Sunday, August 09, 2020 04:37 PM

ये अच्छे दिन कब आएंगे बंधु?

सुरेश सेठ

sethsuresh25U@gmail.com

बच्चा बोरवैल में गिर गया, मीडिया कर्मी उसे निकालने का प्रयास किए बिना पूछ रहे हैं कि ‘बच्चे, आप इस बोरवैल में गिर कर कैसा मसहूस कर रहे हैं’ कि जैसे पूछ रहे हों, आपने हमारा चॉकलेट खा कर कैसा महसूस किया, मीठा है कि कड़वा-कड़वा थू?’ बच्चे ने जवाब नहीं दिया तो सही जवाब जानने के लिए वे अगले बोरवैल में किसी बड़ी उम्र के आदमी के गिरने का इंतज़ार करने लगे। फिलहाल एक दो टूक फैसले में राज्य के मसीहा ने पूरे राज्य में खुले पड़े बोरवैलों को बंद करने का आदेश दे दिया है। बस अब ईंट, सीमेंट, रेत सामग्री का इंतज़ार हो रहा है। ठेकेदार अपनी काम करने वालों की कुमक के साथ काम करने के लिए तत्पर हैं। बस उनकी मांग है तो इतनी-सी कि उसके पिछले काम का रुका हुआ भुगतान दिलवा दिया जाए। बंधु, हम तो बकाया देने के लिए तत्पर हैं, लेकिन पिछली सरकार ‘अंधा बांटे रेवडि़यां मुड़-मुड़ अपनों को दे’ के अंदाज़ में खजाना खाली कर गई। हमने जनता को उनके सर्वग्रासी पंजे से छुटकारे के वायदों के बाद उनकी गद्दी के साथ यह खाली खजाना संभालने की विरासत पाई थी। हम अभी गद्दी सुरक्षित करने में लगे हैं, पहले अपने लिए, फिर अपने नाती-पोतों के लिए। खाली खजाने की विरासत हमने केंद्र में बैठी आला सरकार को सौंपने की कोशिश की थी, उन्होंने हाथ खड़े कर दिए। हुजूर बंदर की बला कौन-सा तबेला अपने सिर लेने के लिए तैयार होगा? और वह भी ऐसा तबेला जो हमारे सौतेले बाप का हो, हमारी पार्टी अलग, उनकी पार्टी अलग। फिर विचारधारा भी तो अलग-अलग है। चुनाव परिणाम निर्णायक थे, इसलिए मरम्मत करके कोई नया निम्नतम सांझा कार्यक्रम भी नहीं बनाया जा सका कि वह रेते लीजिये कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा। अभी तो नया कुनबा बनाने की ज़रूरत नहीं पड़ी, इसलिए ईंट की दीवार में रोड़े कैसे चिन देते? तब बहुत से राजनैतिक अदावल के आरोप इन केन्द्र बंधुओं पर लगा कर, राज्य के मसीहा अपना दुखड़ा लेकर जनता के बीच जाने की बात कहने लगे, लेकिन बातों से खाली खजाने का पेट नहीं भरता। फिर ज़रूरी भुगतान कैसे कर दिये जायें? सब बोरवैल बंद करने के आदेश असमर्थता की दीवारों से टकरा कर लौट आये। बच्चा बोरवैल में गिरा है, कैसा महसूस कर रहा है, अभी जवाब नहीं दे पाया। नौजवानों के लिए भी बोरवैल बंद नहीं हुए, दिशाहीनता के अन्धकूप खुल गये। इन अन्धकूपों से कोई आवाज़ नहीं उभरती कि वे कैसा महसूस कर रहे हैं? कभी-कभी उनमें से कोई झुण्ड बाहर झांकता है और वैध-अवैध कबूतरबाजों के टूटे हुए डैनों पर सवार होकर सात समुद्र पार जाने की कोशिश करता है। रास्ता समुद्री है तो माल्टा नौका दुर्घटनाओं जैसी त्रासदियां उसकी गलबहियां लेने को तैयार मिलती हैं। रास्ता मैदानी है तो तेल शेखों की गुलामी और दोयम दर्जे की नागरिकता उनका पीछा करती है। हवाई उड़ानें किसी सम्पन्न देश के अड्डे पर उतर गयी तो बेलौसए ठण्डे और अंधेरे कारागार उनका प्रतीक्षा करते हैं। उससे बच निकले तो यहां का डाक्टर वहां कम्पाऊंडर भी बन जाये तो समझो उसका जीवन सफल हो गया।

The post ये अच्छे दिन कब आएंगे बंधु? appeared first on Himachal news - Hindi news - latest Himachal news.