Saturday, January 25, 2020 11:26 PM

युवा शून्यता के हादसे

जीवन की छलांगों में फिर कोहराम और हर दिन की सुर्खियों में पतन के रहस्य बरकरार हैं। बिलासपुर कालेज की तीसरी मंजिल से छात्रा का गिरना महज इत्तफाक भी हो सकता है, लेकिन अगर यह वांछित दुर्घटना है, तो इसके पीछे कई दीवारें खड़ी हैं। परिस्थितियां चौकस नहीं हैं और न ही स्कूल-कालेजों की मीनारें अब इस काबिल रही हैं कि युवा मन की उथल-पुथल को समझ सकें। जाहिर है कालेज की चारदीवारी के भीतर युवाओं की छलांगें अब अगर अस्पष्ट हैं या जोश की निगरानी में अंधेरों की दोस्ती बढ़ रही है, तो मुकाम हासिल करने की शक्ति कहां से आएगी। वहां फटे पाठ्यक्रम की चीखोपुकार के बीच आत्मीय रिश्तों की परख अगर नहीं होगी, तो युवा पीढ़ी के मानसिक फसाद को कौन रोकेगा। कुछ तो शून्यता रही होगी या बढ़ते असमंजस के बीच बच्चों का असंतुलित व्यवहार अब समाज के संबोधन बदल देगा। क्या हम इस दुर्घटना को महज घटना मान लें या उन सहपाठियों का जिक्र अनछुआ है, जिन्हें संदेह है कि तीसरी मंजिल से गिरना मासूमियत नहीं है। हो सकता है सामान्य परिस्थितियों की असामान्य सी प्रतीत हो रही घटना वास्तव में एक हादसा है, फिर भी प्रश्न शिक्षण संस्थान के परिसर में उठेंगे। वर्तमान हालात में शिक्षा का दर्पण क्यों टूटा या यह बार-बार क्यों टूट रहा है। हमारे अपने चिराग रोशन न हुए, तो वक्त के अंधेरों को क्या कोसें। हम इस घटना का चित्रण न करें, लेकिन शिक्षण संस्थाओं की दीवारों पर पुते रंग को बदरंग होते कब तक देखेंगे। शिक्षा के मात्रात्मक प्रसार ने हमें अपने कद से कहीं ऊंचे आंकड़े दिए, लेकिन बाजार में सिक्कों की तरह जब डिग्री बिकेगी, तो मानसिक उन्माद की तिजोरी भी दिखाई देगी। आक्रोश, खुन्नस, उदासीनता, अविश्वास और अनिश्चय की स्थितियों में समाज से प्रश्न पूछता युवा, अपनी छलांगें गिने या हर तरह की असफलता को सहज माने। असहज व्यवहार के लक्षणों में समाहित पूरा समाज इसके लिए दोषी क्यों नहीं। क्यों नहीं हम पथ भ्रष्ट होते लोगों के लिए अपने गिरेबां में झांकें। क्यों नहीं बढ़ती नशे की खेप में खुद को टटोलें और यह देखें कि ऐसे मंजर में हम आंखों में सुरमा डालकर नहीं बैठ सकते। पतन के तमाम कारणों और अपराध की हर शाखा के कितना नजदीक समाज ऊंघ रहा है, यह कब खबर होगी। हम गगरेट में एक सुनार के जहर निगलने के बाद आग के हवाले होने को सिर्फ आत्महत्या की संज्ञा बना सकते हैं, लेकिन तनाव के हर मोड़ पर समाज का कोई न कोई हिस्सा ही तो खुर्द बुर्द हो रहा है। सुंदरनगर की घिनौनी हरकत में हम मासूम बच्चियों को अगर बचा नहीं पा रहे या हमारी व्यवस्था के कान खड़े नहीं होते, तो ऐसे परिदृश्य का गुनहगार चेहरा तो समाज ही माना जाएगा। अपराध का नासूर हमारे बीच साक्ष्य की तरह मौजूद रहने लगा और हम हैं कि इन्हें केवल कानून-व्यवस्था के आरोपित अध्यायों की तरह देखने लगे हैं। हमारे आसपास और समाज के हर पहलू में दाग बहुत हैं और अगर इसे यूं ही अनदेखा करते रहेंगे, तो प्रगति की छलांगें हमें बार-बार पतन के मुहानों तक ले जाएंगी। तब आत्महत्या, चोरी-डकैती, नृशंस हत्याएं या आत्मघाती संवेदनाएं, हमारी इनसानी फितरत को खुद से अविश्वास करना ही सिखाएंगी। कालेज परिसर के बीचोंबीच युवा मुस्कराहटों, जीवन की उमंगों तथा भविष्य के उत्साह को बरकरार रखने की वजह उस भूमिका में समाहित है, जो हमें शिक्षक का नैतिक चेहरा दिखाती है। सांसें उस मैदान पर सरपट दौड़ती हैं, जहां युवा वय का होना तसदीक होता है या ठांठें मारते पुस्तकालय के भीतर आशाओं का समुद्र जब भविष्य की गहराई ढूंढता है, तो युवा अवस्था सुरक्षित जिल्द के भीतर जीवन के अध्यायों को कबूल कर लेती है।