काली परत हमेशा पसरी रहती थी, वह आज गायब थी। दूर पार घने देवदारों के जंगल और उनके बीच बसे गांव ऐसे लग रहे हैं जैसे निर्मल जल से नहाए हुए हों। बरामदे से भीतर आते-आते वसीम बरेलवी का शेर याद आ जाता है ः

हादसों की ज़द में हैं तो क्या मुस्कुराना छोड़ दें,

जलजलों के ख़ौफ  से क्या घर बनाना छोड़ दें।

यह सब भीतर के डर और सन्नाटे को कम कर देता है और मैं अपने छोटे से पुस्तकालय में आकर किताबों को स्पर्श करने लगता हूं। किसी लेखक की ये पंक्तियां अनायास ही स्मरण हो जाती हैं...कि जब भी हम एक अच्छी किताब पढ़ते हैं तो कहीं न कहीं दुनिया में अपने लिए रोशनी का एक नया दरवाजा खोल देते हैं। इन विकट अंधेरों में शायद यही एक रोशनी का दरवाजा है कि हम इस अ-रचनात्मक समय में रचनात्मक सोच के साथ आगे बढ़ें और अपने भीतर के डर और एकांत को कम करते जाएं।

इसके बाद अपनी दिनचर्या को बदलना शुरू करता हूं। सबसे पहले टीवी पर समाचार देखने बंद करने का निर्णय लेता हूं जो भीतर के डर को पल-पल बढ़ाते चले जा रहे हैं। कुछ किताबें पढ़ने के लिए चुनता हूं। पहली नजर प्लेग पर लिखे अलबर्ट कामू के उपन्यास ‘द प्लेग’ पर जाती है। उसे निकालता हूं। यह उपन्यास जून, 1947 में फैं्रच भाषा में प्रकाशित हुआ था जिसका हिंदी अनुवाद शिवदान सिंह चौहान और विजय चौहान ने संयुक्त रूप में किया है जिसे राजकमल ने वर्ष 1961 में प्रकाशित किया था। उस समय इसका मूल्य केवल सात रुपए था। इसकी पृष्ठभूमि अल्जीरिया के ओरान शहर की है जिसे प्लेग के कारण क्वारंटाइन कर दिया गया था। वहां लाखों मौतें हुई थीं। कोरोना महामारी के बाद इस उपन्यास को नए संदर्भ में भी पढ़ा जा रहा है और बताया जा रहा है कि इसकी बिक्री तीन गुना बढ़ गई है। इसमें फ्रांस पर नाजी कब्जे के बिंब भी हैं और मृत्यु से टकराने वाली जिजीविषा भी। इस कोरोना समय में भी वही हिटलरी प्रवृत्तियां हैं और प्लेग जैसी स्थिति रची है। मेरा बेटा गिरीश जो मुंबई फिल्म जगत में आर्यन हरनोट के नाम से काम करता है, 19 मार्च को शिमला पहुंच गया था। मेरे एकांत और भय को कम करने की दिशा में उसका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। उसने मुझे कुछ बेहतरीन फिल्में और वेब सीरीज देखने की सलाह दी और उन्हें उपलब्ध भी करवाया। क्योंकि मैंने प्लेग उपन्यास से पढ़ने की शुरुआत की थी, इसलिए इसी क्रम में 2011 में स्टीवन सोडरबर्ग के निर्देशन में निर्मित फिल्म ‘कंटेजियन’ देखी जो इसलिए वायरल हो रही है कि उसकी कहानी भी आज के समय से मिलती-जुलती है। इसमें भी एक ऐसे ही खतरनाक वायरस के फैलने की कहानी दिखाई गई थी। यह फिल्म सार्स और स्वाइन फ्लू जैसे घातक वायरस से प्रेरित होकर बनाई गई थी। महामारी पर उपन्यास और फिल्म को देखना वर्तमान समय को समझना था।

समय कितना भी अंधकारमय हो, एक दिन एक सुबह जरूर नई रोशनी लिए आपके द्वार जरूर उपस्थित होती है। मैंने अपनी दिनचर्या अब पढ़ने और फिल्मों को देखने में परिवर्तित कर दी है। हालांकि भारत सहित पूरे विश्व में इस महामारी के कारण जो मौतें और संक्रमण हो रहे हैं और घटनाक्रम पल-पल बदल रहे हैं, वे अवश्य विचलित करते रहे हैं, फिर भी भीतर एक रचनात्मकता ने नए सिरे से प्रवेश करना शुरू कर दिया है। मैं सुबह का समय पढ़ने में गुजारता हूं और शाम के वक्त कोई अच्छी फिल्म देख लेता हूं। फिल्म के क्रम में दो वेब सीरीज ने बहुत प्रभावित किया है। इनमें एक ‘असुर’ है। प्रख्यात अभिनेता अरशद वारसी इन दिनों अपनी इस नई वेब सीरीज को लेकर सुर्खियों में हैं। बता दूं कि अब धीरे-धीरे हम इन्हीं वेब सीरीज की ओर बढ़ रहे हैं और ये बहुत लोकप्रिय भी हो रही हैं। इस सीरीज का निर्देशन ओनी सेन ने किया है। वूट सलैक्ट पर रिलीज हुई इस सीरीज में साइंस और माइथोलॉजी को मिलाकर एक ऐसा बेहद रोचक सस्पेंस थ्रिलर है जिसमें लॉजिक और मान्यता दोनों ही शामिल हैं। हिंदू धर्म में असुरों का एक विशेष स्थान है। इसमें भी असुरों की उत्पत्ति से लेकर उनके अस्तित्व की कहानी बयां करती है। यहां इसका जिक्र इसलिए जरूरी था कि असुर एक प्रवृत्ति है जो मनुष्य के भीतर बसी है। यह नकारात्मक ऊर्जा है जो हमारे भीतर सकारात्मकता के साथ रहती है। आप इसका चाहे जिस तरह प्रयोग कर लें। जैसा बताया जा रहा है कि कोरोना चीन की देन है और इस वायरस के पीछे भी ऐसी ही कोई ‘असुरी’ प्रवृत्तियां काम करती नजर आती हैं। यह जैविक हथियारों की ओर भी कोई खतरनाक कदम हो सकता है। इसी असुरी प्रवृत्ति में अपने उपन्यास ‘हिडिम्ब’ को भी याद करता हूं।

हमारे वेदों-शास्त्रों के अनुसार यह कलियुग का चरम है जहां मनुष्य तमाम अमानुषकताओं के साथ प्रकृति या ईश्वर की परिकल्पना से कहीं बड़ा होना चाहता है। हॉटस्टार की नई वेब सीरीज ‘स्पेशल ऑप्स’ भी इसी क्रम में देखना सुखद रहा जो इसी 17 मार्च को रिलीज हुई है जिसके जरिए निर्देशक नीरज पांडेय ने अपना डिजिटल डेब्यू किया है। प्रख्यात अभिनेता केके मेनन इसमें मुख्य भूमिका में हैं। यह भारत में बढ़ते आतंकवाद को समझने में भी मदद करती है। 2001 में संसद पर हुए हमले और मुंबई ब्लास्ट जैसे बेहद संगीन मामलों पर जांच की कथा भी इसमें निहित है। दोनों फिल्मों में रोचकता के साथ-साथ गजब की रचनात्मकता भी है और आज के समय का बड़ा आख्यान भी। इन दोनों वेब सीरीज ने सचमुच मेरे अवसाद को बहुत कम किया है और फिर यह सिलसिला आज तक चल रहा है। मैंने अब तक जो कुछ अच्छी फिल्में देखी हैं, उनमें उड़ी आतंकी हमले पर निर्मित फिल्म ‘उड़ी-सर्जिकल स्ट्राइक’, जिसे विक्की कौशल और यामी गौतम ने बनाया है, अजय देवगन की ताना जी, कंगना रनोट की पंगा और हामिद शामिल हैं। पुस्तकों के हाल ही में संवाद प्रकाशन द्वारा छापी गई वर्ष 1905 से लेकर वर्ष 2012 तक के नोबेल विजेता कहानीकारों की कालजयी कहानियां पढ़ना अच्छा लगा जिसका अनुवाद प्रमीला गुप्ता ने किया है। सभी नोबेल पुरस्कृत लेखकों के जीवन का संक्षिप्त परिचय भी इसमें है।  

-क्रमशः