Tuesday, February 18, 2020 07:36 PM

युवा वर्ग नशे के गर्त से बाहर निकले

सुखदेव सिंह

लेखक, नूरपुर से हैं

नशा आज हर गांव-गली की नुक्कड़ तक पहुंचकर पहाड़ की जवानी को दीमक बन चाट रहा है। ऐसा एक भी दिन नहीं गुजर रहा कि कोई युवा ड्रग्ज ओवरडोज चढ़ाए जाने से बेमौत नहीं मर रहे हों। देवताओं की धर्मस्थली में नशा तस्करी करके रातोंरात अमीर बनने में कई लड़कियां और महिलाएं भी समाज को बीमार करने में आगे निकल चुकी हैं...

न्याय मंदिरों के समक्ष लोग खड़े होकर धार्मिक ग्रंथों पर हाथ रखकर झूठी कसमें खाकर भी कानून का मजाक बनाने से गुरेज नहीं करते हैं। दशकों नशों के खिलाफ  अभियान चलाने के बावजूद कितने लोगों को जागरूक करके उसमें सफल हो पाए हैं गौर करना समय की अब जरूरत है। हिमाचल प्रदेश में आजकल नशा मुक्ति का अभियान जोरों पर चल रहा है। बड़ी कसमें खाकर समाज को नशा मुक्त बनाए जाने के बड़े दावे नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से किए जा रहे हैं। रात को जिन्हें बिना सोमरस पिए नींद नहीं आती है सुबह उठते वह नशों के ऊपर लंबी चौड़ी भाषणबाजी करके खूब तालियां बटोर रहे होते हैं। नशा आज हर गांव गली की नुक्कड़ तक पहुंचकर पहाड़ की जवानी को दीमक बन चाट रहा है। ऐसा एक भी दिन नहीं गुजर रहा कि कोई युवा ड्रग्ज ओवरडोज चढ़ाए जाने से बेमौत नहीं मर रहे हों। देवताओं की धर्मस्थली में नशा तस्करी करके रातोंरात अमीर बनने में कई लड़कियां और महिलाएं भी समाज को बीमार करने में आगे निकल चुकी हैं।

महिलाओं का सशक्तिकरण किए जाने के दावे बेशक करते रहे, मगर सच्चाई यही कि महिलाओं की एक टोली देवभूमि की साख धूमिल किए जाने में पीछे नहीं लगती है। राजनीति ड्रग्ज माफिया का कवच बनी जिसकी वजह से पुलिस निष्पक्ष रूप से अपनी जिम्मेदारियां फिलहाल नहीं निभा पा रही है। आए दिन बलात्कार की घटती ऐसी घटनाओं से हिमाचल प्रदेश भी उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों की तर्ज पर निकल पड़ा है। हिमाचल प्रदेश एक शांतिप्रिय राज्य यही सोचकर है। बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तरांचल और नेपाल देश के गरीब प्रवासी मजदूर यहां रोजी-रोटी संघर्ष के लिए चले आते हैं। प्रवासी मजदूरों को सुरक्षा मुहैया करवाने की बजाय उनकी बहू, बेटियों की अस्मत अगर यूं ही लुटती रही तो देवभूमि की साख को बचाना मुश्किल काम होगा।

गुडि़या कांड की गुत्थी अभी सुलझ नहीं पाई, यहां तक कि पुलिस ने यह मामला सुलझाना तो दूर की बात है, उल्टा पुलिस के आलाधिकारी ही इस केस में उलझकर सलाखों के पीछे दिन गुजारने को मजबूर हो चुके थे। कल तक हवस के भेडि़ए महिलाओं को अपनी वासना का शिकार बनाते रहे हैं। अब तो हद हो चुकी कि नन्हीं बच्चियां तक को बलात्कार का शिकार बनाकर उन्हें मौत के घाट उतारा जा रहा है। जनता को मुक्ति का उपदेश देने वाले संत ही जब हवस के भेडि़ए बन जाएं तो जरूरत बलात्कार के दोषियों को फांसी की सजा दिए जाने की है। बढ़ती बलात्कार की घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए अगर फांसी की सजा का प्रावधान न किया गया तो आने वाले समय में बहू, बेटियों की इज्जत को बचा पाना मुश्किल काम होगा। बलात्कार उत्पीड़न के मामलों में ज्यादातर आरोपी सजा से बच निकलते हैं। पीडि़ता का मेडिकल चैकअप समय पर न होना, गवाहों का न्यायालयों में बयान पलटना, पुलिस की कार्रवाई सही न होना और राजनीतिक हस्तक्षेप आदि कई कारणों से पीडि़ता को न्याय नहीं मिल पाता है।

प्रदेश की गुडि़या की लाश जंगल से पुलिस ने बरामद की थी। जनता को न्याय देने वाली पुलिस की टीम खुद ही जेल की सलाखों की हवा खा रही थी तो ऐसे में जनता न्याय की आस किससे रखे? बेटियां सबकी साझी होती हैं, इसलिए ऐसी अनहोनी घटनाओं को धर्म, जाति के रंग में न रंगते हुए सभी को मिलकर न्याय की मांग करनी चाहिए। एक समय ऐसा भी था कि गांव की बेटी की इज्जत को पूरा गांव अपनी इज्जत समझता था। आज हालत इस कदर बन चुके हैं कि इनसान अपने खून को भी दागदार करने से परहेज नहीं कर रहा है। एक तरफ बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ अभियान  चलाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ इस तरह बेटियों की अस्मत लूटी जा रही है। आखिर क्या कारण हो सकते हैं कि समाज में बलात्कार की घटनाएं बढ़ती ही जा रही हैं। हर जगह पर अश्लीलता ही देखने को मिल रही है। आज की युवा पीढ़ी स्मार्ट फोन को गले का हार बनाए हुए है।

सोशल मीडिया में भी अकसर लोग गलत आईडी बनाकर घंटों अश्लीलता पूर्ण बातें करके टाइम पास का साधन बना चुके हैं। फैशन के नाम पर शरीर में कम कपडे़ पहनना भी सभ्य समाज को अपराध करने की ओर ले जाने के बराबर है। लोगों में अब संभोग शक्ति बढ़ाए जाने की होड़ सी लग चुकी है, इस वजह से कई तरह के शक्ति वर्धक कैपसूल, दवाइयां, स्प्रे और इंजेक्शन लगाए जाने की आदत बनती जा रही है। ऐसे शक्ति वर्धक उत्पादों पर पूर्णतः प्रतिबंध लगाने की जरूरत है। समाज नशे का आदि होकर बलात्कार जैसी घटनाओं को अंजाम देता जा रहा है। एक साथ बलात्कार और हत्याओं के मामले उजागर होने के पीछे समाज की एकता तोड़ने की बात से इनकार भी नहीं किया जा सकता है। टीवी पर प्रसारित होने वाले नाटक भी अधिकांश अश्लीलता पूर्ण हैं जिन्हें एक इनसान परिवार के सदस्यों के साथ मिलकर नहीं देख सकता है।

सरकारों को ऐसे न्यूज चैनलों के खिलाफ  कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए जो बिना वजह बलात्कार जैसी आपराधिक घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाकर समाज में खाई पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी ने लड़कियों की ओर से कम कपड़े पहने जाने पर रोक लगाए जाने का फैसला सराहनीय लिया है। प्रदेश के अन्य शिक्षण संस्थानों को भी इसकी सीख लेनी चाहिए। बलात्कार जैसी आपराधिक घटनाओं को वही अंजाम दिए जा रहे जो नशों के कारण दिमागी रूप से बीमार हैं। सरकारों को सख्त कानून बनाकर नशा माफिया की संपत्तियों को जब्त किए जाने की पहल आखिर करनी ही होगी। ऐसा करने से समाज नशा मुक्त बनेगा और आपराधिक घटनाओं पर भी कुछ हद तक अंकुश लगाया जा सकता है।