Wednesday, July 17, 2019 08:23 PM

यह हादसों का सफर है

हिमाचल स्वयं से पूछ सकता है कि उसकी व्यवस्था किस हद तक दुर्घटनाग्रस्त है और सबक लेने की गुंजाइश क्यों बार-बार नजरअंदाज होती है। यहां जिक्र केवल सड़क दुर्घटनाओं का नहीं, बल्कि उस दौड़ का है जिसमें शरीक समाज, संस्कृति और सरकार अपने पांव जमीन पर नहीं रखना चाहते। किसी किस्से में दर्द का इजहार क्षणिक है और इसी के परिप्रेक्ष्य में हम आते हुए खतरों पर तवज्जो नहीं दे रहे। हर दिन प्रदेश के भीतर मनहूस सूचनाओं का अंबार खड़ा हो रहा है, लेकिन बहस क्षणिक है। इस बार शिमला की बाहों में लिपट कर दुर्घटना सूचना दे गई कि कहीं तो हम असंवेदनशील रहे। फिर दो बच्चियां और स्कूल के सफर में ताबूत सी बस। इस कहानी की शुरुआत बहुत पहले हो चुकी है, लेकिन हर बार नए नश्तर जुड़ जाते हैं। किसी एक दुर्घटना के कारण हो सकते हैं, मगर दुर्घटनाएं न हों, इसके लिए व्यवस्था के कान बहरे नहीं हो सकते। खासतौर पर नैतिकता के आधार पर हम बुरी तरह क्षतिग्रस्त हैं। हमारी प्राथमिकताएं ही हमारी दुर्घटनाएं हैं। विडंबना यह भी है कि सियासत की बड़ी आंखें हमारे वजूद के प्रश्नों को अति सूक्ष्म बना रही हैं। कमोबेश हर तरह का विकास अब एक दुर्घटना है या लगातार चुनाव जीतना समाज के सामने सियासत के बड़े हादसे की खबर है। सरकारी मशीनरी का हर पुर्जा इत्तला देता है कि हम अपने हादसों को बढ़ा रहे हैं। आश्चर्य तो यह कि बेमकसद विकास या यूं कहें कि बिना तर्क के संस्थान या कार्यालय खोल देने से जो हादसे हो रहे हैं, उन्हें सुनेगा कौन। शिक्षा की प्रासंगिकता में ही नए स्कूल-कालेजों की असफलता उन छात्रों के जीवन का हादसा है, जो अपनी सोच को मुकम्मल नहीं कर पाते। सरकार का एक मंत्री कुछ अलग सोच रहा है, तो गौर से देखिए कि कितने इम्तिहान बाकी हैं। ग्रामीण विकास मंत्री राज्य को गरीब मुक्त व सड़कों को आवारा गोवंश मुक्त बनाने की दिशा में बढ़ रहा है, तो परिवहन मंत्री सड़क दुर्घटना मुक्त हिमाचल का खाका बना सकते हैं। स्वास्थ्य मंत्री रोग मुक्त हिमाचल के लिए सारी व्यवस्था को चौकन्ना कर सकते हैं। कहीं कोई शहरी विकास मंत्री भी होगा, जो सामने आकर गंदगी मुक्त शहरों की कल्पना का चेहरा बने। कृषि और बागबानी मंत्रियों को उत्पादकता के आंकड़ों के साथ-साथ बंदर और आवारा पशु मुक्त खेत-बागान की तस्वीर पेश करनी होगी। क्या असफल होती औपचारिक शिक्षा किसी छात्र के जीवन का सबसे बड़ा हादसा नहीं। ऐसे में संस्कृत या एनिमल साइंस विश्वविद्यालय खोलने के बजाय यह भी सोचें कि कितने शिक्षण संस्थान महज राजनीतिक हादसा बनकर खड़े हैं। हर साल बढ़ते वाहनों के आंकड़ों के साथ-साथ दुर्घटनाओं के सलीब भी तैयार हो रहे हैं, लेकिन इन्हें रोकने की तैयारी नहीं। खासतौर पर दोपहिया वाहनों पर युवा पीढ़ी की उन्मादी दौड़ को कौन संबोधित करेगा। पौंग जलाशय में असुरक्षित तैरते युवाओं को पुलिसवाला न रोक पाए, तो इसे हादसा मानें या हादसे का इंतजार करें। बिना हेल्मेट प्रदेश भर में घूम रहे युवाओं को हादसा मानें या हादसों का इंतजार करें। नशे की संदूकड़ी खोल कर कोई चुपचाप चिट्टे की बिक्री कर दे, तो इसे हादसा कब मानेंगे जनाब। कहना न होगा कि हमारी व्यवस्था केवल हादसों का इंतजार करती है और तब हम जागते हैं। देश या प्रदेश की वर्तमान स्थिति में रहते हुए कोई न कोई हादसा हमारे सामने हर दम खड़ा होता है। बस हम उसे ही देखते हैं, जो दर्द का बयां बन जाता है, वरना हर पहलू में परेशान रहना और फिर भी कुछ न कह पाना ही देश की मौजूदा स्थिति का पैगाम बन रहा है।